देश के भविष्य को अपने निर्माण का अधिकार चाहिए

अभिजीत आनंद ,लेखक/कवि महाविद्या द्वारा सम्मानित सह राष्ट्रीय खिलाड़ी

युवा वह अवस्था होती है जब कोई लड़का बचपन की उम्र को छोड़ धीरे-धीरे वयस्कता की ओर बढ़ता है। इस उम्र में अधिकांश युवा लड़कों में एक जवान बच्चे की जिज्ञासा और जोश तथा एक वयस्क के ज्ञान की उत्तेजना होती है। किसी भी देश का भविष्य उसके अपने युवाओं पर निर्भर होता है। इस प्रकार बच्चों का सही तरीके से पोषण करने पर बहुत जोर दिया जाना चाहिए ताकि वे एक जिम्मेदार युवा बन सकें।
युवा कल की आशा हैं। वे राष्ट्र के सबसे ऊर्जावान भाग में से एक हैं और इसलिए उनसे बहुत उम्मीदें हैं। सही मानसिकता और क्षमता के साथ युवा राष्ट्र के लिए वरदान साबित हो सकते हैं ।

बच्चों की वृद्धि के लिए खेल और शारीरिक गतिविधियां जरूरी हैं, यह उनके तनाव को कम करने में काफी सहायता प्रदान करती हैं। बच्चों में खेल संबंधी गतिविधियां उत्पन्न करने की आवश्यकता है लेकिन माता-पिता द्वारा डाला गया अनुचित दबाव बच्चों में खेल के प्रति घृणा उत्पन्न करता है। प्रतिस्पर्धात्मक अभिभावकों द्वारा बच्चों की लगातार तुलना और शर्मिंदा करने की प्रवृत्ति ने इस स्थिति को और भी बदतर कर दिया है।

बच्चों की रचनात्मकता को उत्तेजित करने के लिए नृत्य, संगीत, कला और अन्य गतिविधियां उत्कृष्ट विकल्प हैं। इसमें वह अनुशासन, ध्यान केन्द्रित करने और टीम वर्क जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों को सीखते हैं, इससे उनको किताबी दुनिया से बाहर आकर अपनी क्षमताओं को पहचानने में मदद मिलती है। अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बच्चों पर अभिभावकों द्वारा डाले गये दबाव ने इन सुखद गतिविधियों को प्रतिस्पर्धी घटनाओं में बदल दिया है। इसने बच्चों को भारी तनाव में डाल दिया है।

जिन गतिविधियों में बच्चे आमतौर पर भाग लेना अधिक पसंद करते हैं, वह कार्य करने के लिए रोकर जिद कर सकते हैं। बच्चों पर शिक्षकों या अभिभावकों द्वारा डाला गया अत्यधिक दबाव उनके उस क्षेत्र में भी प्रदर्शन को खराब कर देता है जिसमें वह स्वाभाविक रूप से निपुण होते हैं।
अभिभावकों की सकारात्मकता

आत्मनिरीक्षण – आत्मनिरीक्षण माता-पिता का एक महत्वपूर्ण तत्व है। लंबे दिन के बाद अपने माता-पिता को अपने बच्चों से बातचीत करनी चाहिए। क्या आपने पारस्परिक प्रभावों पर ध्यान दिया है या आपके बच्चे को असहमति का अधिकार है? क्या आपके व्यवहार में उसको समझाने और प्रेरणा देने की बजाय मजबूर किया जा रहा है?

प्रोत्साहित करें – माता-पिता द्वारा बच्चे को प्रोत्साहित करना, उसकी सफलता का एक मूल मंत्र हो सकता है। आप अपने बच्चे के जीवन में एक प्रमुख खिलाड़ी हैं उसको आत्मविश्वास, कड़ी मेहनत और उत्कृष्टता सिखाना आप पर निर्भर करता है। यह भी आपकी ही जिम्मेदारी है कि आपका बच्चा आपकी हर बात को दिल से स्वीकार करे। विफलता नए अवसरों की तलाश करने और शोक का एक अवसर नहीं है।

