करिश्माई, नये विचारवाला व महत्वाकांक्षी अध्यक्ष कहां से लायेगी कांग्रेस ?

विष्णुगुप्त

कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक बेनतीजा समाप्त हो गयी । नये अध्यक्ष की खोज और नेतृत्व परिवर्तन पर विचार को छह माह के लिए आगे बढा दिया गया। इस पूरे प्रकरण पर कांग्रेस की कमजोरी ही झलकी और कांग्रेस के अंदर वरिष्ठ नेताओं के चिटठी प्रकरण पर राहुल गांधी का प्रहार सामने आया जो कांग्रेस की बढती समस्याओं को और भी बढाने वाला साबित हुआ। राहुल गांधी की इस बात का समर्थन किया जा सकता है कि पार्टी की बात को पार्टी मंच पर ही उठायी जानी चाहिए , न कि मीडिया में सनसनी फैलाने के लिए एक हथकंडा के तौर पर उपयोग किया जाना चाहिए। चिट्ठी प्रकरण में जो नेता राहुल गांधी के प्रहार पर अपनी निष्ठा को लेकर चिंतित और नाराज दिखे, उनकी अपनी सोच या फिर उनका अपना अस्तित्व कहां है, ये परजीवी संस्कृति के हैं। कपिल सिब्ब्ल और गुलाम नवी आजाद को ही ले लीजिये। कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट के सनसनी खेज वकील जरूर हो सकते हैं, मुकदमों में अपनी वकालत से कांग्रेस को राहत दिला सकते हैं पर उनकी छवि एक ऐसे राजनेता की कभी नहीं रही है जो अपने बल पर कोई लोकसभा सीट पर जीत दर्ज कर सके या फिर कांग्रेस का नेतृत्व कर सके। ठीक इसी प्रकार गुलाम नवी आजाद को लेकर धारणा है। गुलाम नवी आजाद जम्मू-कश्मीर से आते हैं। गुलाम नवी आजाद कांग्रेस का मुस्लिम चेहरा जरूर हैं पर इनकी छवि राजनीतिक परजीवी की रही है, राज्य सभा में बार-बार भेज कर कांग्रेस इनकी राजनीति को चमकाती रही है। नेतृत्व परिवर्तन का समर्थन को लेकर चिट्ठी लिखने वाले अन्य कांग्रेसी नेताओं की स्थिति भी यही है। फिलहाल सोनिया गांधी चिट्ठी प्रकरण पर मीडिया का सहारा लेने वाले कांग्रेसी नेताओं का माफ कर दिया है।
नेतृत्व परिवर्तन का प्रश्न कांग्रेस को आगे भी कमजोर करते रहेगा, कांग्रेस की जगहंसाई भी होती रहेगी। कांग्रेस के अंदर में नेतृत्व परिवर्तन का प्रश्न बहुत ही जटिल हैं। जब तक इस जटिल प्रश्न का समाधान नहीं कर लिया जाता है तब तक कांग्रेस अपने आप को मजबूत नहीं कर सकती है। सोनिया गांधी वृद्ध हो चुकी है, बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह खूद इतनी कमजोर हो गयी हे कि खुद के चाहने के बावजूद भी कांग्रेस का मजबूती के साथ नेतृत्व नहीं कर सकती है। इसी कारण सोनिया गांधी खुद नया अध्यक्ष खोजने की वकालत करती है। राहुल गांधी अध्यक्ष रहते हुए अपनी असफलताओं को लेकर इस्तीफा दे चुके थे। राहुल गांधी ने इस्तीफा देकर नया अध्यक्ष चुनने के लिए कह दिया था और घोषणा की थी कि वह किसी भी परिस्थिति में फिर से अध्यक्ष नहीं बनेंगे। अभी तक वे अपनी इस घोषणा पर कायम है। कांग्रेस ने लंबे समय तक विचार-विमर्श खूब की, पैंतरेबाजी भी दिखायी पर कांग्र्रेस राहुल गांधी का विकल्प नहीं खोज पायी। किसी एक नेता पर कांग्रेस के अंदर कोई सहमति नहीं बन पायी। हार कर कंाग्रेस के नेताओं को अपनी खानदानी विरासत की ओर झांकना पड़ा। सोनिया गांधी को ही फिर से अंतरिम अध्यक्ष चुनने के लिए बाध्य होना। कांग्रेस के अंदर में प्रियंका गांधी को एक अचूक हथियार माना जाता था। प्रियंका गांधी के