संस्कृति के रंगों में रंगे सहरिया आज भी आदिम जनजाति से बाहर नही निकल पाये

विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

आज़ादी के बाद से आज तक बीते समय मे देश ने शिक्षा,स्वास्थ्य, कृषि, उद्योंग आर्थिक,विज्ञान,आधरभूत ढांचे का विकास और नागरिकों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने आदि समस्त क्षेत्रों में आशातीत प्रगति कर आसमान की बुलंदियों को छूआ। हमारी उन्नति और प्रगति का यह ग्राफ उस समय विचारणीय हो जाता हैं जब हम भारत के आदिवासी जीवन की चिंतनीय स्थिति को देखते हैं। यूँ तो सम्पूर्ण भारत वर्ष में अनेक आदिवासी जिन्हें हम जनजातियाँ कहते हैं अपनी- अपनी संस्सकृति के साथ आज भी आजादी के सच्चे सपने अर्थात आर्थिक रूप से सम्पन्न होने की आस लगाए हुए हैं। इस बार विश्व आदिवासी दिवस पर हम चर्चा कर रहे हैं राजस्थान एवं इसकी सीमा से लगे मध्य प्रदेश के कुछ भागों में रहने वाले “सहरिया” आदिवासियों की जिन्हें आज भी आदिम जनजाति कहा जाता हैं। राजस्थान के बारां जिले के दो उपखण्डों शाहाबाद एवं किशनगंज में निवास करने वाली यह जनजाति राजस्थान की एक मात्र आदिम जनजाति है।
सहरिया जनजााति का समुदाय आजादी के बाद से सरकार एवं स्वयं सेवी संस्थाओं के सामूूूहिक प्रयासों के बावजूद भी आदिम शब्द से बाहर नहीं आ सकी। विशेष सहरिया विकास प्रोजेक्ट के माध्यम से बही विकास की गंगा, उन्नति के सारे प्रयास, शिक्षा,साक्षरता,स्वास्थ्य सुविधाएं,कृषि-सिंचाई सुविधाओं का विस्तार एवं आर्थिक रूप से समर्थ बनाने के सारे प्रयास किये गए। परंतु आज भी यह सब ढाक के तीन पात नज़र आते हैं जब देखते हैं कि निरक्षरता,कुपोषण,क्षय रोग से आज भी घिरे हुए हैं। कई बार अभियान चला कर इनकी जमीनों को मुक्त कराया गया परन्तु साधनों के अभाव में खेती करने में असमर्थों की जमीन पर प्रभावशाली व्यक्तियों का ही कब्जा रहता हैं। आज भी नशे के कुटेव में जकड़े हैं।
सहरिया जनजाति जो आज भी विकास के उजाले से दूर है उसमें सबसे बड़ा कारण ये स्वयं और इनका आलसी स्वभाव हैं। ये अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं । आलसी स्वभाव का तो अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जिस प्रकार शेर को एक समय भरपेट भोजन मिल जाये तो वह दूसरे समय के भोजन के परवाह नहीं करता इसी प्रकार इन्हें सुबह भरपेट भोजन मिल जाये तो शाम के भोजन की जरा भी चिंता नहीं करते। दिनभर कोई काम नहीं करते।शाम होते ही शराब के नशे में रात गुजार देते हैं। बीड़ी पीने के इतने शौकीन हैं कि क्षयरोग इन्हें घेर लेता हैं। बीमार होने पर सरकारी डिस्पेंसरी में न जा कर नीम-हकीमों, ओझा-सयानों, झाड़फूंक करने वालों के चक्कर में पड़े रहते हैं। जीवन यापन के लिये आज भी वनोपज संग्रह, छोटी जोत की खेती, मजदूरी आदि पर निर्भर हैं। वनों की कटाई होने से वनोपज संग्रह भी संकट में आ गई हैं। रोजगार योजना से मिले रुपयों को नशे में गवां देते हैं। पक्के मकान रास नहीं आये फिर झोपड़ियों में आ बस्ते हैं। यहाँ यह तथ्य गौरतलब है कि निर्धनता में जीवन जीते हुए भी अपनी संस्कृति को आज भी अक्षुण बनाये हुए हैं।
फारसी भाषा में ‘‘सहर’’ शब्द का अर्थ जंगल होता है। शाहबाद के मुस्लिम शासकों ने इन्हें सहरिया नाम दे दिया। ये कन्दमूल, पत्तियां, जंगली फल और छोटे – छोटे पक्षियों का जंगल में शिकार से अपना जीवन यापन करते हैं। जंगली पेड़ पौधा व औषध की जड़ी बूटी ही इनकी औषधी हैं। यह बड़ी रोचक बात है कि ये काली माता की पूजा करते हैं और अपने प्रियजन के बीमार पड़ने पर देवी को शान्त करने के लिये पेड़ों को जलाते हैं। सहरिया को कुल्हाड़ी के द्वारा पहचाना जा सकता है। जैसे भीलों के पास तीर कमान होता है उसी प्रकार सहरिया कुल्हाड़ी अपने साथ रखते है। सहरिया अपनी रक्षा के लिये हर पल कुल्हाड़ी अपने साथ रखते है साथ ही वन्य उत्पादनों को प्राप्त करने में भी कुल्हाडी काम की होती है। यहाँ तक कि महिलायें और बच्चे भी कुशलता से कुल्हाडी चला लेते है।
सहरिया महिला बड़ी मजबूत, चंचल, चपल और मेहनत से काम करने वाली होती हैं, जबकि पुरूष जड़बुद्धि वाले ढीले-ढाले होते हैं। महिलायें कुशलता से पेड़ों पर चढ जाती हैं। महिलाएं निडरता से जंगल जाती हैं और ईधन और घास एकत्रित करती है और अन्य वन्य उत्पाद बटोर लाती हैं। सहरिया महिलाएं श्रम की प्रतिमूर्ति होती हैं। पत्नी को दी गई गाली झगड़े का कारण बन जाती हैं।
सहरिया अपनी बस्ती के मध्य में एक गोलाकार झौपड़ी तैयार करते हैं जिसे बंगला कहते हैं जिसका अर्थ है सामुदायिक केन्द्र परम्परागत पंचायत यहां मिलती है। विशेष रूप से समुदाय के समारोह या भोज यहाँ आयोजित किये जाते हैं। बंगला में जूते पहन कर प्रवेश नहीं लिया जा सकता। बाहर से आने वाले मेहमानों को यहाँ ठहराया जाता है। राम और सीता के साथ-साथ ये अपना परम पिता परमेश्वर भगवान को मानते हैं जो सम्पूर्ण संसार का रचयिता है। ये सीता माता, काली माता, बीजासन माता, अम्बा माता, बालाजी और भैरवदेव, ठाकुरदास और रामदेव की पूजा अर्चना करते हैं। पारिवारिक देवी के रूप में खोड़ा देवी की पूजा की जाती है। साथ ही ये सांपों के लोक देवता तेजाजी की भी पूजा करते हैं। जब कभी भी किसी व्यक्ति को सांप काटता है तो ये उस रोगी को उपचार के लिये तेजाजी के चबूतरे पर ले जाते हैं।