बातचीत करें – आपके बच्चे के साथ बिताए जाने वाले कुछ सबसे अच्छे पल वह होते हैं जब आप खेल रहे हों और मस्ती या मनोरंजन की गतिविधियों में खुशी से भाग ले रहे हों। इन पलों को गहरी मित्रता और दोस्ती बनाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करें। आपके द्वारा दी गयी कोई भी वह सलाह जो उसको आज्ञा या दबाव न लगे, बच्चे के व्यक्तित्व को मजबूत करने में बहुत सहायता करेगी।

सहायता प्राप्त करें – आपको और आपके बच्चे के लिए लगातार सहायता मांगना वर्जित नहीं है। वास्तव में परिवार परामर्श के लिए जीवन का एक जरूरी हिस्सा है, जिससे हम आगे बढ़ रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं को नकारात्मक व्यवहार संबंधी गतिविधियों की पहचान करने और उन्हें अलग करने में आपकी सहायता करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
बच्चों के स्वस्थ विकास और वृद्धि के लिए एक सुरक्षित और सुखी परिवार के माहौल की आवश्यकता होती है। भारत में, बच्चों पर शिक्षा और शिक्षकों द्वारा डाला गया दबाव पारंपरिक तनाव का एक प्रमुख कारण है। पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए माता-पिता द्वारा बच्चों पर डाला गया असामान्य दबाव अधिकांशता अधिक रहा है। अन्य देशों के विपरीत, भारतीय छात्र के संकट में साथियों द्वारा दबाव नहीं डाला जाता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि परिवार से आने वाले शिक्षकों में विशिष्टता की जरूरत है, क्योंकि बच्चों से किया गया खराब व्यवहार उनके मनोबल को कमजोर कर देता है और यह उनके विफल होने का एक प्रमुख कारण बनता है।अधिक कमाई वाले कारोबार के रूप में खेल और मनोरंजन के उदय के साथ, अधिकांश भारतीय लोगों का पारंपरिक कैरियर के रूप में इन क्षेत्रों में ध्यान आकर्षित हुआ है। हालांकि, अधिकांश भारतीय माता-पिता, बच्चों के लिए शिक्षक की आवश्यकता को दूर करने में असमर्थ हैं। भारत के सबसे प्रसिद्ध क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने, कई माता-पिता को यह बताकर सोंचने पर मजबूर कर दिया कि उनके माता-पिता ने उनके शिक्षकों को अभ्यास के दौरान होने वाली गलतियों पर पिटाई करने की अनुमति दी थी। और अब, किसी भी खेल या मनोरंजक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, माता-पिता अपने बच्चों को ऑल राउंडर्स बनने के लिए प्रेरित करते हैं, इसमें बच्चों की कहानी अक्सर सफल कहानी के बजाय एक पीड़ित कहानी के रूप में खत्म होती है।

बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव

भारत में 15 से 29 साल की उम्र के किशोरों और युवा वयस्कों के बीच आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। परीक्षा में विफलता देश में होने वाली आत्महत्याओं के शीर्ष 10 कारणों में से एक है जबकि पारिवारिक समस्या शीर्ष तीन में है। शुरू में, खराब मानसून वाले क्षेत्रों के किसानों को सबसे कमजोर समूह माना जाता था, हाल ही में 2012 और 2014 के बीच किये गये अध्ययन से पता चला है कि शहरी इलाकों में अमीर और शिक्षित परिवारों के युवा वयस्कों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति अधिक है। 2014 में जारी एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में परीक्षाओं में असफल होने के बाद 2,471 छात्रों ने अपनी जान गवां दी थी, 2012 में, यह संख्या 2,246 पर आंकी गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर आत्महत्याओं का कारण पढ़ाई के लिए बच्चों पर माता-पिता का दबाव और अच्छे रिजल्ट की उम्मीद है, जो छात्रों के कौशल या हितों के अनुरूप नहीं है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश ने इस क्षेत्र में सबसे खराब प्रदर्शन दर्ज कराया है। कई मामलों में बच्चों के मन में आत्महत्या करने की भावना नहीं होती है, माता-पिता द्वारा इस प्रकार का अनुचित दबाव डाला जाता है, इसमें बच्चों के खराब पालन पोषण और देखभाल के आरोप शामिल हैं जो कई प्रकार के मनोवैज्ञानिक समस्याओं का कारण बनते हैं। यह समस्या युवा और वयस्कता के विभिन्न चरणों में प्रकट होती है।