अंदर इन्दिरा गांधी की छवि देखी जाती थी। कांग्रेसी कहते थे कि प्रियंका आयेगी और नरेन्द्र मोदी को हवा कर देगी। प्रियंका गांधी के राजनीति में आने के बाद भी कांग्रेस को कोई मजबूती नहीं मिली, नरेन्द्र मोदी के लिए कोई परेशानी नहीं खडी कर सकी। लोकडाउन के दौरान मजदूरो की घर वापसी को लेकर प्रियंका गांधी का हथकंडा आत्मघाती ही साबित हुआ। बसों की जगह टैप्मू और स्कूटर के नंबर दिये गये थे। प्रियंका गांधी की अनुभवहीन राजनीति के कारण कांग्रेस की जगहंसाई हुई और यूपी कांग्रेस अध्यक्ष को जेल तक जाने के लिए विवश होना पडा।
कांग्रेस के अंदर नेतृत्व परिवर्तण की जटिलाताएं कितनी बडी है और गंभीर हैं, यह भी जगजाहिर है। सोनिया गांधी अब किसी भी परिस्थिति में कांग्रेस के लिए उपयुक्त पात्र नहीं है और स्वास्थ्य भी इसके लिए कोई सकरात्मक स्थिति नहीं उत्पन्न करता है। अगर कांग्रेसी सोनिया गांधी को ही अध्यक्ष बनाये रख सकते हैं तो फिर सोनिया गांधी की सक्रियता संभव नहीं होगी। सोनिया गांधी कांग्रेसियों का कुशल और सर्वश्रेष्ठ नेतृत्व नहीं दे सकती है। राहुल गांधी अगर अपनी घोषणा को तोड़ कर फिर से अध्यक्ष बनते हैं तो फिर उनकी एक और जगहसंाई होगी, उन्हें उपहास का विषय बनाया जायेगा। राहुल गांधी ऐसे भी जगहसांई का पात्र बनते रहते हैं, उनकी बोली और आचरण उपहास के केन्द्र में खड़ा रहता है। रही बात प्रियंका गांधी को तो अभी तक कांग्रेस के अंदर मे एक ही संभावना है। अभी भी कांग्रेस के अंदर में प्रियंका गांधी को एक संभावना के तौर पर देखा जाता है। पर रार्बट बढेरा के भ्रष्टाचार के कारण प्रियंका गांधी की छवि भी मोदी के विकल्प के तौर पर बनेगी, यह कहना मुश्किल है। प्रियंका गांधी भी कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की उत्सुक नहीं है।
सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने साफ कर दिया है कि अगला अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर का होना चाहिए। ऐसी अवधारणा राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद के इस्तीफे के बाद भी आयी थी। लेकिन उस समय भी कांग्रेस ने गांधी परिवार से अलग अध्यक्ष नहीं खोज पायी थी। आम धारणा यह है कि जब राहुल गांधी के इस्तीफे के उपरांत कांग्रेस गांधी परिवार से अलग अध्यक्ष नहीं खोज पायी तो फिर इस बार भी कांग्रेस के नेतागण गांधी परिवार से अलग अध्यक्ष कहां से खोजेंगे?कांग्र्रेस को आज एक ऐसे अध्यक्ष की जरूरत है करिश्माई छवि रखता है, विचारवान हो और जिसके अंदर दूरदृष्टि भी हो। कांग्रेस को अभी गिरती छवि और साख को कोई करिश्माई, विचारवाण और दूरदृष्टि वाला नेता ही संभाल सकता है, नरेन्द्र मोदी के सामने कांग्रेस को एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। पर प्रश्न यही है कि कांग्रेस करिश्माई, विचारवाण और दूरदृष्टि वाला नेता कहां से लायेगा और कहां से पैदा करेगा? कांग्रेस के अंदर में करिश्माई नेता जो थे वे सभी इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के कारण निपट गये या फिर कांग्रेस से बाहर खदेड़ दिये गये। कांग्रेस में कभी रीढ वाले नेता पसंद नहीं किये गये, उन्हें अध्यक्ष के लायक नहीं समझा गया। कांग्रेस के अंदर चमचा संस्कृति बैठी हुई है। एक अवधारणा भी यही है कि जो जितना बडा चमचा होगा वह कांग्रेस के अंदर में उतना ही बडा कद हासिल करेगा। यह बात पूरी से पक्की है। लेकिन निष्कर्ष यह है कि चमचे किस्म के लोग परिर्वतन और संघर्ष के वाहक कभी नही बन पाते हैं। आज पूरे कांग्रेस को ढूढ लीजिये, एक भी ऐसे नेता नहीं मिलेंगे जिनकी छवि देशव्यापी हो और जिनका जनाधार तथा स्वीकार्यता देशभर में है।
