लोकतंत्र के घुटते गले से निकलती आवाजः “आई कांट ब्रीथ”


पंकज यादव

कोबिड-19 की मार झेल रहे अमेरिका में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बीच गृहयुद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, वाशिंगटन समेत लगभग 40 शहरों में कफ्र्यू लगा हुआ है। हालात इतने गम्भीर हुए कि व्हाइट हाउस में रेड अलर्ट जारी करना पड़ा और रविवार शाम को राष्ट्रपति ट्रम्प और उनके परिवार को सुरक्षित करने के उद्देश्य से बंकर में छुपाना पड़ गया। दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश में सम्भवतः यह पहला मामला होगा, जब राष्ट्रपति और उनके परिजनों को किसी विरोध-प्रदर्शन के चलते बंकर में छुपना पड़ा हो। दरअसल हिंसक विरोध प्रदर्शनों की जड़ में पिछले सोमवार को एक श्वेत पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन द्वारा एक अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या किया जाना है। 25 मई 2020 को अमेरिका के शहर मिनियापोलिस की पुलिस ने जॉर्ज फ्लॉयड नामक एक अश्वेत को उस वक्त गिरफ्तार किया, जब पुलिस को एक ग्रॉसरी स्टोर से सूचना मिली कि जॉर्ज ने यहां 20 डॉलर यानी 1,500 रुपये का नकली नोट इस्तेमाल किया है। पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर जॉर्ज फ्लॉयड को गिरफ्तार कर जमीन पर पटक दिया और इनमें से एक पुलिस अधिकारी ने उसकी गर्दन पर अपने घुटने टिका दिए। इसके बाद अमेरिका में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें साफ तौर पर दर्ज है कि श्वेत पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन ने जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन पर लगातार आठ मिनट तक अपने घुटने टेक कर रखे और जॉर्ज फ्लॉयड चिल्लाता रहा, “आई कांट ब्रीथ”, “आई कांट ब्रीथ”। इसके बाद जॉर्ज फ्लॉयड बेहोश हुआ और उसको अस्पताल ले जाया गया और अस्पताल में जॉर्ज फ्लॉयड को मृत घोषित कर दिया गया। जॉर्ज फ्लॉयड के इन आखिरी शब्दों ने अमेरिकी नागरिकों की इंसानियत को झकझोर कर रख दिया और अश्वेतों के हक में समानता के लिए आवाजें उठनी शुरु हुईं। जनता ने महसूस किया कि अमेरिका पुलिस के श्वेत अधिकारी भी सत्ता के अश्वेत विरोधी रवैये से प्रभावित होकर नस्लभेदी हो चले हैं और फिर इस पूरे मामले को नस्लीय हिंसा मानते हुए विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। विरोध प्रदर्शन में न सिर्फ अश्वेत शामिल थे, बल्कि इस घटना का विरोध पिछले कई वर्षों से सत्ता द्वारा प्रायोजित नस्लभेद के कारण उपजी तमाम समस्याओं से तंग आ चुके श्वेत नागरिकों ने भी किया। शुरुआत में विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन जब सरकार द्वारा विरोध-प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ दमनकारी नीति अपनाई गई, राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्वयं ट्वीट कर दमन को उचित ठहराने का प्रयास किया, तब पहले से आक्रोशित जनता हिंसक हो गई और फिर हालात बेकाबू होते चले गए। अमेरिका में रंगभेद की स्थिति को समझने का प्रयास करने से पहले समझ लेना जरूरी है कि 2019 की जनगणना के अनुसार अमेरिका की कुल जनसंख्या में 13.4 फीसद हिस्सा अश्वेत अमेरिकन लोगों का है जबकि श्वेत अमेरिकन लोगों की संख्या 76.5 फीसद यानि कि छह गुना ज्यादा है। अब यदि 2015 से लेकर अब तक अमेरिका में पुलिस द्वारा किये गए एनकाउंटर्स की बात की जाए तो इस दौरान पुलिस ने जितने श्वेत लोगों का एनकाउंटर किया है वो संख्या अश्वेत लोगों