रक्तरंजित इस्लामिक सत्ता पर लोकतंत्र की जीत

सूडान-देश छोटा, संदेश बड़ा

विष्णुगुप्त

एक रक्तरंजित अवधारणा के विध्वंस होने की खुशी मनाया जाना चाहिए, मुस्लिम-जिहादी मानसिकता पर विजय के तौर देखा जाना चाहिए, मुस्लिम -जिहादी हिंसा पर मानवाधिकार और लोकतंत्र की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए। दुनिया को यह एक ऐसा रास्ता हाथ लगा है जिस पर चलकर दुनिया मुस्लिम हिंसा, मुस्लिम आतंकवाद, इस्लाम एकमेव सिद्धांत के बर्बर और अमानवीय करतूतों पर रक्तहीन विजय हासिल कर सकती है। रक्तरंजित अवधारणा थी कि जिस देश में भी एक बार भी रक्तरंजित इस्लामिक शासन कायम हो गया तो फिर उस रक्तरंजित इस्लामिक शासन को बदला नहीं जा सकता है, उस पर लोकतंत्र और मानवाधिकार की जीत हो ही नहीं सकती है?
यह सही है कि इस्लाम में लोकतंत्र या फिर गैर मुस्लिम मानवाधिकार की अवधारणा है ही नहीं। अभी तक दुनिया को मुस्लिम-जिहादी हिंसा, आतंकवाद और इस्लाम की एकमेव करतूतों पर विजय प्राप्त करने का रास्ता नहीं मिल पाया है। अब तक जो रास्ते खोजे गये उस पर चलकर ऐसे तत्वों और रक्तरंजित अवधारणों को समाप्त करना मुश्किल काम ही साबित हुआ हैं। अमेरिका के नेतृत्व में नाटो देशों ने इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया सूडान और अन्य देशों में सैनिक क्षमता के प्रदर्शन कर अलकायदा, आईएसआईएस और बोकोहरम, तालिबान जैसे मुस्लिम आतंकवादी संगठनों पर लगाम तो लगायी पर इनकी मानसिकताओं को पूरी तरह से जमींदोज नहीं किया जा सका हैं।
जहां पर सत्ता ही पूरी तरह से इस्लामिक रंग में रंगी होती है वहां पर बल प्रयोग करने या फिर हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा से भी से भी ऐसी रक्तरंजित अवधारणाएं नहीं दबती है। इसलिए जरूरी यह है कि देश की सत्ता लोकतांत्रिक हो और धर्मनिरपेक्ष भी होनी चाहिए। लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष सत्ता में ही मुस्लिम-जिहादी हिंसा, आतंकवाद और इस्लाम को स्थापित कर अन्य धर्मो का रक्तरंजित विनाश करने की अवधारणा का समाप्त किया जा सकता है। पर हमें यह भी स्वीकार करना होेगा कि एक इस्लामिक बहुलतावादी मुस्लिम आबादी वाले देश में लोकतंत्र और मानवाधिकार की संरचना की उम्मीद भी बहुत कम होती है।
संदेश छोटे देश से निकला है, रक्तरंजित इस्लाम के शासन के खिलाफ यह रास्ता छोटे से देश से निकला है, इसलिए इस पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई और ही इस घटना को बर्बर, अमानवीय और घृणा के प्रतीक इस्लामिक शासन व्यवस्था की मानसिकता पर अंतिम किल के तौर पर देखा गया। यह संदेश उस छोटे से देश से निकला है जो वर्षो से इस्लामिक हिंसा से त्रस्त था, गृहयुद्ध झेल रहा था और जहां पर हजारों-हजार बच्चियां हर साल खतना की बुराई के कारण दम तोड़ दिया करती थी। वह देश सूडान है। सूडान एक अफ्रीकी देश है। सूडान उन अफ्रीकी देशों में शामिल है जहां पर रक्तरंजित इस्लाम के कारण हिंसा, आतंकवाद और अमानवीय बर्बरता जारी हैं। अभी-अभी सूडान