सीताबाड़ी में वार्षिक मेला लगाया जाता है। सहरिया यहाँ सीताकुंड लक्ष्मण कुड और सूरजकुंड में पवित्र स्नान करने के लिये एकत्रित होते हैं जिसे ये गंगा के समान पवित्र मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस जगह स्नान करने से अनेकों बीमारियों विशेषकर मानसिक बीमारियों का इलाज हो जाता हैं। इस मेले को ”सहरियों का कुंभ“ कहा जाता है। युवक-युवती यहाँ जीवन साथी भी चुनते हैं। वे जंगल में भाग जाते है,जिन्हें बाद में सामाजिक मान्यता प्रदान कर दी जाती है।विवाह उपरांत लडके की झोपड़ी अलग बना दी जाती है।

सहरिया क्षेत्रों में तेजाजी का मेला एक प्रसिद्ध मेला है। ये तेजाजी को प्रसन्न करने के लिये नारियल, सिन्दूर ओर गुड चढ़ाते हैं। सहरिया महिलाएं शरीर के अंगों पर गोदना गुदाने की बड़ी शौकीन होती हैं। ऐसा मानना है कि गुदाने से जीवन में प्रसन्नता रहती है। बिच्छु, सांप, मोर, मछली चारों हाथ पैरों पर गुदाये जाते हैं। ठोड़ी, गाल और आंखों के तरफ छोटी-छोटी बिन्दु गुदायी जाती हैं। सहरिया गीतों में भगवान राम और सीता को दोहराते हुए मध्य भारत से इनका सम्बन्ध दर्शाया जाता है। होली पर पन्द्रह दिनों तक फाग और रसिया गाये जाते हैं। सहरिया के अन्य प्रसिद्ध गीतों में लांगुरिया, डोला, खांडियाजी है। ढोलकी, नगाड़ी और कुन्डी संगीत के लिये प्रयोग में लाये जाते हैं। इनके एक दल द्वारा बनाई गई ”शंकर नृत्य नाटिका“ देश-विदेश में लोकप्रिय हो गई है।

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