अगर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से अलग कोई कांग्रेस का अध्यक्ष बन भी गया तो उसकी हैसियत क्या होगी? क्या वह सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की छत्रछाया से कांग्रेस को बाहर निकाल सकता है? क्या कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता उसी तरह से सम्मान देना चाहेंगे जिस तरह का सम्मान सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को देते है? सिर्फ नया अध्यक्ष चुन लेने से राजनीतिक परिवर्तन की जंग नहीं जीती जाती है। मान लिया कि कांेई कांग्रेसी कांग्रेस का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन भी लिया गया तो फिर वह उसी तरह अपनी ओर भीड़ खीच सकता है जिस तरह से भीड़ राहुल गांधी और प्रियंका गांधी खीचते हैं। भारतीय राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सिर्फ राजनीतिक रणनीतियो की जरूरत नहीं होती है बल्कि आम जनता को आकर्षित करने वाले नेता की भी जरूरत होती है। इसका उदाहरण नरेन्द्र मोदी ही है। भाजपा भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के पतन के बाद हाशिये पर चली गयी थी, लगातार दो लोकसभा चुनाव हारी थी भाजपा। कई राज्यों मे भाजपा अपना जनाधार खो दी थी। भाजपा ने दूरदृष्टि दिखायी। नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने अपना भाग्यविघाता चुन लिया था। नरेन्द्र मोदी स्वयं आगे बढकर पार्टी का नेतृत्व किया और पूरे देश की राजनीति को मथ दिया। परिणाम स्वरूप भाजपा का नया अवतार हुआ, भाजपा फिर से केन्द्र की सत्ता में वापसी की। नरेन्द्र मोदी आज के समय में देश के सबसे शक्तिशली नेता हैं। कांग्रेस को भी नरेन्द्र मोदी जैसा कोई करिश्माई नेता ही फिर से सत्ता दिला सकता है।
कांग्रेस के अंदर में अभी भी बूढी संस्कृति के नेता आत्मघाती और भस्मासुर बने हुए हैं। कपिल सिब्बल, गुलाम नवी आजाद, पी चिदम्बरम, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी मणिशंकर अय्यर जैसे दर्जनो नेता है जो अतिरंजित और सामंत प्रवृति के सहचर बन कर कांग्रस की जडों मटठा डालने का काम करते हैं। कांग्रेस को अब नौजवानों को आगे लाना होगा। युवा पीढी ही बदलाव की संस्कृति का वाहब बन सकती है। लेकिन अभी भी कांग्रेस के अंदर में वैसीे ही युवाओं की पीढी आगे बढ रही है जो खानदानी हैं। जबकि जरूरत आम युवाओं की भागीदारी की है। कांग्रेस को अब नये अध्यक्ष का प्रश्न हल कर लेना चाहिए। अगर कांग्रेस का अगला अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को छोड़कर यानी कि गांधी परिवार से बाहर का होगा तो फिर यह देश की ऐतिहासिक घटना होगी। हम इस ऐतिहासिक घटना के घटने का इंतजार कर रहे हैं और स्वागत भी करेंगे।

 

 

 

 

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