खिल उठा पर्यावरण हवा-पानी हुआ साफ

विश्व पर्यावरण दिवस

देश और दुनिया 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है। विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम है प्रकृति के लिए समय। इसका मकसद पृथ्वी और मानव विकास पर जीवन का समर्थन करने वाले आवश्यक बुनियादी ढांचे को प्रदान करने पर ध्यान दिया जाए। यह दिवस आत्म चिंतन का है। हमने पर्यावरण को सुरक्षित रखा है या हानि पहुंचाई है। इस समय पूरी दुनिया लोक डाउन की शिकार है। कोरोना महामारी ने मानव जीवन को त्रस्त कर रखा है मगर पर्यावरण को खिलने का अवसर दिया है। जो काम बीते 50 वर्षों में नहीं हुआ वह चंद दिनों में हो गया। भारत में पिछले पांच दशकों में पहली बार ब्व्2 उत्सर्जन घटा है। कोरोना महामारी ने हजारों की जीवन लीला जरूर समाप्त कर दी मगर कुदरत को खिलखिला दिया। लोग सुबह-शाम की हवा में एक नयी ताजगी महसूस करने लगे हैं। लॉकडाउन पर्यावरण के लिए निश्चय ही वरदान बनकर आया है। दुनिया का ये लॉकडाउन प्रकृति के लिए बहुत मुफीद साबित हुआ है। वातावरण धुल कर साफ हो चुका है। प्रदूषण में भारी कमी से सुखद एहसास हुआ है। हवा का जहर मनो लुप्त हो गया है और नदियों का जल स्वच्छ और निर्मल। कोरोना वायरस ने इंसानी गतिविधियों पर ब्रेक लगाकर कुदरत को बड़ा आराम पहुंचाया है। इसके चलते वातावरण स्वच्छ और निर्मल हो गया है, पानी, नदियाँ, हवा, जंगल, भूमि एवं पूरा पर्यावरण खिलखिला रहा है। हवा शुद्ध होने से आसमान भी साफ हो गया है। पक्षियों का कलरव गूंजने लगा है। अब यह हम पर है की लोक डाउन खुलने के बाद हम इसे कहाँ तक संरक्षित रख पाते है।
प्राचीन काल में हमारा पर्यावरण बहुत साफ और शुध्द था। उस समय मानव और प्रकृति का अद्भुत सम्बन्ध था मगर जैसे जैसे मनुष्य ने प्रगति और विकासः के मार्ग पर अपने पैर रखे वैसे वैसे उसने पर्यावरण का साथ छोड़ दिया और पर्यावरण को प्रदूषित होने दिया। आबादी के विस्फोट ने आग में घी का काम किया और पर्यावरण तेजी से बिगड़ता चला गया। इस कारण हमारा सांस लेना भी मुश्किल हो गया। आज पृथ्वी वायु जल धवनि सभी प्रदूषित हो रहे है और मानव जीवन संकट में फँस गया है। विज्ञानं की तरक्की पेड़ों की अंधाधुंध कटाई शोर आदि सभी ने मिलकर पर्यावरण को भारी हानि पहुंचाई है। आज हर वस्तु प्रदूषित हो रही है।
पर्यावरण को लेकर आज समूचा विश्व चिन्तित है। आखिर यह पर्यावरण है क्या और इससे चिन्तित होने के कारण क्या हैं? पर्यावरण वायु, जल, मृदा, मानव और वृक्षों को लेकर बना है। इनमें से किसी भी एक तत्व का क्षरण होता है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ता है। प्रदूषण भी पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी बना हुआ है। पेड़, पौधे, जलवायु मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। किसी भी एक तल के असंतुलित होने पर पर्यावरण प्रक्रिया असहज हो जाती है जिसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ता है। विश्व ने जैसे-जैसे विकास और प्रगति हासिल की है वैसे-वैसे पर्यावरण असंतुलित होता गया है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, कल-कारखाने, उससे निकलते धुंए, वाहनों से निकलने वाले धुएं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदी और तालाबों का प्रदूषित होना आदि घटनाएं पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है।
पर्यावरण और अकाल का भी चोली-दामन का साथ है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, वायु और जल प्रदूषण, से हमने अकाल को न्यौता दिया है। इन सब कारणों से हमारी खेती योग्य 18 लाख हैक्टेयर भूमि क्षेत्र बंजर और बेकार होकर रह गया है। देश में हर साल 15 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में वन नष्ट हो रहे हैं।
मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। यदि हमने अभी से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला मानव जीवन अंधकारमय हो जायेगा। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को भी संरक्षित रखा जा सकता है।

 

बाल मुकुन्द ओझा            वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

 

 

 

 

 

 

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