भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई

बाल मुकुन्द ओझा

भारत सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी देश में भूखे पेट सोने वालों में कोई कमी नहीं आयी है। यह स्थिति तो तब है जब देश के गोदाम अनाज से भरे पड़े हाँ। यह बात केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने एक कार्यक्रम के दौरान बुधवार को स्वीकारी। डॉ हर्षवर्धनके अनुसार देश में 19.6 करोड़ लोग भूख के शिकार हैं जबकि 18 करोड़ से अधिक अन्य मोटापे से पीडित हैं।
यह हमारे लिए बेहद शर्मनाक है की 135 करोड़ के देश भारत में चार करोड़ 70 लाख बच्चों के विकास में अवरोध आया है और अन्य ढाई करोड़ अत्यंत कमजोर हैं। करीब 50 करोड़ बच्चों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है और 10 करोड़ बच्चे भोजन से होने वाली बीमारियों से पीड़ित हैं।
भारत में खाद्यान वितरण प्रणाली में सुधार और मोदी सरकार के जनकल्याण के दावों के बावजूद भुखमरी की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूख एक गंभीर समस्या है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 25 सालों में भारत के खाना बर्बादी करने के आकड़ों में तो कोई फर्क नहीं पड़ा है। लेकिन कुपोषण की वजह से होने वाले बच्चों की मौत के आकड़ों में मामूली सुधार जरूर देखने को मिला है।
दुनियां से जब तक अमीरी और गरीबी की खाई नहीं मिटेगी तब तक भूख के खिलाफ संघर्ष यूँ ही जारी रहेगा। चाहे जितना चेतना और जागरूकता के गीत गालों कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। अब तो यह मानने वालों की तादाद कम नहीं है कि जब तक धरती और आसमान रहेगा तब तक आदमजात अमीरी और गरीबी नामक दो वर्गों में बंटा रहेगा। शोषक और शोषित की परिभाषा समय के साथ बदलती रहेगी मगर भूख और गरीबी का तांडव कायम रहेगा। अमीरी और गरीबी का अंतर कम जरूर हो सकता है मगर इसके लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी। प्रत्येक संपन्न देश और व्यक्ति को संकल्पबद्धता के साथ गरीब की रोजी और रोटी का माकूल प्रबंध करना होगा।
दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह संख्या आज भी तेजी से बढती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भूखमरी से जूझ रहे हैं। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता । कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है।
विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। भूख और कुपोषण की मार कमजोर पर भारी पड़ती हैं। दुनिया में 60 प्रतिशत महिलाएं भूख की शिकार हैं। गरीब देशों में 10 में से 4 बच्चे अपने शरीर और दिमाग से कुपोषित हैं। दुनिया में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे है और 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय है।
एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है।
आज भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद लज्जाजनक सोपान पर खड़ा है तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां और गरीबों के प्रति राज्यतंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख है। गरीबी भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि इसके अभियान की निरंतर निगरानी नहीं की जाएगी।

 

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