युवा संकल्प एवं हौसलों को नये पंख मिले

अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस - 12 अगस्त

ललित गर्ग

आज भारत में ऐसी युवाक्रांति घटित होने को तत्पर हैं, जिससे युवकों की जीवनशैली में रचनात्मक परिवर्तन आएंगे, हिंसा-आतंक-विध्वंस की राह को छोड़कर वे निर्माण की नयी पगडंडियों पर अग्रसर हो सकेंगेे। क्योंकि युवा क्रांति का प्रतीक है, ऊर्जा का स्रोत है, इस क्रांति एवं ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक एवं सृजनात्मक हो, इसी ध्येय से सारी दुनिया प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाती है और भारत के लिये यह दिवस इसलिये विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी युवाओं के बल पर ही आत्मनिर्भर भारत के सपने को आकार देने को तत्पर है।
सन् 2000 में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरम्भ किया गया था। यह दिवस मनाने का मतलब है कि युवाशक्ति का उपयोग विध्वंस में न होकर निर्माण में हो। पूरी दुनिया की सरकारें युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। न केवल सरकारें बल्कि आम-जनजीवन में भी युवकोें की स्थिति, उनके सपने, उनका जीवन लक्ष्य आदि पर चर्चाएं हो। युवाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इन्हीं मूलभूत बातों को लेकर यह दिवस मनाया जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के नवनिर्माण के लिये मात्र सौ युवकों की अपेक्षा की थी। क्योंकि वे जानते थे कि युवा ‘विजनरी’ होते हैं और उनका विजन दूरगामी एवं बुनियादी होता है। उनमें नव निर्माण करने की क्षमता होती है। नया भारत निर्मित करते हुए नरेन्द्र मोदी भी इसी युवाशक्ति के बल पर भारत को विश्वगुरु एवं दुनिया की एक महाशक्ति बनाने को अग्रसर है। कोरोना जैसी महाव्याधि को परास्त करने के संघर्ष में जुटी शक्तियां देश को सशक्त बनाने में भी जुटी है, जिसमें युवाओं के संकल्प एवं हौसलों की उड़ान ने नये पंख दिये हैं।

