वैष्णवी: विकलांगता के बावजूद बनी हौसले की मिसाल

@ अनूप नारायण सिंह
पटना।हमारे समाज में सारे लोग सिर्फ अपने व अपने परिवार के लिए जीते हैं | पर समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अपने परिवार के साथ दूसरों के सुख-दुख में भी अपना हाथ बंटाते हैं।  तो आइये मिलवाते हैं दुसरे के दर्द को अपना बनाने वाली बिहार की इस दिव्यांग बेटी कुमारी वैष्णवी से जो बिहार के विक्रम प्रखंड के एक छोटे से गांव दतियाना की रहने वाली है | कुमारी वैष्णवी खुद दिव्यांग होते हुए अन्य दूसरे दिव्यांगों के अधिकारों के लिए लड़ती हैं | आज पीड़ित-शोषित दिव्यांग महिलाओं की आवाज बन चुकी हैं कुमारी वैष्णवी।
बचपन से ही डांस का शौक रखनेवाली कुमारी वैष्णवी गांव के ही प्रोग्रेसिव चिल्ड्रन एकेडमी में जब चौथी क्लास में थी तब स्कूल में हो रहे एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में डांस करते वक़्त अचानक से कांपने लगीं और फिर उन्हें बुखार चढ़ आया। जाँच कराने पर पता चला कि दोनों पैरों में ट्यूमर है ।बाद में ऑपरेशन भी हुआ मगर कोई फायदा नहीं हुआ। ट्यूमर का असर पूरे शरीर में फैला और 1996 में न्यूरो फाइब्रो मेटॉसिस बीमारी की वजह से वे एक पैर से अपंग हो गयीं ।कुमारी वैष्णवी का काफी समय इलाज में हीं बीता। घरवाले उन्हें दिल्ली एम्स में ले गए जहाँ डॉक्टरों ने देखते ही हाथ खड़े कर दीये ।फिर उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में ले जाया गया जहाँ एक साल तक वहीँ रहकर कीमियो थैरेपी हुई । डॉक्टरों ने कह दिया- ‘बहुत ज्यादा दिन जीने की उम्मीद नहीं है। फिर बैशाखी के सहारे चलनेवाली वैष्णवी ने आगे की पढ़ाई घर पर रहकर पूरी की। किसी तरह 2004 में मैट्रिक की परीक्षा पास किया और अपने आगे की पढाई जारी रखी ।2007 में गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर उन्हें पटना के महावीर कैंसर संसथान में ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने कह दिया – ‘ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते की मेहमान हैं’ लेकिन वैष्णवी ने आत्मविश्वास नहीं खोया। उन्हें माँ दुर्गा में गहरी आस्था थी, इसलिए तबसे ही वो घर में नियमित रूप से पूजा पाठ करने लगीं जिसकी वजह से उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से जीने की शक्ति मिलने लगी । फिर मन की ताक़त से वो अपनी जानलेवा बीमारी को छकाती रहीं | डॉक्टरों के अनुसार उनकी वह बीमारी स्थिर तो हो गयी थी लेकिन खतरा पूरी तरह से टला नहीं था। उनका बाबा रामदेव से मिलना 2009 में हुआ, फिर उनके बताए योगासन और आयुर्वैदिक दवाइयों से बहुत सुधार होने लगा | अब वैष्णवी को मौत से बिल्कुल डर नहीं लगता। इसलिए वो कहती हैं कि ‘मैं जितने दिन ज़िंदा रही ज़िन्दगी को पूरी तरह से इंज्वाय करुँगी और समाज की पीड़ितों के दुःख-दर्द के लिए लगातार लड़ती रहूंगी ’कुमारी वैष्णवी आत्मनिर्भर होने के लिए व्यावसायिक पुनर्वास केंद्र से टेलरिंग में एक साल का प्रशिक्षण लेना शुरू किया।सरकार द्वारा दिव्यांगों को मिलनेवाली सुविधा एवं छूट हासिल करने के लिए जब कुमारी वैष्णवी प्रमाणपत्र बनवाने निकलीं और उसके लिए कुमारी वैष्णवी को जब दो सालों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े तब एहसास हुआ कि उनके जैसे और भी दिव्यांगों को ना जाने कितनी तकलीफें झेलनी पड़ती होंगी । कुमारी वैष्णवी के मन में तभी से यह इच्छा जन्मी की अपने जैसे लोगों की भलाई के लिए उन्हें आगे आना पड़ेगा और इसी कड़ी में वे ‘विकलांग अधिकार मंच’ से जुड़ीं और फिर कुमारी वैष्णवी बिहार भर में घूम-घूमकर दिव्यांगों को संगठित करना शुरू कर दिया। उनके सराहनीय काम को देखकर ‘विकलांग अधिकार मंच’ का उन्हें राज्य स्तरीय अध्यक्ष बना दिया गया। इस संस्था के तहत वैष्णवी अपनी टीम के साथ दिव्यांगों का प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर छात्रवृति दिलाने, अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ने आदि के कार्यों में लगी हुई हैं। कई दूर राज्यों से उन्हें सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया जाता रहा है जहाँ वे दिव्यांग लड़कियों को लीडरशिप की ट्रेनिंग देती हैं। कुमारी वैष्णवी को 2008 में बिहार व्यावसायिक विकलांग पुनर्वास केंद्र के सौजन्य से जबलपुर में आयोजित ओलम्पिक में जहाँ 5 राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था, वहां हैण्ड निटिंग (बुनाई) में तृतीय स्थान प्राप्त कर कांस्य पदक जीता,फिर 2010 में गोल्ड मैडल जीता उसके बाद उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ा कि फिर कई जगहों पर आयोजित नृत्य, संगीत, हस्तकला आदि में ढ़ेरों पुरस्कार अपने नाम किये। 2009 में सामाजिक संस्था ‘प्रयास’ की तरफ से उन्हें दिव्यांगों के लिए किये गए प्रशंसनीय कार्यों के लिए पुरस्कृत किया गया । 2012 में मुंबई की एक संस्था द्वारा आयोजित प्रोग्राम में उन्हें महाराष्ट्र के गवर्नर ने सम्मानित किया 2013 में उन्हें अहिल्या देवी महिला सशक्तिकरण अवार्ड दिया गया । 2013 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों बिहार महिला सशक्तिकरण अवार्ड से सम्मानित किया गया ।2014 में युवा रत्न अवार्ड दिया गया.,इसके आलावा और भी कई संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।

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