आधी आबादी को कब मिल सकेगी पूरी आजादी

बाल मुकुन्द ओझा

अंतराष्ट्रीय महिला समानता दिवस हर वर्ष 26 अगस्त को मनाया जाता है। इस अवसर पर महिलाओं के अधिकार, उनके सम्मान और अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी की चर्चा होती है। महिलाओं को प्रोत्साहन देने की बात होती है। यह दिन महिलाओं को उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक तरक्की दिलाने का दिन है। महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यापार का अथवा देश को चलाने की बात हो या फिर घर को संभालने की महिलाएं कहीं पीछे नहीं है। यहां तक कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी वे बखूबी निभा रही हैं। महिलाओं ने हर जिम्मेदारी को पूरी जिम्मेदारी और निष्ठा से निभाया है। इसके बावजूद आज भी अधिकांश मामलों में उन्हें समानता हासिल नहीं हो पाई है। संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिये लाया गया ‘महिला आरक्षण विधेयक ’2010 में राज्यसभा से पारित होने के बाद लोकसभा में सालों से लंबित पड़ा है। इस विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि दलित और ओबीसी महिलाओं के लिये अलग से कोटा होना चाहिये। सियासी पार्टियों के निहित स्वार्थों के कारण आज तक आधी आबादी को उसका हक नहीं मिल पाया है ,इससे अधिक दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है। भाजपा सरकार ने भी इस विधेयक को पारित कराने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है। महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 12 सितंबर, 1996 को देवेगौड़ा सरकार के दौरान संसद में पेश किया गया था। इस विधेयक के पारित होने से निश्चय ही भारत की महिलाएं अधिक सशक्त होंगी। भेदभाव कम होगा। लोकतंत्र मजबूत होगा और महिलाओं का सम्मान बढ़ेगा। सबका साथ सबका विश्वास का नारा देने वाली मोदी सरकार इस विधेयक को पारित कर महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ठोस कदम उठा सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुकीं हिलेरी क्लिंटन का कहना है जब तक महिलाओं की आवाज नहीं सुनी जाएगी तब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं आ सकता।
यह दिवस रश्मि होता जारहा है। आज के दिन हमें इस दिखावे और वास्तविकता को समझना होगा। देश में महिला समानता के लिए सबसे पहले बुनियादी स्तर पर काम करना होगा और यह महिलाओं को बराबरी का स्थान मिलने के बाद ही संभव है। मुट्ठी भर महिलाओं के आगे बढ़ने से सम्पूर्ण महिला समाज का उत्थान नहीं होगा। महिला समानता और सुरक्षा आज सबसे अहम मुद्दा है, जिसे किसी भी हालत में नकारा नहीं जा सकता। सच तो यह है कि एक छोटे से गांव से देश की राजधानी तक महिला सुरक्षित नहीं है। अंधेरा होते-होते महिला प्रगति और विकास की बातें छू-मंतर हो जाती हैं। रात में विचरण करना बेहद डरावना लगता है। कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित घर पहुँचने की चिंता सताने लगती है। ऐसे में जरूरी है कि हम नारी समानता और सुरक्षा की बात पर गहराई से मंथन करें।
आजादी के 74 वर्ष बीत जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति गौर करने के लायक है। आये दिन समाचार पत्रों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी खबरों को पढ़ा जा सकता है। स्वतंत्रता के 7 दशक बाद भी ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं को दोयम दर्जे की मार से जूझना पड़ रहा है। यूनीसेफ की रिपोर्ट यह बाताती है कि महिलाएं नागरिक प्रशासन में भागीदारी निभाने में सक्षम हैं। यही नहीं, महिलाओं के प्रतिनिधित्व के बगैर किसी भी क्षेत्र में काम ठीक से और पूर्णता के साथ संपादित नहीं हो सकता। जर्नल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जिन सरकारों में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है वहाँ भ्रष्टाचार कम होता है।
महिला विकास और महिला समानता की दिशा में सबसे बड़ी बाधा भ्रूण हत्या है। भ्रूण हत्या हमारे पुरजोर प्रयासों के बावजूद पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाई है जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है। लड़कियों को शिक्षा ओर रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में हमारे सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बाधाएँ सामने आती हैं। हम लड़कों को आगे बढ़ाने में अपनी रूचि लेते हैं ओर लड़कियों को पीछे रखने में अपनी भलाई समझते हैं। हमें अपनी इसी सोच को बदलना होगा। कहते है कि एक लड़की शिक्षित हुई तो पूरा परिवार शिक्षा की रोशनी से जगमगाने लगेगा। हम चाहते हैं कि लड़कियों को समान अधिकार मिले और देश खुशहाली की ओर कदम बढ़ाये तो हमें अपनी पुरानी सोच को बदलना होगा और लड़कियों को पर्दे के पीछे से बाहर लाकर संसार की प्रगति और विकास की सोच की ओर आगे बढ़ाना होगा।

 

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