अब बिलंबु केह कारन कीजे…

आत्महत्या मुक्त भारत??

भूपेश दीक्षित

वर्ष 2011 में, भारत सरकार ने देश के लिए मानसिक स्वास्थ्य नीति की सिफारिश करने के लिए एक नीति समूह का गठन किया और अनेक विवेचना, गहन विचार-विमर्श व बैठकों के बाद नीति समूह ने इस सम्बन्ध में अपने महत्वपूर्ण सुझाव भारत सरकार को प्रस्तुत किये। नीति समूह द्वारा सुझाये गए सुझावों में भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा कुछ संशोधन और परिवर्तन करने के बाद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन द्वारा वर्ष 2014 में देश की प्रथम राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति प्रस्तुत की गयी। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति का विजन मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, मानसिक बीमारी को रोकने, मानसिक बीमारी से उबरने में सक्षम बनाने, मानसिक बीमारी से जुड़े कलंक और भेदभाव को दूर करने को बढ़ावा देने और सस्ती, सुलभ और गुणवत्ता प्रदान स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हुए मानसिक बीमारी से प्रभावित व्यक्ति के सामाजिक-आर्थिक समावेश को सुनिश्चित करना है।
इसी नीति का एक मुख्य उद्देश्य देश में आत्महत्या के प्रयास के जोखिम और घटनाओं को कम करना है। नीति के बिंदु संख्या 5.3.3. से लेकर 5.3.3.4 तक आत्महत्या के प्रयास के जोखिम और घटनाओं को कम करने अनेक रणनीतिक निर्देश और अनुशंसित कार्य बताये गए है जिनमे प्रमुख रूप से आत्महत्या की संभावना और आत्महत्या के प्रयास को कम करने के लिए आत्महत्या में कमी के कार्यक्रमों को लागू करना, आत्महत्या के साधनों तक पहुंच को विशेषकर अत्यधिक विषैले कीटनाशकों के वितरण और भंडारण को प्रतिबंधित करना, आत्महत्या की जिम्मेदार मीडिया रिपोर्टिंग के लिए दिशानिर्देश तय करना, आत्महत्या के प्रयास को डी-क्रिमिनिलाईज करना, आत्महत्या के जोखिम कारकों को पहचानने में सामुदायिक नेताओं को प्रशिक्षित करना इत्यादि। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति के अलावा मानसिक रुग्णता से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य देख-रेख और सेवाएं प्रदान करने और उनके अधिकारों का संरक्षण, संवर्धन और उनको पूरा करने से सम्बंधित मानसिक स्वास्थ्य देखरेख अधिनियम, 2017 भारत सरकार द्वारा वर्ष 2017 में देशभर में लागू किया गया।
नीति और कानून के अलावा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 1982 से सम्पूर्ण भारत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है । लेकिन सुदृढ़ नीति, सशक्त कानून और उम्दा कार्यक्रम होने के बाद भी इन सबका धरातल पर क्रियान्वन बहुत ही खराब है । राज्य सरकारों की इन नीति, कानून और कार्यक्रम के प्रति उदासीनता और प्रतिबद्धता की कमी हालात को और भी बदतर बना रहे है । यही कारण है कि देश में मनोरोग और आत्महत्या के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है । देश का ऐसा कोई भी राज्य नहीं है जो आत्महत्या के बढ़ते मामलों की चपेट में नहीं है ।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एडीएसआई रिपोर्ट के वर्षवार आंकड़ों का आंकलन करने से पता चलता है कि वर्ष 1980 के मुकाबले वर्ष 2019 में देश में आत्महत्याओं के मामलों में 233 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज हुई है । देश में जहाँ वर्ष 1980 में 41663 व्यक्तियों की मृत्यु आत्महत्या के कारण हो रही थी वहीँ वर्ष 2019 तक आते-आते 139123 व्यक्तियों की मृत्यु आत्महत्या के कारण होने लगी । जानी-मानी शोध पत्रिका लांसेट पब्लिक हेल्थ के वर्ष 2018 में छपे शोधपत्र ‘जेंडर डीफ्रेंसिअल्स एंड स्टेट वेरिएशनस इन सुसाइड डेअथ्स इन इंडिया – दी ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 1990 – 2016’ के अनुसार भारत में वर्ष 2016 में 15-39 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में मृत्यु का सबसे प्रमुख कारण आत्महत्या था । संभवतः आजादी के बाद यह पहला ऐसा मौका था जब देश के युवा वर्ग में मृत्यु का सबसे प्रमुख कारण आत्महत्या उभर कर आया । आंकड़े और स्थितियाँ इतनी भयवाह तस्वीर दिखा रहे है कि सवाल उठना लाजिमी है कि देश में आत्महत्या के प्रयास के जोखिम और घटनाओं को कम करने में आखिर सरकारों से चूक कहाँ हो रही है ? क्या देश में संसाधनों की कमी है या फिर नीति-नियंताओं की नीयत में ही खोट है । क्यों वैश्विक चुनौती बन चुकी आत्महत्या की समस्या को रोकने के लिए देश में कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे है ? दशकों बाद जब देश में चुनी हुई एक मजबूत सरकार है और देश में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर नीति, कानून और कार्यक्रम तक है तब फिर राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति और रणनीतियां बनाकर लागू करने में आखिर विलंब क्यों हो रहा है ? वर्तमान में जब नवभारत और आत्मनिर्भर भारत के भविष्य के निर्माण की नींव रखी जा रही है तब देश में आत्महत्या की समस्या को कम करने की दिशा में सरकार और समाज दोनों से गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड की चौपाई “अब बिलंबु केह कारन कीजे” के माध्यम से प्रश्न पूछना नितांत आवश्यक हो जाता है क्यूंकि इन सवालों के समाधान से ही आत्महत्या मुक्त भारत का मार्ग प्रशस्त होगा ।

(लेखक जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं)

 

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