बीजेपी के अपने दम पर सरकार बनाने के दावे, विज्ञापन के जरिये चिराग ने फिर दिखाया तेवर और नीतीश का दलित कार्ड

पटना। लहरों के विपरीत चलना नीतीश का इतिहास रहा है और अटकलों को धता बता चौंकाने वाले फैसले लेने का उनका अंदाज रहा है। साल 1977 में जब जनता पार्टी के राम विलास पासवान और लालू प्रसाद यादव जैसे कद्दावर नेता लोकसभा चुनाव जीत रहे थे, उस वक्त नीतीश कुमार हरनौत से विधानसभा चुनाव तक नहीं जीत सके थे। इसमें भी सबसे हैरानी वाली बात ये रही थी कि नालंदा जिसे कुर्मी बाहुल इलाका माना जाता है, उसमें नहीं जीत पाए थे। हालांकि साल 1985 में इंदिरा गांधी के हत्या के बाद जहां सभी नेता सहानुभूति लहर में बह गए, वहीं नीतीश कुमार ने हरनौत से जीत हासिल की।
03 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री रहने वाले नीतीश ने 2005 के चुनाव में सोशल इंजिनियरिंग का ऐसा करिश्मा कर दिखाया कि 15 साल के लालू राज को उखाड़ फेका। 2005 में जब नीतीश कुमार सत्ता में आये तो दलित राजनीति को धीरे धीरे महादलित कलेवर देने लगे। दलित समुदाय की करीब दो दर्जन जातियों को मिलाकर महादलित बना दिया गया। लेकिन पासवान को उससे बाहर रखा गया था। नीतीश कुमार की दलील रही कि पासवान लोगों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति बाकी दलों से बेहतर है। हालांकि साल 2018 में अंबेडकर जयंती के मौके पर नीतीश कुमार ने फिर से पासवान को दलितों में शामिल किये जाने की घोषणा जरूर कर दी। इन दिनों नीतीश कुमार ने बड़ा दलित कार्ड खेल दिया है.मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति- जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सर्तकता मीटिंग में बड़ा आदेशदे दिया है। सीएम ने एससी-एसटी परिवार के किसी सदस्य की हत्या होने पर पीड़ित परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान बनाए जाने का निर्देश दे दिया है।
बिहार में दलित और जातिगत गोलबंदी की राजनीति किस कदर चरम है इसका अंदाजा हालिया घटित कुछ घटनाक्रम को देख कर लगा सकते हैं। चिराग पासवान ने पटना के अख़बारों में अपने पार्टी के पूरे पेज के विज्ञापन में जो दो लाइन लिखी “वो लड़ रहे हैं हम पर राज करने के लिए और हम लड़ रहे हैं बिहार पर नाज़ करने के लिए” इससे साफ़ था कि उनके निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। चिराग पासवान की रणनीति साफ़ है, सत्ता विरोधी और नीतीश के खिलाफ कुछ तबकों में असंतोष को भांप वो अपने आप को नीतीश के सामने बिहार की राजनीति में खड़ा करना चाहते हैं। उन्हें मालूम हैं कि एक अच्छा ख़ासा तबका और वर्ग हैं जो नीतीश के ख़िलाफ़ है लेकिन तेजस्वी यादव को लालू-राबड़ी के शासन काल के कारण वोट नहीं दे सकता और चिराग इसी वोटर पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। साथ ही उनके बयानों पर गौर करेंगे तो वो बीजेपी और पीएम मोदी के प्रति नरम रूख अपना और विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने के ऐलान के साथ ही मोदी समर्थक वर्ग और वोटर को अपने ख़िलाफ़ भी बोलने का मौक़ा नहीं दे रहे हैं।
नीतीश की चिराग को उपेंद्र कुशवाहा बनाने की चाह
