हागिया सोफिया को मस्जिद में तब्दील करने का संदेश घृणात्मक है

इस्लामिक देश में गैर मुस्लिमों की विरासत और प्रतीक चिन्हों का कोई अर्थ नहीं

विष्णुगुप्त

इस्लामिक दुनिया की दो बड़ी घटनाओं ने दुनिया का ध्यान खींचा है, दोनों घटनाएं विघटन और घृणा से जुड़ी हुई हैं और यह प्रमाणित करती हैं कि इस्लामिक देशों में अन्य धर्मों व पंथों की विरासतों तथा प्रतीक चिन्हों का सम्मान और सुरक्षित रखना मुश्किल काम है तथा काफिर मानसिकताएं इन पर कहर बन कर टूटती हैं। पहली घटना पाकिस्तान की रही हैं जिसमें पाकिस्तान की काफिर मानसिकता ने इस्लामाबाद में निर्मानाधीन हिन्दू मंदिर का निर्माण रोकवा दिया, काफिर मानसिकताओं ने तर्क यह दिया कि चूंकि पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है, इसलिए यहां पर काफिरों का मंदिर बन ही नहीं सकता है। जब काफिर मानसिकताएं ज्वार लेती हैं तब इस्लामिक सत्ता, इस्लामिक न्याय व्यवस्था भी काफिर मानसिकताओं से ही फैसले सुनाती हैं। ऐसी स्थिति में इस्लामाबाद स्थित हिन्दू मंदिर का निर्माण रूकना भी स्वाभाविक था।
दूसरी विखंडन और घृणा से जुड़ी हुई घटना उस तुर्की से जुड़ी हुई है जो कभी आधुनिकता के लिए जानी जाती थी और महान सुधारक मुस्तफा कमाल पाशा की विरासत रही है। कुछ साल पहले तक कोई उम्मीद भी नहीं कर सकता था कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जब मुस्तफा कमाल पाशा की विरासत की जगह इस्लाम की काफिर मानसिकताएं राज करेंगी और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की विरासत को तरह-नहस कर दिया जायेगा, प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक चिन्हों को भी काफिर मानसिकताओं से जोड़ कर देखा जायेग। पर अब तुर्की में ऐसी ही घृणा की फसल लहरा रही है। तुर्की के राष्टपति रेचेप तैय्यप् अर्दोआन ने एक घृणात्मक और विखंडनकारी कदम उठाते हुए दुनिया में चर्चित संग्रहालय हागिया सोफिया को तहस-नहस कर एक मस्जिद में तब्दील कर दिया। हागिया सोफिया संग्रहालय में अजान सुनाई दे रही है। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में मंदिर निर्माण रोके जाने और तुर्की में प्रसिद्ध संग्रहालय हागिया सोफिया को मस्जिद में तब्दील करने से अल्पसंख्यक हिन्दुओं और ईसाइयों के लिए बज्रपात से कम नहीं है और उन्हें यह संदेश दे दिया गया है कि एक इस्लामिक देश में तुम्हारी विरासत या प्रेरक चिन्ह कोई अर्थ नहीं रखता है।
हामिया सोफिया सिर्फ संग्रहालय भर नहीं था, वह एक जीता-जागता इतिहास भी था, अपने में बर्बरता, वीभत्सता और घृणा की अनेकानेक कहानियां समेटे हुए था। ग्रीक स्थापत्य कला बेजोड़ नमूना है। उस काल में ग्रीक स्थापत्य कला विख्यात थी। इसीलिए यूएनस्को ने हामिया सोफिया संग्रहालय को संरक्षित स्माराक घोषित कर रखा था। दुनिया भर के सामाजिक और कला वैज्ञानिकों के लिए यह संग्रहालय एक तीर्थ स्थल से कम नहीं था। दुनिया भर के जिज्ञासु सामाजिक और कला वैज्ञानिक इस संग्रहालय में बैठ कर न केवल अध्ययण करते थे बल्कि इतिहास की मजहबी बर्बरता और वीभत्सता और घृणात्मकता पर शोध भी करते थे। यह संग्रहालय सिर्फ ज्ञान-विज्ञान और कला का ही केन्द्र नहीं था। बल्कि यह संग्रहालय ईसाई संस्कृति की भी धरोहर थी। पहले यह चर्च था। इस चर्च की ख्याति यूरोप तक फैली हुई थी। कोई आज नहीं बल्कि यह छठी सदी में बना था। बाइजेंटाइन सम्राट जस्टिनियन ने इसे बनाया था। लेकिन ओस्मानिया साम्राज्य के उदय के साथ ही साथ तुर्की में ईसाई संस्कृति के बूरे दिन शुरू हो गये थे। जैसी बर्बरता के आधार पर अरब में इस्लाम की स्थापना और विस्तार हुआ था वैसी ही बर्बरता की कहानी तुर्की में लिखी गयी थी। बलपूर्वक और घृणात्मक दृष्टि से इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया, ईसाई संस्कृति को तहस-नहस कर दिया गया, प्रतीक चिन्हों को जमींदोज कर दिया गया। ओस्मानिया साम्राज्य किसी भी स्थिति में ईसाई प्रतीक चिन्हों को देखना नहीं चाहता था। इसीलिए उसने हामिया सोफिया चर्च को एक मस्जिद में तब्दील कर दिया।
तुर्की में जब महान सुधारक मुस्तफा कमाल पाशा का राज्य स्थापित हुआ तो उनके सामने यह विरासत की बर्बरता यक्ष प्रश्न के रूप में खडी थी। धर्मनिरपेक्षा के रास्ते में कंलक के तौर पर खडी थी। आधुनिकता के रास्ते में एक रोड़ा थी। कंलकित मजहबी उदाहरण थी। ऐसी बर्बरता और घृणा के उदाहरण रहते तुर्की को आधुनिकता के रास्ते पर अग्रसर कैसे किया जा सकता था, मजहबी मानिकसताएं लोगों के मन से कैसे निकाली जा सकती थी, लोगो को धर्मनिरपेक्षता का पाठ कैसे पढाया जा सकता था? इसलिए इस बर्बरता के उदाहरण को मिटाना भी जरूरी था। मुस्तफा कमाल पाशा ने चर्च से मस्जिद बना दी गयी हामिया सोफिया के विशाल भवन को आधुनिक संग्रहालय बनाने का निश्चय किया था। उनके इस निर्णय पर तुर्की में विरोध का बवंडर उठा था और इसे इस्लाम विरोधी करतूत की संज्ञा दी गयी थी। पर मुस्तफा कमाल पाशा ने विरोध के बवंडर को सख्ती के साथ दबा दिया था। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तुर्की में जिस तरह से मजहबी घृणा फैलायी गयी थी उसका एक अध्ययण भी कराया था। ओस्मानिया साम्राज्य की मजहबी करूततों को भी इस संग्रहालय में संग्रहित किया गया था। इसके साथ ही साथ दुनिया की कला-विज्ञान की संस्कृति को भी संरक्षित कर रखा गया था। मुस्तफा कमाल पाशा की धारणा यह थी कि दुनिया भर में हामिया सोफिया संग्रहालय की ख्याति हो और दुनिया भर के कला विज्ञानी तथा इतिहास के विद्वान आकर इस संग्रहालय में अध्ययण करें। इस तरह 1934 में हामिया सोफिया एक संग्रहालय का रूप धारण कर लिया। इस अर्थ में मुस्तफा कमाल पाशा बेहद सफल साबित हुए थे। दुनिया भर के कला विज्ञान के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए हामिया सोफया सग्रहालय एक तीर्थ स्थल से कम नहीं था।
