खेती बाड़ी से मिला कामयाबी का मुकाम

विमलेश शर्मा

मजबूत इरादों और दृढ़ संकल्प के साथ किसी काम को किया जाए तो विपरित धारा को भी बदला जा सकता है। इसी सोच के साथ एक शिक्षक ने ब्लैक बोर्ड पर बच्चों को पढ़ाना छोड़ हल हाथ में थाम लिया और मात्र साढ़े तीन सालों में खेती-किसानी मेें इतिहास रच डाला। वह भी ऐसे दौर में जब खेती में प्राकृतिक आपदाओं के कारण कर्ज में डूबे किसानों के आत्महत्या करने और गांवों को छोड़ रोजी.रोटी की तलाश में शहरों की तरफ पलायन करने की विचलित कर देने वाली खबरें आ रही हों।
कम समय में बड़े कीर्तिमान
मिट्टी की महक और पसीने की खनक से नए.नए प्रयोग करने वाला ये शख्स और कोई नहीं जयपुर जिले के एक छोटे से गांव भैराणा में जा बसे शिक्षाविद् सुरेन्द्र अवाना हैं। अवाना 38 वर्षों तक शिक्षण संस्थानों के संचालन में जो उपलब्धि हासिल नहीं कर सकेए उससे कहीं अधिक ख्याति खेती.किसानीए पशुपालन में मात्र साढ़े तीन साल के सफर में अर्जित कर ली। ऐसे. ऐसे कीर्तिमान रच डाले जो देश में कहीं नहीं देखने को मिलेंगे। अपनी इस चमत्कारिक यात्रा के बारे में बताते हुए उनका दावा है कि खेती से भी उद्योग की तरह लाखों रुपए की आय की जा सकती है वह भी जीरो बजट में।
किसानों के आइकॉन, मिला राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान
शिक्षक से किसान बने सुरेन्द्र अवाना देश के उन चुनिन्दा किसानों में हैं जिन्हें कृषिए बागवानी और पशुपालन में ऑइकान के रूप में माना जाता है। कृषि क्षेत्र में नवाचारों के कारण उन्हें हाल ही एक लाख रुपए नकद व प्रशस्ति पत्र के साथ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से हलधर पुरस्कार से नवाजा गया है। हलधर ऑर्गिनिक फार्मिंग अवॉर्ड प्राप्त करने वाले अवाना देश के उन दो किसानों में शामिल हैं जिन्हें हाल में यह पुरस्कार दिया गया है। इसी तरह गौ आधारित एवं एकीकृत कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य तथा कृषि विभाग की आत्मा योजना के अन्तर्गत राज्य स्तरीय प्रथम पुरस्कार वे पहले ही प्राप्त कर चुके हैं।
बचपन से थी चाह
पांच.पांच शिक्षण संस्थानों के संचालक सुरेन्द्र अवाना के पुत्र और पुत्रवधु ने जब शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में हाथ बंटाना शुरू कर दिया तो वे बचपन में संजोए अपने सपनो को साकार करने खेतों की तरफ लौट आए। अवाना ने बचपन में अपने दादा के साथ हल से खेतों में बुवाई की थी। खेतों से जुड़ी ये यादें उनके स्मृति पटल पर बनी हुई थी। मन करता था कि सुकून के लिए खेत. खलिहानों की तरफ लौट चलें। अवाना ने इसके लिए सबसे पहले जयपुर के पास कृषि योग्य भूमि खरीदकर उसमें दो देशी गिर गायों के साथ डेयरी की शुरुआत की तथा प्रत्येक सप्ताह दो.दो गाय खरीद साठ गायों की एक गौशाला बना डाली। कृषि भूमि पर गायों के लिए हरे चारे के साथ बाकी बची भूमि पर परम्परागत खेती भी होने लगी।
नवाचार से तोड़ा मिथक
चूंकि वे शिक्षण संस्थानों का बड़ा साम्राज्य छोड़ साधारण खेती.किसानी करने नहीं आए थे। उन्हें तो ऐसे नवाचार करने थेए जिनके बल पर खेती को घाटे का सौदा मानने वालों के नजरिए को बदला जा सके। समग्र खेती यानी एक से अधिक तरह की पैदावार का अनुपम मॉडल विकसित करने वाले सुरेन्द्र अवाना के कृषि फार्म की वर्तमान में विशेषता यह है कि 65 बीधा में फैले फार्म पर परम्परागत खेती के साथ वैदिक कृषिए गिर गाय की डेयरीए जैविक खाद उत्पादनए मत्स्य पालनए उद्यानिकीए जैविक मदर प्लांट नर्सरीए बहुवर्षीय हारा चाराए गौ आधारित खेतीए हर्बल मेडिसन गार्डन विकसित हैए जबकि मरूस्थलीय क्षेत्र राजस्थान में वर्षा आधारित एक खेती ही अधिकांश भाग में होती है।
पांच किलो आठ सौ ग्राम का चकुन्दर
अवाना के फार्म पर अनारए आमए चीकूए अमरूदए खजूरए सेवए बिल्वए आंवलेए नींबूए सीताफलए बैरए पपीतेए चुकन्दर आदि हैं। पांच किलो आठ सौ ग्राम के एक चुकन्दर की पैदावार कर तो उन्होंने एक नया कीर्तिमान रच डाला। अवाना ने प्रयोग के तौर पर काले की गेहूं की पैदावार भी की थी।
रोजगार के अपार अवसर
समग्र खेती को उद्योग बताते हुए अवाना का मानना है कि युवाओं के लिए इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं है। कोरोना के कारण गायए ऑर्गेनिक खेती और आयुर्वेद के प्रति रूझान और बढ़ेगा। ऐसे में कल कारखानों की तरह लोग खेती की तरफ भी फिर से लौटेगे। खेती को लाभप्रद व्यवसाय बनाने के लिए अत्याधुनिक खेती की तकनीक अपनाते हुए कुछ नवाचार जरूर करने पड़ेंगे।
आओ खेतों की सैर को चले
अवाना के यहां कृषि फार्म को सैर.सपाटे का स्थल बनाने की कार्य योजना पर भी काम चल रहा है। फार्म पौंड में नाव तथा उसके पास झूले लगे हुए हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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