युवा पार्टियों के लिए आक्सीजन का काम करते है

बाल मुकुन्द ओझा

भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है। हमारे यहां 135 करोड़ की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा हैं। इनकी उम्र 19 से 35 वर्ष के बीच है लेकिन देश के सियासी नेतृत्व की बागडोर 60 साल से ऊपर के नेताओं के हाथों में है।
युवा नेतृत्व को लेकर आज देशभर में व्यापक बहस छिड़ी है। आजादी के आंदोलन में महात्मा गाँधी ने नेहरू, जेपी और लोहिया जैसे युवा नेतृत्व पर अपना भरोसा व्यक्त किया। आजादी के बाद भी कई दशकों तक राजनीतिक पार्टियों में युवा नेतृत्व का बोलबाला रहा। कांग्रेस में चंद्र शेखर, मोहन धारिया जैसे युवा तुर्क के नाम से जाने जाते थे। जनसंघ में अटल बिहारी वाजपेयी, स्वतंत्र पार्टी में पीलू मोदी और सोशलिस्ट पार्टी में जॉर्ज फर्नांडिस जैसे लोग युवाओं का प्रतिनिधित्व करते थे। मगर धीरे धीरे सियासत से युवा नेतृत्व गायब होने लगा। भाजपा ने सत्ता प्राप्त होते ही अपने बुजुर्ग नेताओं को साइड लाइन कर दिया और अपेक्षाकृत नरेंद्र मोदी सरीखे नेताओं को कमान सौंपी। कांग्रेस ने भी राहुल गाँधी जैसे युवा नेतृत्व को पार्टी कमान सौंपने में अपनी भलाई समझी, हालाँकि राहुल बाद में पार्टी अध्यक्ष से हट गए और प्रियंका गाँधी वाड्रा ने राजनीति में प्रवेश किया। युवा पार्टियों के लिए आक्सीजन का काम करते है जिनकी उपेक्षा किसी के लिए भी भारी पड़ सकती है।
देशभर में अच्छे युवा और वाइब्रेंट नेता होने के बाद भी कांग्रेस में बुजुर्ग नेताओं का बोलबाला है और युवा नेताओं में असंतोष तेजी से बढ़ रहा है। युवा नेतृत्व को बढ़ावा नहीं देने से कई राज्यों से कांग्रेस सिमट गयी। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी ने कांग्रेस से बगावत कर कांग्रेस को हासिये पर ला दिया। उन्होंने क्षेत्रीय पार्टी का गठन कर प्रदेश में अपना प्रभुत्व कायम कर लिया। असम से हेमंत विश्व शर्मा ने कांग्रेस का त्याग कर भाजपा ज्वाइन करली इसके साथ ही असम से भी कांग्रेस को अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा। इससे पूर्व ममता बनर्जी और चंद्र शेखर राव सरीखे युवा नेता कांग्रेस से अलग हो चुके थे। इससे अनेक प्रदेशों में कांग्रेस को युवा नेतृत्व की उपेक्षा भारी पड़ी। कांग्रेस ने इससे कोई सबक नहीं सीखा। हाल ही मध्य प्रदेश से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बगावत कर कांग्रेस को सत्ताच्युत कर दिया। अब बारी राजस्थान की थी। यहाँ सचिन पायलट काफी समय से असंतुष्ट चल रहे थे। पायलट ने भी मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया। मध्य प्रदेश और इसके बाद राजस्थान संकट इस बात का सबूत है कि पार्टी में युवा और वरिष्ठ नेताओं के बीच संघर्ष चरम पर है। कई नेता मानते हैं कि राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद इसमें तेजी आई है। राजस्थान में सरकार बचाए रखने के साथ कांग्रेस को पार्टी नेताओं की अंदरुनी लड़ाई से भी सख्ती के साथ निपटना होगा। पार्टी ने इस दिशा में जल्द कोई कदम नहीं उठाए, तो पंजाब और दूसरे प्रदेशों में भी इस तरह की समस्या पैदा हो सकती है।
इस भांति कहा जासकता है धीरे धीरे युवा नेतृत्व कांग्रेस से छिटकता जा रहा है जिसका बड़ा खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा। सिंधिया और पायलट की बगावत के बाद कांग्रेस में एक दर्जन युवा नेता बगावत की मूढ़ में है। ये लोग अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे है। सिंधिया और पायलट के कांग्रेस से अलग होते ही इस बात को लेकर हलचल बढ़ गई कि अब कांग्रेस के कई युवा नेता छिटकेंगे। उत्तर प्रदेश से जितिन प्रसाद, हरियाणा से कुलदीप बिश्नोई, महाराष्ट्र से मिलिंद देवरा, दिल्ली से संदीप दीक्षित अपनी बारी का इंतजार कर रहे है। कांग्रेस के प्रवक्ता रहे संजय झा को पायलट का समर्थन करने से हटाया जा चुका है।

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