पर इस्लाम के कट्टरपंथियों के लिए हामिया सोफिया आंख की किरकिरी की तरह खडी थी। इस्लामिक कट्टरपंथी इसके खिलाफ साजिश पर साजिश करते रहे थे। कइ्र बार संग्रहालय को आग लगाने और नष्ट करने तक की साजिश हुई थी। इस्लामिक कट्टरपंथी कहते थे कि एक इस्लामिक देश में काफिर मानसिकताएं कैसे संरिक्षत हो सकती हैं, काफिर मानिकताओं के प्रतीक चिन्ह कैसे खडी रह सकती है, ये आधुनिकता की काफिर मानसिकताएं हमें मुंह चिराती हैं। सच यह भी है कि इस्लामिक दुनिया में काफिर प्रतीक चिन्हों पर हमेशा हिंसा होती रहती है। अफगानिस्तान में तालिबान ने बुद्ध प्राचीण प्रतीकों पर कैसी हिंसा की थी? यह भी जगजाहिर है। ईरान कभी पारसी संस्कृति वाला देश था पर इस्लाम के आगमन के साथ ही साथ पारसी संस्कृति और पारसी कला को गैर इस्लामिक मान लिया गया। आज ईरान के अंदर में पारसी संस्कृति और पारसी कला का कहीं कोई नामोनिशान तक नही है।
तुकी पर वर्तमान में रेचेप तैय्यप आर्दोआन की सरकार है। रेचेप तैय्यप आर्दोआन एक घोर इस्लामिक कट्टरपंथी मानसिकता का शासक है। सभी चिजों को वह काफिर मानसिकता से ही देखता है। काफिर मानसिकता के तहत ही वह भारत का विरोध करता है, इजरायल के खिलाफ आग उगलता है। जब भारत ने धारा 370 हटायी थी तब पाकिस्तान के पक्ष में दो ही देश खडे हुए थे, एक तुर्की और दूसरा मलेशिया। ये दोनों देश काफिर मानसिकता से ही ग्रसित होकर भारत विरोध में खडे थे। हामिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद बनाने का चुनावी वायदा था। पिछले राष्टपति के चुनाव में रेचेप तैय्यप आर्दोआन ने कट्टरपंथियों से वायदा किया था कि अगर वह चुनाव जीते और राष्टपति बने तो फिर हामिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद बना कर अजान दिलवायेगे। इसी कसौटी पर इस्लामिक कट्टरपंथियों ने समर्थन देकर रेचेप तैय्यप आर्दोआन को राष्टपति बनवाया था। एक खतरनाक बात गौर करने की जरूरत है। रेचेप तैय्यप आर्दोआन ने अपनी कट्टरपंथी मानसिकता और काफिर मानसिकता की कसौटी पर तुर्की को जिस रास्ते पर लेकर चल रहे हैं वह बहुत ही खतरनाक है। कल तुर्की भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे उदाहरण में शामिल हो जायेगी। अब तुर्की में आधुनिकता धीरे-धीरे हिंसा और घृणा की बलि बेदी पर कुर्बान हो रही है। तुर्की में अब बकरा दाढी और बडे भाई कुर्ता तथा छोटे भाई का पायजामा वाली जहरीली संस्कृति पैर जमा रही है। छोटी-छोटी लड़कियों पर भी बुर्का अनिवार्य किया जा रहा है।
हामिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में तब्दील करने की घृणा के खिलाफ दुनिया भर में आवाज उठी है, ईसाइयों के पोप ने भी इस पर चिंता जाहिर की है। यूरोपीय यूनियन भी विरोध किया है। पर रेचेप तैय्यप आर्दोआन के लिए कोई परवाह की बात नहीं है। रेचेप तैय्यप आर्दोआन अपने इस कदम से पीछे हटने वाले कहां है, उन पर तो इस्लाम की कट्टपंथी मानसिकताएं सवार है। तुर्की ही क्यों बल्कि सभी इस्लामिक देशों का एक ही संदेश है कि काफिर लोगों का मानवाधिकार या फिर उनकी विरासत कोई अर्थ नहीं रखता है।

 

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