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चिराग़, आगामी विधानसभा चुनाव में नीतीश का कुछ बिगाड़ नहीं सकते। इसको धरातल की कसौटी पर परखने के लिए कुछ संदर्भों से रूबरू करवाते हैं। अमित शाह से लेकर बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा बार-बार नीतीश को राजग के मुख्यमंत्री पद का चेहरा बता चुके हैं। लेकिन फिर भी नीतीश कुमार को भविष्य की चिंता खाये जा रही है। 2019 के आम चुनाव से पहले ही राजग से उपेंद्र कुशवाहा का पत्ता साफ करा चुके नीतीश कुमार को अब लोजपा और विशेष रूप से चिराग पासवान खटकने लगे हैं। जिसके बाद नीतीश कुमार जेडीयू को दलित चेहरों से सजाने में जुट गये हैं। जीतनराम मांझी को भी नीतीश कुमार इसीलिए खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। नीतीश की कोशिश होगी कि कैसे पासवान को बिहार में एक दायरे में सीमित करके रख दें। चिराग का काट करने के लिए नीतीश ने जब जीतन राम मांझी को शामिल कराया तो उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि उनका तालमेल नीतीश कुमार की जदयू से है, न कि भाजपा से। दरअसल यह बयान चिराग़ को चिढ़ाने के लिए और सीटों के तालमेल पर उनकी मांगों को कम करने के लिए किया गया है। जिस तरह एनडीए में रहते हुए लोक जनशक्ति पार्टी की दोस्ती केवल बीजेपी से बताई जा रही है, ठीक उसी तरह मांझी एनडीए में रह कर जेडीयू के दोस्त रहेंगे। एनडीए में चिराग पासवान बीजेपी के साथ रहेंगे तो मांझी नीतीश कुमार को मजबूती देंगे। जिसके बाद अब नीतीश ने दलितों को लुभाने के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सतर्कता मीटिंग में आदेश दिया कि अगर एससी-एसटी परिवार के किसी सदस्य की हत्या होती है तो वैसी स्थिति में पीड़ित परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान बनाया जाए। सीएम नीतीश ने अफसरों से कहा कि तत्काल इसके लिए नियम बनाएं, ताकि पीड़ित परिवार को लाभ दिया जा सके। 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में दलित जातियों की 16 प्रतिशत भागीदारी है। इसी के मद्देनजर साल 2005 में नीतीश कुमार की सरकार ने 22 में से 21 दलित जातियों को महादलित घोषित कर दिया था और 2018 में पासवान भी महादलित वर्ग में शामिल हो गए थे।
आक्रामक चुनाव प्रचार के मूड में बीजेपी
केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने एक इंटरव्यू में साफ कहा कि हम अपने दम पर बिहार में सरकार बना सकते हैं, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन, हम 1996 से जेडीयू के साथ साझेदारी में हैं, और हम इसे तोड़ना नहीं चाहते हैं, न ही ऐसा करना चाहते हैं। हम अपने दोस्तों को नहीं छोड़ते हैं। बीजेपी सांसद आरके सिंह के बयान से ऐसा लग रहा है कि इस बार एनडीए में सीट शेयरिंग का फॉर्म्यूला कुछ बदला-बदला नजर आ सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए बीजेपी आक्रामक चुनाव प्रचार को धार देने में जुटी है। वहीं, राजनीतिक समीकरण को साधने के लिए बीजेपी के एक से बड़े दिग्गज नेता अगले सप्ताह बिहार दौरे पर पहुंच रहे हैं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष अगले सप्ताह पटना में होंगे। कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार में राजग की राजनीति कुछ इस प्रकार की चल रही है जैसे बीजेपी चाहती है कि नीतीश कुमार के मुकाबले उसकी ज्यादा सीटें आयें ताकि चुनाव बाद ज्यादा दबाव कायम किया जा सके। ठीक वैसे ही नीतीश कुमार चाहते हैं कि पासवान की पार्टी लोजपा के हिस्से में इतनी कम सीटें आयें कि पार्टी इतनी दब जाये कि उठ कर खड़ा होना मुश्किल हो।

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.