की सरकार और विद्रोही गुटों में एक समझौता हुआ है। सूडान के प्रधानमंत्री अब्दुला हमदोक और सूहान पीपुल्स लिबरेशन मूवमेंट नार्थ विद्रोही गुट के नेता अब्दुल अजीज अल हिलू की समझदारी सं यह समझौता सम्पन्न हो सका है। समझौते का आधार इस्लामिक शासन व्यवस्था की समाप्ति है। तीस सालो से चली आ रही बर्बर, अमानवीय और लोमहर्षक इस्लामिक सत्ता का अंत होगा, एक लोकतंत्र का उदय होगा, यह लोकतंत्र कोई इस्लामिक राज व्यवस्था पर कायम नहीं होगा? जैसा लोकतंत्र ईरान में है, जैसा लोकतंत्र पाकिस्तान में है, जैसा लोकतंत्र तुर्की में है वैसा लोकतंत्र नहीं होगा। घोर इस्लामिक के साथ ही साथ धामिक अल्पसंख्यकों पर रक्तरंजित हिंसा को अजाम देने वाली ही सत्ता र्इ्ररान, पाकिस्तान, तुर्की में आदि में है फिर ये अपनी सत्ता व्यवस्था को लोकतांत्रिक कहते है। ईरान, तुर्की, पाकिस्तान आदि मुस्लिम देशों के इसी फर्जीवाड़े के कारण ही इस्लामिक रक्तरंजित मानसिकताएं संरक्षित होती हैं और दुनिया की शांति को लहूलुहान करती है। सूडान का लोकतंत्र भारत की तरह होगा, सूडाल का लोकतंत्र ब्रिटेन की तरह होगा, सूडान का लोकतंत्र गृहयु़द्धों में फंसे अन्य अफ्रीकी मुस्लिम देशो के बीच एक आईकॉन की तरह होगा? हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या ऐेसे लोकतंत्र की सफलता अन्य मुस्लिम देशों में प्रारंभ होगी?
सूडान आखिर बर्बर और रक्तरंजित इस्लामिक शासन में फंसा ही क्यों था और इसके दुष्परिणामों से सूडान की आबादी कितनी बर्बर, हिंसक और अमानवीय कीमत चुकायी है? सूडान का दुर्भाग्य आज से तीस साल पूर्व शुरू हुआ था। 1989 में सूडान में तख्तापलट हुआ था और उमर अल बशीर ने सूडान की सत्ता पर कब्जा कर लिया था। वह घोर इस्लामिक मानसिकता का परिचायक था और इस्लामिक जिहादी से प्रेरित था। उसने सत्ता पर कब्जा करने के साथ ही साथ उदार कानूनों को समाप्त कर दिया और सूडान को एक घोर बर्बर, लोमहर्षक और अमानवीय कानूनों से लाद दिया। उसने सूडान पर इस्लामिक शासन लाद दिया। उसके इस्लामिक राज में बलपूर्वक मुस्लिम बनाने का काम शुरू हुआ था। कई हजार ईसाइयों को बलपूर्वक मुस्लिम बनाया गया। जिन ईसाइयों ने बलपूर्वक मुस्लिम बनाने का विरोध किया था उनकी हत्याएं कर दी गयी। यही कारण है कि सूडान के अंदर आज मात्र तीन प्रतिशत ही गैर मुस्लिम बचे हैं। उमर अल बशीर ने यह भी कानून बना दिया था कि जो एक बार भी मुसलमान बन गया वह फिर धर्म नहीं बदल सकता है, अगर वह धर्म बदलता है तो फिर उसकी सजा मौत होगी। इस बर्बर और अमानवीय कानून का प्रयोग भी खूब हुआ। मुसलमान छोडने वालों को सरेआम मौत की सजा दी गयी। ऐसी एक सजा दुनिया भर में चर्चित हुई थी। मरियम यहया इब्राहिम इशाग नाम की एक गर्भवती महिला को मौत की सजा इसलिए सुनायी गयी थी कि उसने इस्लाम छोडकर ईसाई पुरूष से शादी कर ली थी। नये लोकतंत्र में कोई भी मुस्लिम अपना मजहब छोडकर कोई अन्य धर्म स्वीकार करने के लिए स्वतंत्र होगा।
