आदिवासियों ने फूंका था आजादी का पहला आंदोलन

बाल मुकुन्द ओझा

संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रुप में घोषित किया है। भारत में आदिवासी संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है। यह जनजाति लोगों का एक ऐसा समूह है, जिनकी भाषा, संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भिन्न है। मगर देशभक्ति और राष्ट्र निर्माण की भावना उनमें कूट कूट कर भरी है। वर्षो पूर्व जब अंग्रेज इस देश को गुलाम बनाकर शासन करने आये तो यहाँ के आदिवसियों ने ही सबसे पहले सशत्र विरोध कर स्वतन्त्रता संग्राम का बिगुल फूंका था। कालांतर में यह वर्ग देश की प्रगति और विकास से समान रूप से नहीं जुड़ पाया। आजादी के आंदोलन में आदिवासियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो, सिद्धु-कान्हू नाम के दो भाईयों के नेतृत्व में 30 जून 1855 को संथाल परगना में सशत्र विद्रोह किया गया जिसमें अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंची थी। इस लड़ाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। अंग्रेजों से लड़ते हुए तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जान दे दी थी। इस विद्रोह को इतिहास में संथाल विद्रोह के रूप में जाना जाता है।
राजस्थान सरकार ने 9 अगस्त को पूरे प्रदेश में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का निर्णय लिया है। इस दिन को विश्व आदिवासी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। आदिवासी समाज के तरफ से काफी समय से इसकी मांग की जा रही थी, जिसके बाद सरकार ने यह फैसला लिया है. इस दिन का आदिवासी समाज के लिए विशेष महत्व है। राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी लोग धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक, राजस्थान में आदिवासी वर्ग के लोगों की संख्या राजस्थान की कुल आबादी का 12.6 फीसदी अर्थात 86 लाख है। गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के साथ-साथ बेरोजगारी तथा बंधुआ मजदूरी ने आदिवासी समाज को देश की मुख्य धारा से विमुख कर दिया।
आदिवासी शब्द ‘प्राचीन-काल से निवास करने वाली जातियों’ के लिए प्रयोग किया जाता है। आदिवासी शब्द आदि और वासी दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ अनादि-काल से किसी भौगोलिक स्थान में वास करने वाला व्यक्ति या समूदाय होता है।आजादी के बाद एक लम्बी जद्दोजहद के बाद भी यह तय नहीं हो पाया की हमारे देश में आदिवासी कौन है। साधारण रूप से कहा जाये तो वे लोग जो आधुनिक सभ्यता और प्रगति से दूर रहकर जंगलों में निवास करते है। जमीन होते हुए भी जमीन हीन है। आज भी उनका खाना मोटा है। जंगल के इलाकों में रहने के कारण सरकार संचालित विकास योजनाएं इन तक नहीं पहुंच पाती। केंद्र और राज्य सरकार की रोजगार गारंटी योजना सहित दूसरी योजनाओं से ये आदिवासी पूरी तरह दूर हैं। पौष्टिक भोजन के आभाव में कुपोषण और बीमारी इनके लिए जानलेवा साबित हो रही है। मानव की मूल जरुरत साफ पानी भी इन लोगों को उपलब्ध नहीं होता।
भारत में अनुसूचित आदिवासी समूहों की संख्या 700 से अधिक है। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 8,43,26,240 हो गई। वर्तमान में देश में लगभग 11 करोड़ आदिवासियों की आबादी है और विभिन्न आंकड़ों की मानें तो हर दसवां आदिवासी अपनी जमीन से विस्थापित है। बढ़ती जनसंख्या, नगरों के विकास और औद्योगिकीकरण के कारण आदिवासियों की जमीने छिन गईं, जिसके कारण इनकी परंपरागत जीवन पद्धति में भारी बदलाव आया है। धरती पर सबसे पहले सभ्य होने वाली यही जन-जातियां ही थीं। लेकिन, विडंबना यह है कि उनके बाद सभ्यता का मुंह देखने वाली जातियां आज उन्हें आदिवासी कहने लगी हैं। भारत के संविधान में आदिवासी समुदाय को जन जाति का दर्जा दिया गया है।
भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में बोडो, भील, खासी, जाट, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, मीणा, उरांव, परधान, बिरहोर, पारधी, सहरिया, संथाल, आंध, टोकरे, कोली, महादेव, कोली, कोली, मल्हार, टाकणकार आदि शामिल है। पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में इन्हें अत्विका और वनवासी भी कहा गया है। महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) कहकर पुकारा है। आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं जो अनंतकाल से यहां निवास करते हैं। आदिवासी समाज जंगलों के वास्तविक रक्षक है, क्यों कि इनका भोजन कंद मूल तथा जंगली फल हुआ करता था। ई मानी जाती है। इस लड़ाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। अंग्रेजों से लड़ते हुए तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जान दे दी थी। इस विद्रोह को इतिहास में संथाल विद्रोह के रूप में जाना जाता है।

 

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