नवीन शिक्षा नीति 2020-स्व से सर्वस्व की ओर

तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये। अनायासाडपरं कर्म विद्यान्या शिल्प नैपुण्यम्

प्रो. करुणेश कुमार शुक्ल

नवीन शिक्षा नीति (NEP-2020) भारत की पौराणिक नीति-रीति के आधार पर वर्तमान की आवश्यकता तथा भविष्य की आवश्यकता के मध्य सह-संबंध स्थापन का प्रयास है। नई शिक्षा नीति सुलभता, सहजता, समर्थता, सृजनात्मकता, समग्रता, समन्वयन, सफलता तथा सामंजस्यता के अष्ट गुणों (गुणाष्टक) की प्रतीति कराती है। उपरोक्त गुणों के विवेचन के क्रम में सुलभता अर्थात सभी को शिक्षा की प्राप्ति को संभव बनाना अर्थात बालकों से लेकर प्रौढ़ तक को यथोचित शैक्षणिक परिवेश प्रदान करना। इस हेतु 5+3+3+4 स्कूली पाठ्यक्रम 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% GER, पूर्व – विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के सार्वभौमिकीकरण तथा प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार से शत प्रतिशत प्रौढ़ साक्षरता के प्रावधान नई नीति में वर्णित हैं। सहजता अर्थात बंधन – मुक्त (अनुशासन रहित नहीं) शिक्षा प्रदान करना एवं प्राप्त करना। इस संदर्भ में नवीन शिक्षा नीति में स्कूली बस्ते के बोझ को कम करना, कक्षा 5 तक मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करना तथा स्कूल विद्यालय को लीक से हटकर शिक्षा प्रदान करने के प्रावधान को सम्मिलित किया गया है। साथ ही पाठ्यक्रम के विषय – वस्तु को कम एवं सरल करना भी इस संदर्भ में एक व्यवहारिक कदम है। कंप्यूटर, विभिन्न ऐप एवं ऑनलाइन द्वारा शिक्षा एक प्रभावी कदम सिद्ध होगा।
सैद्धांतिक ज्ञान + कौशल= समर्थता। अर्थात विद्या प्राप्त करने के वास्तविक उद्देश्य की प्राप्ति नवीन शिक्षा नीति व्यवसायिक शिक्षा के कौशल आधारित शिक्षण-प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करने वाले प्रावधानों से सुसज्जित है। इस प्रकार जीवन के एक लंबे समय तक स्कूली एवं विद्यालय शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी रोजगार – रहित की संभावना को हतोत्साहित करने हेतु ही 2025 तक स्कूली एवं उच्च शिक्षा के द्वारा कम से कम 50% शिक्षार्थियों को व्यवसायिक शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। साथ ही दिव्यांग बच्चों को प्रति विकलांगता प्रशिक्षण (क्रास विकलांगता) उपयुक्त प्रौद्योगिकी आधारित उपकरण तथा संसाधन केंद्र की सहायता प्रदान करने का लक्ष्य है।
सृजनात्मक अर्थात नवीन कृति का जन्म। यह निसंदेह शिक्षा विशेषत: उच्च शिक्षा एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा की अनिवार्य विशेषता है कि नवीन अभिनव ज्ञान की खोज का प्रयास अनवरत हो। इस संदर्भ में नवीन नीति गुणवत्तापरक प्रौद्योगिकी युक्त भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है।
संपूर्ण उच्च शिक्षा के लिए सामान्य नियामक संस्था (HECI) की स्थापना का प्रावधान संपूर्ण उच्च शिक्षा के कार्यों जैसे नियमन, मानक स्थापन, वित्त पोषण एवं मान्यता को एक छत के नीचे काम करने का कार्य किया जाना है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना का प्रावधान है इसके माध्यम से सभी विषयों में उत्कृष्ट अनुसंधान प्रस्तावों के वित्तपोषण हेतु कार्य किए जाएंगे जो निश्चित रूप से शोध एवं विकास का एक ऐसा सकारात्मक वातावरण निर्मित करेंगे जो गुणवत्तापरक, वैश्विक स्तर के ज्ञान सृजन में सहायक होगा।
