असहयोग आंदोलन ने अंग्रेजी हुकुमरानों की नींद उड़ा दी

1 अगस्त 1920-असहयोग आंदोलन

 बाल मुकुन्द ओझा

एक अगस्त का दिन भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि 1 अगस्त 1920 को अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन शुरू किया गया था। महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक स्वराज (1909) में लिखा कि भारत में अंग्रेजी राज इसलिए स्थापित हो पाया क्योंकि भारत के लोगों ने उनके साथ सहयोग किया। भारतीय लोगों के सहयोग के कारण अंग्रेज यहाँ पर हुकूमत करते रहे। यदि भारत के लोग सहयोग करना बंद कर दें, तो अंग्रेजी राज एक साल के अंदर चरमरा जायेगा और स्वराज आ जायेगा। गांधीजी को पूरा विश्वास था कि यदि भारतीय लोग अंग्रेजों से सहयोग करना बंद कर देंगे तो अंग्रेजों के पास भारत को छोड़कर जाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।
असहयोग आन्दोलन शुरू करने के पीछे सबसे प्रमुख कारण था अंग्रेजी सरकार की अस्पष्ट नीतियाँ. सरकार के सुधारों से जनता बेहद नाराज थी। आर्थिक संकट छाया हुआ था तथा महामारी और अकाल फैला हुआ था। ऐसे समय में अंग्रेजी सरकार द्वारा 1919 को रोलेट एक्ट प्रस्तुत किया गया जो भारतीयों की नजर में एक काला कानून था. रोलेट समिति की रिपोर्ट के विरुद्ध हर जगह विरोध हो रहे था। इस एक्ट के विरोध में पूरे देश में हड़ताल करने का निश्चय किया गया। सितम्बर 1920 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गाँधीजी ने पंजाब में किये गए अत्याचार के विरोध में सरकार के साथ असहयोग का प्रस्ताव रखा। गाँधीजी का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया और पूरे देश में असहयोग आन्दोलन की शुरुआत हो गई।
असहयोग आंदोलन के दौरान विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालत में जाने से मना कर दिया। श्रमिक हड़ताल पर चले गए। शहरों से लेकर गांव देहात में इस आंदोलन का असर दिखाई देने लगा और सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद असहयोग आंदोलन से पहली बार अंग्रेजी राज की नींव हिल गई। फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी। हिंसा की इस घटना के बाद गांधी जी ने यह आंदोलन तत्काल वापस ले लिया।
असहयोग आन्दोलन का प्रथम चरण जनवरी से मार्च 1921 तक माना जाता है जिसमें गांधीजी एवं अली बंधुओं ने राष्ट्रव्यापी जनसंपर्क अभियान चलाया। इनका आग्रह था कि विद्यार्थी सरकारी नियंत्रण वाले शिक्षण संस्थाओं तथा वकील अदालत छोड़ दें। सी. आर. दास, मोतीलाल नहेरू, एम. आर. जयकर, वल्लभ भाई पटेल और अन्य लोगों ने वकालत छोड़ दी. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया।
असहयोग आन्दोलन के दूसरे चरण (मार्च से जुलाई 1921) में सारा ध्यान कोष इकठ्ठा करने, सदस्य संख्या बढ़ाने तथा चरखा बांटने पर दिया गया। तीसरे चरण (जुलाई से नवम्बर 1921) में और अधिक उग्र रूप अपनाया गया। इसमें विदेशी कपड़े एवं प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन का बहिष्कार किया गया।
चौथे चरण (नवम्बर से फरवरी 1922) में सरकार ने दमन का सहारा लिया। गांधीजी को छोड़कर सी. आर. दास सहित सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार ने गांधीजी और खिलाफत के नेताओं में फूट डालने का भी प्रयास किया, परन्तु वे असफल रहे। गांधीजी ने घोषणा की कि यदि सरकार नागरिक स्वतंत्रता बहाल नहीं करेगी, राजनीतिक बंदियों को रिहा नहीं करेगी तो वे देशव्यापी सविनय अवज्ञा आन्दोलन छेड़ने को बाध्य हो जाएँगे। परन्तु इसे और इसके साथ-साथ चल रहे पूरे देश के आन्दोलनों को 11 फरवरी को गांधीजी के कहने पर बंद कर दिया गया। इसका कारण 5 फरवरी, 1922 को चौरा-चौरी में एक भीड़ द्वारा 22 पुलिस वालों को जिन्दा जलाया जाना था। असहयोग आंदोलन ने लोगों में चेतना जगाई जो आगे जाकर आजादी के आंदोलन में बदल गयी।

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