जान हथेली पर रख कर चलते है लोग

बाल मुकुन्द ओझा

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के वर्ष 2019 के सड़क हादसों के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे देश में लोग जान हथेली पर लेकर चलते है। ये आंकड़े हाल ही जारी हुए है जिनके मुताबिक सड़क हादसों में मरने वालों की तादाद हर साल बढ़ती ही जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में 4 लाख 37 हजार 396 सड़क हादसे हुए। इनमें 1 लाख 54 हजार 732 लोगों की जान गई और 4 लाख हजार 262 लोग घायल हुए। 59.6 फीसदी सड़क दुर्घटनाओं का कारण तेज रफ्तार रही। ओवर स्पीडिंग की वजह से सड़क दुर्घटना में 86 हजार 241 लोगों की मौत हुई और 2 लाख 71 हजार 581 लोग घायल हुए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार सड़क दुर्घटना में मरने वाले 38 फीसदी लोग दोपहिया वाहन पर सवार थे इन्हें ट्रक, लॉरी, बस या कार के साथ हुई भिड़ंत की वजह से जान गवानी पड़ी।
देश में सड़कों और हाईवे की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ हादसों की रफ्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही। एक सर्वे रिपोर्ट की माने तो चीन के बाद भारत में सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों का आंकड़ा सबसे ज्यादा है इसका सबसे बड़ा कारण है कि गाड़ियों की स्पीड लिमिट पर निगरानी का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं होना है। भारत में कोई दिन नहीं ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी भाग में सड़क हादसा न होता हो। ऐसा लगता है जैसे सड़के आतंकी हो गयी है और हादसे थमने के नाम नहीं ले रहे है। देश में मोटर वाहन कानून 2019 लागू होने के बाद भले ही सरकार के राजस्व में वृद्धि हुई हो मगर दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या में कमी नहीं आयी। विडंबना यह है की लोग अभी भी जान हथेली पर रखकर चल रहे है। सख्त कानून का उनपर कोई असर नहीं हुआ है। अब तो भारत सरकार ने भी मान लिए है की सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। सड़क दुर्घटनाओं में पैदल चलने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं है। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है देश में हर साल पैदल चलने वाले 20 हजार लोग सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। यह आंकड़ा सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए लोगों की कुल संख्या का करीब 12 प्रतिशत है।
अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन के अनुसार, दुनिया भर में वाहनों की कुल संख्या का महज तीन प्रतिशत हिस्सा भारत में है, लेकिन यहां होने वाले सड़क हादसों और इनमें जान गंवाने वालों के मामले में भारत की हिस्सेदारी 12.06 प्रतिशत है। सड़क हादसों में भारत को हर साल मानव संसाधन का सर्वाधिक नुकसान होता है। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन (आईआरएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की प्रति वर्ष सड़क हादसों में मौत होती है। इसमें भारत की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ज्यादा है। इन सभी दुर्घटनाओं के पीछे शराब मादक पदार्थों का इस्तेमाल, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना, वाहनों में जरुरत से अधिक भीड़ होना, वैध गति से अधिक तेज गाड़ी चलाना और थकान आदि होना है। महानगरों और नगरों में किसी चौराहे पर लाल बत्ती को धता बताकर रोड पार कर जाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, बेवजह हार्न बजाना, निर्धारित लेन में न चलना और तेज गति से गाड़ी चलाकर ट्रैफिक कानूनों की अवहेलना आज के युवकों का प्रमुख शगल बन गया है। कहने का तात्पर्य है विकास के साथ साथ जिस सड़क संस्कृति की जरूरत होती है वह हमारे देश में अभी तक नहीं बन पाई है। सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण यही है।
भारत का विश्व में सड़क हादसों में वर्ष 2006 से पहला स्थान चला आ रहा हैं। देश में सड़क दुर्घटनाओं में 48 प्रतिशत ऐसे युवा हैं, जिनकी आयु 14-35 वर्ष के मध्य है। विकासशील देश में जहां युवाओं की देश को जरूरत है वही देश का युवा वर्ग तेज गति और लापरवाही के कारण प्रतिदिन हादसों का शिकार हो रहे हैं। एक सड़क दुर्घटना की कीमत चालक के परिवार के अलावा देश को भी चुकानी पड़ती है।
सड़क सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है, आम जनता में खासतौर से नये आयु वर्ग के लोगों में अधिक जागरुकता लाने के लिये इसे शिक्षा, सामाजिक जागरुकता आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जोड़ा गया है। सड़क दुर्घटना, चोट और मृत्यु आज के दिनों में बहुत आम हो चला है। सड़क पर ऐसी दुर्घटनाओं की मुख्य वजह लोगों द्वारा सड़क यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा उपायों की अनदेखी है। गलत दिशा में गाड़ी चलाना, सड़क सुरक्षा नियमों और उपायों में कमी, तेज गति, नशे में गाड़ी चलाने आदि । सड़क हादसों की संख्या को घटाने के लिये उनकी सुरक्षा के लिये सभी सड़क का इस्तेमाल करने वालों के लिये सरकार ने विभिन्न प्रकार के सड़क यातायात और सड़क सुरक्षा नियम बनाये हैं। हमें उन सभी नियमों और नियंत्रकों का पालन करना चाहिये जैसे रक्षात्मक चालन की क्रिया, सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल, गति सीमा को ठीक बनायें रखना, सड़क पर बने निशानों को समझना आदि।

 

 

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