समग्रता अर्थात भेद-भाव रहित, सर्वजन हिताय शैक्षणिक प्रणाली। इस संदर्भ में विभिन्न प्रकार के समग्रता स्थापन का प्रयास किया गया है। उच्च शिक्षा में मल्टीपल इंट्री और एग्जिट, 8 क्षेत्रीय भाषाओं में ई- कोर्से प्रारंभ करना, 3 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए अर्ली चाइल्डहुड केयर एवं शिक्षा फाउंडेशन व न्यूमरेसी पर जोर, कौशल विकास, कोडिंग शिक्षा, शिक्षणेत्तर गतिविधियों पर संकेंद्रण, उच्च शिक्षा में प्रवेश हेतु एक प्रवेश परीक्षा (कुछ अपवादों के साथ), भारतीय सांकेतिक शिक्षा का विकास, प्रौढ़ शिक्षा पर ध्यान, शारीरिक शिक्षा पर बल आदि कतिपय ऎसे बिंदु हैं जो समग्रता अर्थात शिक्षा के समग्र भाव का बोध कराते हैं।
त्रिभाषा सूत्र का विस्तार उत्तरदायित्वपूर्ण शिक्षा खोज एवं विमर्श तथा विश्लेषण आधारित शिक्षा निजी एवं सार्वजनिक उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए समान मानदंड तथा भारतीय शिक्षा सेवा, राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान, राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण आदि का गठन शिक्षा के क्षेत्र में समन्वयकारी प्रयासों के रूप में देखा जा सकता है।
रोजगार परक शिक्षा विशेष रूप से उच्च तकनीकी शिक्षा जिसके शिक्षार्थी रोजगार सृजन करने वाले बनें, शिक्षकों को कार्य अवधि में कार्य संस्कृति एवं वातावरण प्रदान करने में चूक, विशिष्ट शिक्षकों की आवश्यकता के आकलन में विफलता, प्रभावी ढंग से सीखने की प्रवृत्ति (इफेक्टिव लर्निंग) तथा उच्चतर शिक्षण में गुणवत्ता में कमी,उन तत्वों के रूप में उल्लेखित किए जा सकते हैं जो शिक्षा को सफल, शिक्षा विद्यार्थी को सफल विद्यार्थी तथा शिक्षक को सफल शिक्षक बनाने में बाधक हैं। इस नई शिक्षा नीति में इनको दूर करने का प्रयास है। व्यावहारिक ज्ञान, कौशल आधारित शिक्षण – प्रशिक्षण, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण तथा स्वरोजगार के प्रति सम्मान की भावना का जागरण जहां शिक्षार्थियों को सफल, सक्षम अध्येता, कार्मिक संसाधन के रूप में परिवर्तित करने में सहायक होगा वहीं साथ ही शिक्षकों को भी अपनी मनोदशा, प्रवृत्ति, जड़ता, एकरसता को दूर करने, परिवर्तित करने में सहायक होगा।
सिद्धांत एवं व्यवहार प्राय: पृथक रूप से विचारित किए जाते हैं। अन्य विषय या क्षेत्र में एवं संतुष्टि हेतु यह एक सीमा तक उचित सिद्ध हो सकता है। किंतु जब प्रश्न शिक्षा का हो और ऐसी शिक्षा का जो सार्थकता के भाव से युक्त हो तब सिद्धांत एवं व्यवहार (व्यावहारिक/प्रायोगिक ज्ञान ) का एकीकरण अनिवार्य हो जाता है। शिक्षक का उद्देश्य सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान एवं छात्रों का मूल्यांकन ही नहीं अपितु प्रथम उद्देश्य छात्रों में चारित्रिक गुणों का विकास, मूल्यों-संस्कारों का बीजारोपण तथा किसी भी भावी चुनौती से सक्षमता के साथ मुकाबला करने की क्षमता के विकास को संभव बनाना है।
शिक्षक को महज Educator (शिक्षा विशारद) नहीं बनना होगा वरन अब नवीन वैश्विक चुनौतियों के परिवेश में Edupreneur (शैक्षिक उद्यमी) के नवीन एवं बहुआयात्मक रूप में अपने को परिवर्तित करना होगा तभी वे वैश्विक स्तर के विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर की चुनौतियों का सामना करने हेतु तैयार कर पाएंगे।
गुण- दोष से विहीन इस नश्वर संसार में कुछ भी नहीं है, कमोवेश दोनों विशेषताएं समस्त व्यक्तियों / पदार्थों में होती हैं। यह हमारा विवेक, व्यवहार करने, उपयोग में लाने का दृष्टिकोण ही है जो अच्छा-बुरा की प्रतीति कराता है। नवीन शिक्षा नीति- 2020 इसका अपवाद नहीं हो सकता किंतु यह उतनी ही सफल एवं प्रभावी होगी जैसा हम शिक्षक इसे बनाएंगे, बनाना चाहेंगे। आइए हम सब मिलकर इसे प्रभावी तरीके से लागू करके अपने देश को अग्रणी बनाएं।

( लेखक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान,जमशेदपुर के निदेशक हैं )

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