हिंदी वाला बाबू बनेगा और अंग्रेजी वाला अफसर

बाल मुकुन्द ओझा

हम हर साल 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाते है और इसे जन जन की भाषा बता कर गुणगान करते है । हम हिंदी दिवस जरूर मनाएं मगर वास्तविकता से मुहं नहीं मोड़े। हिंदी की सच्चाई जाने, उस पर मंथन करें ताकि जमीनी हकीकत से रूबरू हो सके। हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है मगर अंग्रेजी के मुकाबले यह भाषा आज भी दोयम दर्जे से ऊपर नहीं उठ पाई है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व आज भी कायम है। शिक्षा और रोजगार की बात करें तो अंग्रेजी के आगे हिंदी कहीं भी नहीं ठहरती। हमारी शिक्षा की बुनियाद अंग्रेजी पर टिकी है। हिंदी पढ़ने वालों को हिकारत की नजर से देखा जाता है। आजादी के 74 वर्षों बाद भी जनमानस की धारणा यह है कि हिंदी वाला चपरासी या बाबू बनेगा और अंग्रेजी जानने वाला अफसर। लाख कोशिशों के बाद भी इस सच्चाई से हम मुंह नहीं मोड़ सकते। सच तो यह भी है की हिंदी को अपने ही लोगों ने छला पग पग पर।
आजादी के 74 साल बाद भी विश्व में हिंदी का डंका बजाने वाले 135 करोड़ की आबादी वाले भारत में आज भी एक दर्जन ऐसे राज्य है जिनमें हिंदी नहीं बोली जाती। वहां संपर्क और कामकाज की भाषा का दर्जा भी नहीं है इस भाषा को। आश्चर्य तो तब होता है जब हम अंग्रेजी सीख पढ़ लेते है मगर हिंदी का नाम लेना पसंद नहीं करते। हिंदी भाषी स्वयं अपनी भाषा से लगाव नहीं रखते जहाँ जरुरत नहीं है वहां भी अंग्रेजी का उपयोग करने में नहीं हिचकते। देशवासियों को विचार करना चाहिए कि जिस भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया हैै और जो जन जन की मातृभाषा है, उसी के बोलने वाले उसे इतनी हिकारत की निगाह से क्यों देखते हैं । हिंदी की इस दुर्दशा के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है इस पर गहनता से चिंतन और मनन की महती जरूरत है। हिंदी भाषी राज्यों की हालत यह है कि वहां शत प्रतिशत लोग हिंदी भाषी है मगर प्रदेश के बाहर से आए चंद अधिकारियों ने अपना कामकाज अंग्रेजी में कर मातृभाषा को दोयम दर्जे की बना रखा है। हम दूसरों को दोष अवश्य देते हैं मगर कभी अपने गिरेबान में झांककर नहीं देखते। सच तो यह है की जितने दूसरे दोषी है उससे कम हम भी नहीं है। हिन्दी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिये।
दक्षिण के प्रदेश अपनी निज बोली या भाषा को अपनाये इसमें किसी को आपत्ति नहीं है मगर राष्ट्रभाषा के स्थान पर अंग्रेजी को अपनाये यह हमे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है। वे तमिल ,कनड या बंगला को अपनाये हमे खुशी होगी मगर हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी थोपे तो यह बर्दाश्त नहीं होगा। करे। है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। गांधी जी ने इसे जनमानस की भाषा भी कहा था। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है हिन्दी। चीनी भाषा के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। भारत और अन्य देशों में 60 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते,पढ़ते और लिखते हैं। हिन्दी भाषा अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है।
सातवें दशक के आरंभ में तमिलनाडु में ‘हिंदी हटाओ’ का आंदोलन चल पड़ा जिसकी प्रतिक्रिया में हिंदी भाषी उत्तर भारत में भी ‘अंग्रेजी हटाओ’ का आंदोलन चला। स्वतंत्र भारत में साठ के दशक में अंग्रेजी हटाओं-हिन्दी लाओ के आंदोलन का सूत्रपात राममनोहर लोहिया ने किया था। समाजवादी पुरोधा डॉ॰ राममनोहर लोहिया के भाषा संबंधी चिंतन और आंदोलन का लक्ष्य सार्वजनिक जीवन से अंगरेजी के वर्चस्व को हटाना था। लोहिया को अंगरेजी भाषा से कोई आपत्ति नहीं थी। अंगरेजी के साहित्य के भी वह विरोधी नहीं थे, बल्कि विचार और शोध की भाषा के रूप में वह अंगरेजी का सम्मान करते थे। लोहिया जब अंगरेजी हटाने की बात करते हैं, तो उसका मतलब हिंदी लाना नहीं है। बल्कि अंगरेजी हटाने के नारे के पीछे लोहिया की एक खास समझदारी है। लोहिया भारतीय जनता पर थोपी गई अंगरेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलाने के पक्षधर थे।
आज आवश्यकता इस बात की है की हम देश की मातृ और जन भाषा के रूप में हिंदी को अंगीकार करे। अपनी अपनी निज भाषा के साथ हिंदी को स्वीकार कर देश को प्रगति पथ और एक सूत्र में पिरोने के लिए अपने स्वार्थ त्यागे और देश के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा का परिचय दें। मातृ भाषा की सार्थकता इसीमें है कि हम अपनी क्षेत्रीय भाषाओँ की अस्मिता को स्वीकार करने के साथ हिंदी को व्यापक स्वरुप प्रदान कर देश को एक नई पहचान दें। यह देश की सबसे बड़ी सेवा होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार हैं)

 

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