आज का युवा सचमुच आत्मनिर्भर होने को व्याकुल है, छटपटा रहा है। वह केवल ख्याली आत्मनिर्भरता से सराबोर नहीं है, बल्कि करियर की रेस में सबको पीछे छोड़ देने को बेचैन, एक गैर राजनीतिक प्राणी है, जिसकी देशभक्ति अपने उफान पर है जब श्रीराम मन्दिर के शिलान्यास का दृश्य हो या कश्मीर के निर्माण की बात, वह इतना भावुक भी है कि इन्हीं संवेदनशील अवसरों पर वह सोशल मीडिया पर अपनी रचनात्मक सक्रियता को प्रदर्शित करते हुए संकल्पबद्ध होता है, भारत को विश्व गुरु बनने को अग्रसर या अपनी सांस्कृतिक पहचान को संकट उबारने को। प्रेम, विवाह, परिवार के नए आयाम गढ़ता या भीड़ में अकेला या भीड़ में रचा-बसा। थोड़ा-थोड़ा शायद यह सब सच है। कथित उदारीकरण ने जब पूरी दुनिया पर असर डाला है तो उसने उस पीढ़ी को क्यों नहीं प्रभावित किया होगा जो इसी के छाते तले पली बढ़ी है। आज युवा बहुमत में हैं। आज वह सिर्फ उपभोक्ता ही नहीं बाजार निर्माता भी है। बड़ी-बड़ी कंपनियां उसी के मुताबिक नए-नए प्रोडक्ट लांच कर रही हैं। राजनीतिक दल भी उसे लुभाने में लगे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों को उसमें राष्ट्र निर्माता के दर्शन होते हैं, लेकिन ऐसा राष्ट्र निर्माता जो वोट बैंक के तौर पर उन्हें मजबूत तो करें, परन्तु नेताओं की औलादों के राजनीतिक विरासत के आरक्षित प्राकृतिक अधिकार पर आंखें न गड़ाए। शिक्षित सामान्य युवा अगर राजनीति में सक्रिय नहीं है तो उसका क्या दोष?
युवा किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य हैं। वो देश की नींव हैं, जिस पर देश की प्रगति और विकास निर्भर करता है। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहाँ नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए जरूरी आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रछन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं। इन स्थितियों के बावजूद युवाओें को एक उन्नत एवं आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। युवा सपनों को आकार देने का अर्थ है सम्पूर्ण मानव जाति के उन्नत भविष्य का निर्माण। यह सच है कि हर दिन के साथ जीवन का एक नया लिफाफा खुलता है, नए अस्तित्व के साथ, नए अर्थ की शुरूआत के साथ, नयी जीवन दिशाओं के साथ। हर नई आंख देखती है इस संसार को अपनी ताजगी भरी नजरों से। इनमें जो सपने उगते हैं इन्हीं में नये समाज की, नयी आदमी की नींव रखी जाती है।
यौवन को प्राप्त करना जीवन का सौभाग्य है। युवाशक्ति जितनी विराट् और उपयोगी है, उतनी ही खतरनाक भी है। इस परिप्रेक्ष्य में युवाशक्ति का रचनात्मक एवं सृजनात्मक उपयोग करने की जरूरत है। गांधीजी से एक बार पूछा गया कि उनके मन की आश्वस्ति और निराशा का आधार क्या है? गांधीजी बोले- ’इस देश की मिट्टी में अध्यात्म के कण हैं, यह मेरे लिये सबसे बड़ा आश्वासन है। पर इस देश की युवापीढ़ी के मन में करुणा का स्रोत सूख रहा है, यह सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है।’ गांधीजी की यह चिन्ता सार्थक थी। क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उसकी युवापीढ़ी होती है। यह जितनी जागरूक, तेजस्वी, प्रकाशवान, चरित्रनिष्ठ और सक्षम होगी, भविष्य उतना ही समुज्ज्वल और गतिशील होगा।
मूल प्रश्न है कि क्या हमारे आज के नौजवान भारत को एक सक्षम देश बनाने का स्वप्न देखते हैं? या कि हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से जन्मी आत्मकेन्द्रित पीढ़ी है? दोनों में से सच क्या है? दरअसल हमारी युवा पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं है, वह रोज यथार्थ से जूझती है, उसके सामने भ्रष्टाचार, आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप, महंगी होती जाती शिक्षा, कैरियर की चुनौती और उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को कुचलने की राजनीति विसंगतियां जैसी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी हैं। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी है। इन जटिल स्थितियों से लौहा लेने की ताकत युवक में ही हैं। क्योंकि युवक शब्द क्रांति का प्रतीक है।
विचारों के नभ पर कल्पना के इन्द्रधनुष टांगने मात्र से कुछ होने वाला नहीं है, बेहतर जिंदगी जीने के लिए मनुष्य को संघर्ष आमंत्रित करना होगा। वह संघर्ष होगा विश्व के सार्वभौम मूल्यों और मानदंडों को बदलने के लिए। सत्ता, संपदा, धर्म और जाति के आधार पर मनुष्य का जो मूल्यांकन हो रहा है मानव जाति के हित में नहीं है। दूसरा भी तो कोई पैमाना होगा, मनुष्य के अंकन का, पर उसे काम में नहीं लिया जा रहा है। क्योंकि उसमें अहं को पोषण देने की सुविधा नहीं है। क्योंकि वह रास्ता जोखिम भरा है। क्योंकि उस रास्तें में व्यक्तिगत स्वार्थ और व्यामोह की सुरक्षा नहीं है। युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि संघर्ष को आमंत्रित करे, मूल्यांकन का पैमाना बदले, अहं को तोड़े, जोखिम का स्वागत करे, स्वार्थ और व्यामोह से ऊपर उठे।
युवा दिवस मनाने का मतलब है-एक दिन युवकों के नाम। इसका सबसे पहला लाभ तो यही है कि संसार भर में एक वातावरण बन रहा है युवापीढ़ी को अधिक सक्षम और तेजस्वी बनाने के लिए। भारत में नरेन्द्र मोदी की इस दृष्टि से सोच एवं सक्रियता युवकों को नये आयाम दे रही है, जो समूची दुनिया के लिये भी प्रेरणादायी है। विशेषतः राजनीति में युवकों की सकारात्मक एवं सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करने की जरूरत को महसूस करते हुए कदम उठाये जायें। युवकों के लिये भी जरूरी है कि वे जोश के साथ होश कायम रखे। वे अगर ऐसा कर सके तो भविष्य उनके हाथों संवर सकता है। इसीलिये सुकरात को भी नवयुवकों पर पूरा भरोसा था। वे जानते थे कि नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है। एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता रखता था। आज की युवापीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे स्वामी विवेकानन्द और सुकरात जैसे लोग दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है।’’ महादेवी वर्मा ने भी कहा है ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’ इसीलिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ऐसी अपेक्षा है कि वे युवा दिवस पर कोई ऐसी क्रांति घटित करे, जिससे भारत न केवल विश्वगुरु बल्कि आत्मनिर्भर भारत बनने की ओर सार्थक कदम बढ़ा सके। इस अभिनव क्रांति के बल पर युवापीढ़ी सोच के उस आसमान तक पहुंच पाएंगीं, जो नए ख्वाबों की रचना करने और उन्हें पूरा करने के लिए सीढ़ी का काम करेगी। भावों एवं संकल्पों की यह आत्मनिर्भरता युवाओं के मन के जीवन का निर्माण करने में सक्षम है।

( लेखक, पत्रकार और स्तंभकार हैं )

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.