इस्लामिक शासन व्यवस्था की सबसे बडी कीमत अबोध बच्चियों ने चुकायी है। इस्लामिक शाासन में बच्चियों के लिए खतना अनिवार्य कर दिया गया था। खतना नहीं कराने पर बच्चियो के माता-पिता को जेल होती थी। बच्चियों का खतना इस्लामिक शासन का एक ऐसा हथियार है जिससे वह अपना खौफ भी कायम करता है और महिला अधिकार को भी गुलाम बना कर रखता है, महिलाएं सिर्फ भोग की वस्तु है, इस इस्लामिक मान्यताओं को भी संरक्षित करता है। बच्चियों का खतना एक ऐसा भयावह पीडा है जिससे बच्चियां जीवन भर नहीं भूल पाती हैं। सूडान में इस बर्बर करतूत से हजारों अबोध बच्चियों की मौत होती थी। अब नये लोकतांत्रिक शासन में बच्चियों के खतना पर प्रतिबंध लगा दिया जायेगा। सूडान की सरकार और विद्रोहियों के बीच हुए समझौते के अनुसार बच्चियों के खतना पर प्रतिबंध को कडायी के साथ लागू करने पर बल दिया गया है। इसके लिए सजा की भी व्यवस्था होगी। खतना के लिए जो डॉक्टर, जो नर्स और जो नाई पकडे जायेंगे उन्हें तीन साल तक की कठोर जेल होगी और उनके लाइसेंस को जब्त कर लिया जायेगा। बच्चियों को खतना के लिए मजबूर करने वाले माता-पिता को भी दंडित करने का प्रावधान कानूम में किया जायेगा। खतना पर प्रतिबंध से सूडान में प्रतिवर्ष हजारों मुस्लिम बच्चियों की जान बचेगी। इसके अलावा महिलाएं अब घर के पुरूषो के बिना भी सामूहिक स्थलों पर जाने के लिए स्वतंत्र होगी।
सूडान ही क्यों बल्कि अरब और अफ्रीका महादेश के दर्जनों देश इस्लामिक शासन व्यवस्था के दंश को झेलने के लिए विवश हैं, अधिकतर देशों में गृहयुद्ध की स्थिति है। एक मुस्लिम आतंकवादी संगठन अपने इस्लाम की मान्यताओं को स्थापित कराने के लिए दूसरे मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के समर्थकों को गाजर मूली की तरह काटता है। ऐसी स्थिति सूडान के साथ ही साथ नाइजीरिया, इथोपिया, इराक, सीरिया आदि देशो में आसानी से देखा जा सकता है। इसके अलावा अरब के कुछ देशों जैसे मिश्र, लेबनान, अफ्रीका महादेश के दर्जनों  देशों में मुसलमानो  और ईसाइयों के बीच गृहयुद्ध जारी है। इसमें ईसाई एक पीडित है। लाखो इसाइयों को मुस्लिम बनने के लिए बाध्य होना पडा थां। इसी पर आधारित एक फिल्म ‘‘ यूनोसेंट आफ मुस्लिम्स ‘‘ ने दुनिया भर में तहलका मचायी थी। इस फिल्म के खिलाफ अरब और अफ्रीका मे मुस्लिम आतंकवादी संगठनों ने बहुत बडी और रक्तरंजित प्रतिक्रिया दी थी।
अब दुनिया को सूडान के प्रस्तावित लोकतंत्र को मुस्लिम देशों के लिए एक आईकॉन शासन प्रणाली के तौर पर प्रस्तुत करना चाहिए, प्रोत्साहित करना चाहिए। इस्लामिक शासन व्यवस्था पर लोकतंत्र की स्थापना से ही मुस्लिम आतंकवाद और घृणा पर विजयी हासिल हो सकती है। हमें इस बर्बर, लोमहर्षक, अमानवीय इस्लामिक शासन के पतन और नये लोकतंत्र की स्थापना पर खुशी मनाना ही चाहिए। उम्मीद भी यही है कि अन्य अर्फीकी और अरब के देश भी सूडान के प्रस्तावित लोकतंत्र का स्वागत करें। लोकतांत्रिककरण पर ही अरब और अफ्रीकी देशों की समृद्धि संभव होगी।

(लेखक वरिष्ठ स्तभकार हैं)

 

 

 

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