शिक्षा बनाम खेल बनाम कला

आधुनिक भारत में शिक्षा प्रणाली और माता-पिता की सबसे बड़ी विफलताओं में दो कारण हैं, यह बच्चे की सीखने की अक्षमताओं की पहचान करने में असमर्थता और जीवन के अंत में शैक्षणिक विफलता पर विचार करने में असमर्थ हैं। जबकि छात्रों और बच्चों पर बढ़ते दबाव के लिए सरकारा द्वारा चलाई गयी नीति को भी दोषी ठहराया जाता है इसमें 8 वीं कक्षा तक किसी बच्चे को फेल नहीं किया जाता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि दबाव का एक बड़ा हिस्सा माता-पिता की तरफ से आता है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु इसका उदाहरण हैं जहाँ बच्चों पर उनके माता-पिता द्वारा हाई स्कूल में विज्ञान और गणित लेने के लिए बाध्य किया जाता है, ताकि वह आगे चलकर डॉक्टर या इंजीनियर बन सकें। बच्चों के वाणिज्य या कला में रुचि के विकल्प को नकार दिया जाता है।

बच्चों की वृद्धि के लिए खेल और शारीरिक गतिविधियां जरूरी हैं, यह उनके तनाव को कम करने में काफी सहायता प्रदान करती हैं। बच्चों में खेल संबंधी गतिविधियां उत्पन्न करने की आवश्यकता है लेकिन माता-पिता द्वारा डाला गया अनुचित दबाव बच्चों में खेल के प्रति घृणा उत्पन्न करता है। प्रतिस्पर्धात्मक अभिभावकों द्वारा बच्चों की लगातार तुलना और शर्मिंदा करने की प्रवृत्ति ने इस स्थिति को और भी बदतर कर दिया है।

बच्चों की रचनात्मकता को उत्तेजित करने के लिए नृत्य, संगीत, कला और अन्य गतिविधियां उत्कृष्ट विकल्प हैं। इसमें वह अनुशासन, ध्यान केन्द्रित करने और टीम वर्क जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों को सीखते हैं, इससे उनको किताबी दुनिया से बाहर आकर अपनी क्षमताओं को पहचानने में मदद मिलती है। अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बच्चों पर अभिभावकों द्वारा डाले गये दबाव ने इन सुखद गतिविधियों को प्रतिस्पर्धी घटनाओं में बदल दिया है। इसने बच्चों को भारी तनाव में डाल दिया है।

निष्कर्ष
“अपने बच्चो को अभिभावक जंगल के वृक्ष के समान बनाएं न की गमला के वृक्ष के समान”जिस प्रकार जंगल का विसम परिस्थितियों में रहकर भी अपने जड़ों का टहनियों का विस्तार करता है, उसे कोई देखभाल की जरूरत नहीं होती, एक दिन वह विशाल रूप ले लेता है एवं कई जीव जंतु को अपने में स्थान देता है | जबकि गमला का फूल की विशेष निगरानी करनी पड़ती हैं, समय समय पर खाद डालना पड़ता है, रोज पानी डालना पड़ता है, लेकिन फिर किसी दिन यदि पानी डालना भूल गए तो वह सुख कर नस्ट हो जाती है, किन्तु यह जंगल के वृक्ष (मोना) में नहीं होता वो हर परिस्थिति में अपना विस्तार करता है | उसी प्रकार अभिभावक को बच्चो को जंगल के वृक्ष के समान बनाना चाहिए उन्हें स्वयं अपना विस्तार करने देना चाहिए उन्हें स्वयं के संघर्ष से आगे बड़ने दीजिए |
 “चिड़िया अपने बच्चो को कभी उड़ना नहीं सिखाती, बस वह उसे उड़ने के काबिल बनाती हैं”

 

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