कोरोना ने बिगाड़ा बच्चों का शैक्षिक भविष्य

बाल मुकुन्द ओझा

भारत में कोरोना महामारी के बाद स्कूलों का नया सेशन शुरू करने पर अभी भारी असमंजस की स्थिति है। इससे देश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह गड़बड़ा गई है। इस वर्ष मार्च के महीने में लॉकडाउन शुरु होते ही सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया था। भारत में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद 33 करोड़ है जो देश की कुल जनसंख्या का 19.29 फीसदी हिस्सा 6-14 की उम्र के बीच के बच्चे हैं। बहुत सी निजी स्कूलों ने डिजिटल प्लेटफार्म पर पठन पाठन शुरू कर दिया है। सरकारी स्कूलों में ऐसा नहीं हो पाया है। सक्षम अभिभावक अपने बच्चों को ऑनलाइन सुविधा सुलभ करा सकते है मगर गरीब अभिभावक पर्याप्त सुविधा के अभाव में कुछ भी नहीं कर पा रहे है। उन्हें ऑनलाइन कनेक्टिविटी भी नहीं मिल पा रही है। कोरोना वायरस की वजह से भारत के सभी स्कूल बंद हैं और अभी इनके जल्दी खुलने की भी कोई उम्मीद नहीं है। इसलिए ज्यादातर स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। लेकिन भारत में सभी परिवारों की इंटरनेट तक पहुंच नहीं है।
एनसीईआरटी के एक सर्वे से पता चलता है कि भारत के 27 प्रतिशत छात्रों के पास स्मार्टफोन और लैपटॉप नहीं है। 28 प्रतिशत छात्र बार-बार बिजली जाने की वजह से ठीक से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। 33 प्रतिशत छात्रों ने माना कि ऑनलाइन क्लासेज के दौरान वो पढ़ाई पर ठीक से ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं। सर्वे से पता चलता है कि भारत के 27 प्रतिशत छात्रों के पास स्मार्टफोन और लैपटॉप नहीं है। 28 प्रतिशत छात्र बार-बार बिजली जाने की वजह से ठीक से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। 33 प्रतिशत छात्रों ने माना कि ऑनलाइन क्लासेज के दौरान वो पढ़ाई पर ठीक से ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं।
देश में हर रोज 70 हजार से ज्यादा संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि 1 सितंबर से चरणबद्ध तरीके से स्कूल खुल सकते हैं। यदि सरकार सितम्बर में स्कूल खोलती है तो भी पेरेंट्स बच्चों को स्कूल भेजने से पहले चिंतित जरूर हैं।
कोरोना वायरस के दौर में स्कूल खुलने चाहिए या नहीं ? इसे जानने के लिए संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक स्टडी की। इसकी रिपोर्ट में परेशान कर देने वाला सच सामने आया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के करीब 43 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों के लिए साबुन से हाथ धोने की सुविधा नहीं है। दुनिया के करीब 24 प्रतिशत स्कूलों में हाथ धोने के लिए न पानी उपलब्ध है और न ही साबुन। जबकि 19 प्रतिशत स्कूलों में पानी तो उपलब्ध है लेकिन साबुन की सुविधा नहीं है। यानी दुनिया के हर पांच में से दो स्कूलों में साबुन से हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध नहीं है. जो कोरोना से बचने के लिए बेहद जरूरी है।
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि दुनिया के 42 प्रतिशत सेकेंडरी स्कूल्स और 56 प्रतिशत प्राइमरी स्कूल्स में हाथ धोने की उचित सुविधा नहीं है। ग्रामीण इलाकों में हालत और भी ज्यादा खराब है जहां तीन में से दो स्कूलों में साबुन से हाथ धोने की व्यवस्था नहीं है। कोरोना महामारी की वजह से पूरी दुनिया में स्कूलों को बंद करना पड़ा जिससे 190 देशों में 150 करोड़ से ज्यादा छात्र प्रभावित हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के मुताबिक अगर हाथ धोने की उचित व्यवस्था किये बिना स्कूल दोबारा खोल दिये गये तो इससे दुनियाभर में करीब 82 करोड़ बच्चों के कोरोना महामारी से संक्रमित होने का खतरा है।
ज्यादातर मां-बाप भी अभी स्कूल खोलने के पक्ष में नहीं हैं। लोकल सर्किल संस्था ने एक ऑनलाइन सर्वे करवाया था, जिसमें भारत के अलग-अलग हिस्सों से माता-पिता और दादा-दादी की ओर से 25 हजार से ज्यादा प्रतिक्रियाएं मिलीं। सर्वे में 58 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो नहीं चाहते की अभी स्कूल खुलें। जब सर्वे में लोगों से पूछा गया, उन्हें क्यों लगता है कि अभी स्कूल नहीं खुलने चाहिए? 47 प्रतिशत लोगों ने कुछ इस तरह के कारण बताए – वो अपने बच्चों को ख़तरे में नहीं डालना चाहते, बच्चे अगर घर में संक्रमण ले आएंगे तो घर के बुजुर्गों को गंभीर खतरा हो सकता है। स्कूल में सोशल डिस्टेंसिंग मुश्किल होगी. इसके इलावा कुछ लोगों को ये भी लगता है कि स्कूल खुलने से कोविड-19 और ज्यादा तेजी से फैलेगा। दूसरी तरफ दिल्ली सहित कई राज्यों की सरकारें कोरोना वायरस के संक्रमण पर पूरी तरह काबू किए जाने तक स्कूल खोलने के पक्ष में नहीं है। बहरहाल कुछ दिन पहले केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने स्कूल के घंटे कम करने पर विचार करने की बात कही थी, लेकिन फिर भी ज्यादातर परिजन फिलहाल स्कूल खोले जाने के पक्ष में नहीं हैं।

 

 

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