ब्रिटिश संसद में भारत की आजादी की आवाज थे दादा भाई नौरोजी

Bal Mukund Ojha

चार सितम्बर दादाभाई नौरोजी जयंती के रूप में इतिहास में दर्ज है। दादाभाई नौरोजी प्रख्यात राजनीतिज्ञ थे, जिनका नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम का पर्याय माना जाता है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत में एक बरगी राजनीतिक शून्यता आ गयी थी। ऐसे में दादा भाई नौरोजी ने देश की स्वतंत्रता की आवाज उठा कर वातावरण को गरमा दिया। 1855 में पहली बार नौरोजी ब्रिटेन पहुंचे। वहां की समृद्धि देख स्तब्ध रह गए। वह समझने की कोशिश करने लगे कि उनका देश इतना गरीब और पिछड़ा क्यों है। ब्रिटिश पार्लियामेंट में पहुंचने वाले एशिया के पहले शख्स थे। उन्होंने 1892 में चुनाव जीता था। दादा भाई नौरोजी ने ए. ओ. ह्यूम और दिनशॉ एदुलजी वाचा के साथ मिलकर साल 1985 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी महात्मा गांधी से पहले वो भारत के सबसे प्रमुख नेता थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वे संस्थापक अध्यक्ष थे। उन्हें वर्ष 1886 में इसका अध्यक्ष चुना गया। इसके बाद उन्होंने 1893 और 1906 में भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। दुनिया भर में नौरोजी की पहचान जातिवाद और साम्राज्यवाद के विरोधी की थी। नौरोजी ने सार्वजनिक रूप से 1900 के दशक में स्वराज की मांग शुरू की थी। उन्होंने ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में अंग्रेजों के खिलाफ पुरजोर तरीके से भारतियों की आवाज उठाई थी। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन एक “दुष्ट” ताकत है जिसने अपने साथी भारतीयों को गुलाम जैसी स्थिति में रखा है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेनरी कैंपबेल-बैनरमैन से उन्होंने कहा कि यही उनके साम्राज्यवाद की गलतियों को सुधारने का तरीक़ा है। हालाँकि ब्रिटेन सरकार ने उनकी मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया पर वे दुनिया के समक्ष भारत की आजादी की बात रखने पर सफल हुए। दादा भाई नौरोजी ने ब्रिटिश संसद में भारतीयों की गरीबी और अशिक्षा का मुद्दा उठाया था और इसके लिए ब्रिटिश सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।
भारतीय राजनीति के पितामह दादा भाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को मुम्बई में हुआ था। वह दिग्गज राजनेता, उद्योगपति, शिक्षाविद और विचारक भी थे। 1845 में एल्फिन्स्टन कॉलेज में गणित के प्राध्यापक हुए। यहाँ के एक अंग्रेजी प्राध्यापक ने इन्हें श्भारत की आशाश् की संज्ञा दी। अनेक संगठनों का निर्माण दादाभाई ने किया। 1851 में गुजराती भाषा में श्रस्त गफ्तारश् साप्ताहिक निकालना प्रारम्भ किया। 1867 में श्ईस्ट इंडिया एसोसियेशनश् बनाई। लन्दन के विश्वविद्यालय में गुजराती के प्रोफेसर बने। 1869 में भारत वापस आए। 1885 में श्बम्बई विधान परिषदश् के सदस्य बने। 1886 में श्होलबार्न क्षेत्रश् से ब्रिटिश पार्लियामेंट के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन असफल रहे। 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए। 1886 व 1906 ई. में वह श्इंडियन नेशनल कांग्रेसश् के अध्यक्ष बनाए गए। 1840 के दशक में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला जिसके कारण रूढ़िवादी पुरुषों के विरोध का सामना करना पड़ा. लेकिन उनमें अपनी बात को सही तरीक़े से रखने और हवा का रुख़ मोड़ने के अद्भुत क्षमता थी। उनका 1917 में निधन हो गया था।

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