की एनकाउंटर से हुई मौत के आंकड़े के दोगुने के करीब है। वॉशिंगटन पोस्ट के एक विश्लेषण के मुताबिक 2015 में पुलिस की ओर से मारे गए अश्वेत अमेरिकन लोगों की संख्या श्वेत अमेरिकन लोगों की संख्या की तुलना में दो तिहाई थी। यह कहीं न कहीं इस ओर संकेत करता है कि अमेरिकी पुलिस में बैठे कुछ पुलिस अधिकारी-कर्मचारी रंगभेद से ग्रसित हो चले हैं। गौरतलब ये भी है कि वर्तमान राष्ट्रपति ट्रम्प 20 जनवरी, 2017 से अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए हैं। जॉर्ज फ्लॉयड की इस हत्या के बाद स्थिति यह हो चुकी है कि अमेरिका में गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो चुके हैं और श्वेत-अश्वेत मिलकर नस्लभेद के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं, विरोध ने पहले से कोरोना और बेरोजगारी से त्रस्त अमेरिकी नागरिकों को आक्रोशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वो भी ऐसे वक्त में जब कोरोना ने अमेरिकी व्यवस्था की कमर तोड़ रखी है। एक अश्वेत की हत्या ने पूरे अमेरिका को हिला कर रख दिया है, और इसके पीछे जनता और जनतंत्र की ताकत है। इस बीच विरोध प्रदर्शनों के आगे झुककर पुलिस ने घुटनों के बल बैठकर अपने अमानवीय और अलोकतांत्रिक कृत्य के लिए न सिर्फ माफी भी मांगी, बल्कि प्रदर्शनकारियों को गले भी लगाया। ये दृश्य अमेरिका के उन नागरिकों के लिए भी एक नज़ीर है जो एक लोकतांत्रिक देश में किसी जाति, धर्म, रंग विशेष में जन्म लेने के मिथ्याभिमान से ग्रसित होकर अपने नागरिक बोध से पलायन करने की राह पर चल पड़े हैं।
दूसरी ओर यदि भारत की बात की जाए तो हमारे यहाँ भी आये दिन नस्लभेद के ही समान जातिभेद और साम्प्रादायिक भेद के कारण और सत्ता की दमनकारी नीतियों के कारण तमाम लोग अपनी जान गंवा देते हैं, तमाम लोगों को उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है, हाल ही कोरोना के कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान भी तमाम श्रमिकों को केवल सत्ता की अदूरदर्शिता के कारण शहरों से अपने गाँवों और गृह जनपदों की ओर पलायन करते वक्त और श्रमिक ट्रेनों में भूख प्यास के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, लेकिन यहाँ की अधिकांश जनता सत्ता से सवाल नहीं पूँछती, और तो और जो लोग सवाल पूँछते हैं, सत्ता समर्थक उल्टा उन्हीं को देशद्रोही कहकर कटघरे में खड़ा कर देते हैं, क्योंकि सत्ता समर्थक किसी विशिष्ट धर्म, जाति, समुदाय, रंग या वर्ण में जन्म लेने के मिथ्याभिमान में अपनी मिथ्या महत्वाकांक्षाओं की तुष्टि हेतु सत्ता को सर्वोच्च माध्यम मानते हैं। ऐसे में हम लोकतंत्र के उस आदर्श स्वरूप की कल्पना कैसे कर सकते हैं, जहाँ प्रत्येक नागरिक अपने नागरिक बोध से परिचित हो और उसका प्रत्येक कृत्य लोकतंत्र को मजबूत और सुरक्षित करने का कार्य करता हो? बेहतर हो कि नागरिक लोकतंत्र, उसके महत्व और आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था में छुपे अपने हितों को आत्मसात करना सीखें और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित रखने हेतु यदि सत्ता को कटघरे में खड़ा करने की ज़रूरत पड़े तो बेहिचक उससे सवाल करना सीखें। लेकिन बड़ा सवाल है कि अमेरिका में नस्लभेद के कारण उपजी इस स्थिति से सीख लेते हुए क्या भारतीय जनमानस धर्म, सम्प्रदाय, जाति, रंग, नस्ल और जेंडर जैसे आधारों पर हो रहे भेदभावों के खिलाफ खड़ा होने की जीवटता दिखा पायेगा?

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