आधा आसमान तेरा आधा मेरा

व्यंग- राजस्थान राजनैतिक संकट

सरिता मौर्य

आज सवालीराम बड़े शांत मूड में लग रहे थे बोले शायरी सुणाऊं के! मैनें उन्हें घूर कर देखा, वे थोड़ा सकपकाये फिर ढिठाई से बोले ‘बोलूं तो खारो लागे’। मैंने उन्हें थोड़ा और बड़ी आंखें कर के देखा कि वे समझ जायें कि मुझे आज उनके किसी सवाल का जवाब नहीं देना था। मगर वो कब मानने वाले थे? अपनी आंखें हवा में टांगीं और निशाना मुझे बनाते हुए बोले एक ही सवाल है बाईसा घणो बोलनो म्हाने आवे कोनी! थे कहो तो… भई जयपुर में घणी उठापटक चाल रही से, सीनियर सूं जूनियर नाराज दिखे हैंर्, अ सीनियर अपणे जूनियर वास्ते रस्तो साफ कर रिया सै, पायलट उड़ान कंपनी रो सी ई ओ समझे ई कोना कि भाई अशोक नाम रो बृक्ष घणी मिहनत कर्री अ बुढापे में छाया री घणी जरूरत होया करे सा तो दूजो बृक्ष घर आंगणे रा नहीं लगाया तो पछे गड़बड़ है? मैं सही हूं कि गलत? मैं अभी उनकी बात का मतलब समझने के लिए अपनी खोपड़ी खुजा रही थी कि तपाक से बोले मुझे तो लग रहा है कि अभी की हालात में आधा आसमान तेरा आधा मेरा बाकी ऊॅंट की करवट।
मैंने उनकी तरफ मूर्ख निगाहों से देखा तो सवालीराम गहराई से मुस्कुराये और जमाने भर की कुटिलता उनके चेहरे पर तैर गई। अपने आपको कुर्सी पे ऐसा जमाया मानो बिना चाय नाश्ते के हिलने वाले नहीं! और बोले भई अगर कंपनी का सी ई ओ किसी नये मार्केटिंग मैनेजर को भर्ती करता है तो कुछ कमीशन के तौर पर इंसेंटिव के तौर पर देने का वादा तो करता ही है, इस चक्कर में नया मैनेजर बॉस के लिए मर मिटने की हद तक खुद को झोंक देता है, यहां तक कि गलियों की धूल फांकते कुछ ऐसे काम भी कर जाता है जो उससे निचले मातहतों को करने होते हैं। अब उसकी यह मेहनत रंग लाती है, कंपनी के बाकी लोग भी उसकी मेहनत के कायल होते हैं साथ ही बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के कुछ सदस्य भी उसकी सराहना करते हैं क्योंकि कंपनी की साख और मुनाफा दोनों बढ़ गये। अब अगर ऐसे में सी ई ओ अपना वादा भूल कर अपने वंशवाद की लाठी चला दे तो मार्केटिंग मैनेजर को दुख तो शर्तिया होगा और फिर आजकल के नौजवान जो चाहते हैं कि दस साल का काम वो 2 साल में कर डालें और उसी हिसाब से उनको मेहनत का फल भी मिल जाये। वो ये भूल जाते हैं कि कंपनी को जिसने वर्षों से चलाया है तो उसने ऐसे कितने ही मैनेजरों को चलता किया होगा, क्योंकि बिजनेस यानी व्यापार का नियम यही होता है। सवालीराम सुझावीराम की मुद्रा में आ चुके थे। मैं तो कहता हूं कि राजनीति को भी व्यापार घोषित कर देना चाहिये जहां जनता की सेवा की बजाय स्वसेवा, वंशवाद, मुनाफावाद और लाभदायी पद के रूप में इनाम की घोषणा की जाती है ये कंपनी को मुनाफे या घाटे का सौदा तय करके देते हैं तो दूसरी तरफ जनता सिर्फ मूकदर्शक और टैक्स भरने वाली है। क्या है किसी में हिम्मत कि कोई पार्टी ये नियम बना दे कि राजनीतिक पार्टी ज्वाइन करने से पहले सोच लें कि विरोध करने का अवसर नहीं होगा, विधायक का चुनाव जीतने के बाद पांच वर्ष जनता की सेवा करना अनिवार्य होगा, यदि बीच में कोई पार्टी छोड़ता, बगावत करता है तो उसे विधायकी छोड़ने के साथ अगले पांच वर्ष के लिए किसी अन्य पार्टी में जाने की अपेक्षा निर्दलीय तौर पर पुनश्च जनता के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करना होगा तथा यदि पार्टी छोड़ना अत्यावश्यक है तो उसे कम से कम एक तिहाई वोटर के हस्ताक्षर सहमति के लिए लेने होंगे, और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात कि एक परिवार से यदि अगला पुत्र पुत्री राजनीति में आना चाहता है तो वह पहले दस वर्ष तक किसी पार्टी का सदस्य नहीं बन सकता वरन् जनता की सेवा के आधार पर उसे पार्टी जगह देगी।
मुझे लग रहा था कि मैं अपनी सवालीराम जी का नाम बदल के फितूरीराम रख दूं। कैसे-कैसे फितूरी सुझाव इनके दिमाग में आ जाते हैं। इतनी कड़ी शर्तों के साथ जीने से अच्छा है कंपनी मार्केटिंग मैनेजर को निकाल देती है तो पार्टी अपने विधायक को। दस दिन बेरोजगारी में इधर-उधर टहलेगा तो अपने आप अकल ठिकाने आ जायेगी या तो कोई दूसरी कंपनी से ऑफर आ जायेगा या फिर इस कंपनी का बाजार बरबाद करने की योजना तैयार हो जायेगी। मुश्किल कहां है, कुछ भी असंभव नहीं। सवालीराम की कहावत का मतलब मुझे थोड़ा-थोड़ा आ गया। और हां सवालीराम ने पूछा है कि आपको राजनैतिक व्यापार करना आया कि नहीं? अपनी कंपनी मतलब सिर मत खुजाइये आसपास नजर दौड़ाइये समाचार देखिये, पढ़िये पता चल जायेगा ऊॅंट करवट लेगा तो क्या होगा।
 (लेखिका जिला समन्वयक “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान” जैसलमेर, राजस्थान की हैं )

 
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