जहर घोल रहे वाहनों पर नहीं है कोई लगाम

बाल मुकुन्द ओझा

कोरोना वायरस के दौरान हुए लोकडाउन ने प्रकृति को नया जीवन देने का प्रयास किया था। इंसानी गतिविधियां सड़कों पर न होने से हवा में प्रदूषण कम हुआ है और ओजोन परत में सुधार के संकेत मिले। वायु प्रदूषण में कमी के चलते स्वच्छ हवा में सांस का सुखद एहसास हुआ। जल, जंगल और जमीन साफ हुई। मगर यह सुखद एहसास जल्द ही गायब हो गया जब सामान्य गतिविधियॉं फिर संचालित हुई। विशेषकर जहरील धुंवा फेंक रहे वाहनों ने बच्चे लेकर बुजुर्ग को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया। इससे वातावरण प्रदूषित होने के साथ ही लोगों की सेहत भी खराब हो रही है। ट्रैफिक पुलिस चेकिंग अभियान तो जब-जब चलाती रहती है लेकिन वाहनों के प्रदूषण से संबंधित जांच नियमित रूप से नहीं कराई जाती। कोई रोक टोक नहीं होने से वाहन चालक भी वायु प्रदूषण के प्रति बेपरवाह रहते हैं। सड़कों पर वाहनों की तादात तेजी से बढ़ी है। ऐसे से वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं जो तेज ध्वनि के साथ ही साइलेंसर से गाढ़ा धुआं फेंकते हुए चलते हैं। परिवहन विभाग ने वाहनों के प्रदूषण संबंधी मानक तय कर रखे हैं। विभिन्न स्थानों पर वाहनों के प्रदूषण की जांच के लिए अधिकृत केंद्र खुले हैं। मगर वाहन स्वामी अपने वाहनों की जाँच नहीं कराते है। इसका एक कारण वाहन पुराना और कंडम होना भी है।
सड़कों पर बढ़ती वाहनों की संख्या और इससे पैदा होने वाला धुआं पूरी दुनिया के लिए खतरा बन गया है। वाहनों से निकलने वाला धुआं न केवल जानलेवा है अपितु विभिन्न बीमारियों का कारक भी है। यह धुआं हवा को दूषित कर रहा है। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) के विशेषज्ञों का कहना है कि डीजल के वाहनों से निकलने वाले धुएं से कैंसर होता है। खदानों और रेलवे में काम करने वालों व ट्रक ड्राइवरों पर शोध के आधार पर इन विशेषज्ञों ने पाया कि यह धुआं यकीनी तौर पर फेफड़े को कैंसर देता है। चौराहों पर लगातार वाहनों की लाइनें लगने और उनके स्टार्ट रहने से फैलने वाला धुआं लोगों को दिक्कतें दे रहा है। देखा गया है सम्पूर्ण देश में वाहनों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। इससे वाहनों से निकलने वाला धुआं हवा को जहरीला बना रहा है। इससे आम लोगों के स्वास्थ्य को खतरा है। इसके साथ ही शहर के चौराहों और शहर के व्यस्ततम मार्ग पर लगने वाला जाम भी वायु प्रदूषण को बढ़ा रहा है।
एक सर्वे रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली करीब दो-तिहाई मौतें डीजल वाहनों के धुएं से हो सकती हैं। हमारे देश में शहरों के साथ ग्रामीण अंचलों में भी वाहनों के धुंवे से हवा जहरीली होती जा रही है। एक रिसर्च के अनुसार वाहनों से निकलने वाले धुएं में जो नैनोपार्टिकल्स होते हैं वो आपकी ब्लड स्ट्रीम यानी खून की धारा में भी शामिल हो सकते हैं और वहां से आपके दिल में पहुंचकर उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक प्रदूषण के ये कण दिल में खून पंप करने वाली आर्टरीज में धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं। अगर लंबे समय तक धूल और धुएं के कणों से सामना होता रहे तो आर्टरीज में एक तरह की परत जमा हो जाती है। इससे शरीर की धमनियां सिकुड़ जाती हैं और हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा पैदा हो जाता है। आज भी हम इस चलती फिरती मौत से जाने अनजाने में बेफिक्र हो रहे है और अपने वाहनों की भली भांति सार संभाल में उदासीनता बरतते है और यही कारण है की धुंवा जनित बीमारियों के गाहे बगाहे शिकार हो जाते है। देश की सड़कों पर हर साल वाहनों की बढ़ती संख्या भी प्रदूषण के बढ़ते स्तर के लिए जिम्मेदार है। डीजल वाहनों से निकलने वाले धुंवे का प्रदूषण फैलाने में योगदान कम नहीं होता। प्रदूषण जाँच की गाड़ियां आजकल स्थान स्थान पर खड़ी मिलती है मगर हम इस भागदौड़ भरी लाइफ स्टाइल में पांच मिनिट का समय भी नहीं निकालते। हमारी यही लापरवाही हमारे स्वास्थ्य को धीमें जहर से मौत के मुंह की और खींचती रहती है। वैसे तो आज पूरी दुनिया वायु प्रदूषण का शिकार हो रही है, लेकिन भारत के लिए यह समस्या कुछ ज्यादा ही घातक होती जा रही है। देश में लाखों वाहन ऐसे है जो वर्षों पुराने होकर खटारा हो गये हैं। ऐसे वाहन आपको हर शहर में खतरनाक धुंवा छोड़ते मिल जायेंगे। ये वाहन पर्यावरण को प्रदूषित करने के साथ प्रदूषण भी फैला रहे हैं। जिससे लोग विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं। लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि प्रदूषित धुंवा फैलाने वाले वाहनों की सख्ती से रोकथाम की जाये तो पर्यावरण में सुधार होने के साथ जनजीवन को भी बड़ी क्षति से बचाया जा सकता है।

 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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