कोरोना महामारी के बीच लोक कल्याणकारी राज्य

फ़तेह लाल भील

कोरोना वैश्विक महामारी से पूरा देश लड़ रहा है, सभी देशवासी, सरकारी कर्मचारी और समाजसेवी इस महामारी से निपटने के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। वर्तमान सरकार ने स्थिति को तुरंत भांपते हुए लॉक डाउन घोषित किया जिससे महामारी को देश में बड़े पैमाने पर फैलने से रोका जा सका। सरकार का यह कदम इस महामारी से लड़ने के लिए बहुत प्रभावी साबित हुआ वहीं प्रवासी मजदूरों के एक बहुत बड़े वर्ग को भूखमरी, भय, असुरक्षा और घर पहुंचने की अनिश्चितता में धकेल दिया। इन्हीं सभी कारणों से प्रवासी मजदूरों के लोक डाउन के प्रथम दिन से लेकर आज तक बहुत ही हृदय विदारक तस्वीरें, न्यूज और वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसने आम जनता, प्रशासन और बुद्धिजीवियों को झाकजोर कर रख दिया है और आम नागरिक, मीडिया और विभिन्न संगठनों ने सरकार से मजदूरों की दुर्दशा के लिए प्रश्न करना शुरू कर दिया।
प्रश्न करें भी तो क्यों नहीं जब संविधान की प्रस्तावना और नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक भारत को एक कल्याणकारी राज्य के रूप में रेखांकित किया है। सरकार इसीलिए नागरिकों से टैक्स लेती है ताकि कमजोर, और अभावग्रस्त वर्गों का कल्याण सुनिश्चित किया जा सके। आजादी के बाद से ही कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकारें विभिन्न योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रू. का बजट प्रति वर्ष खर्च करती रही हैं परंतु सामाजिक-आर्थिक समानता और नागरिकों के न्यूनतम जीवन स्तर को अभी तक सुनिश्चित नहीं किया जा सका है जो कि कल्याणकारी राज्य का प्रमुख लक्ष्य है।
सरकार ने वर्तमान मुद्दे कि गंभीरता को समझते हुए मौजूदा हालात से निपटने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए का राहत पैकेज घोषित किया है जिसमें से लगभग 10 लाख करोड़ खर्च किए जा चुके है परंतु चिकित्सा सेवाओं को छोड़कर धरातली वास्तविकता में अन्य क्षेत्रों में कोई प्रगति दिखाई नहीं पड़ रही है। यदि हम इसके साथ ही पूर्व में क्रियान्वित अन्य योजनाओं की हकीकत जानने का प्रयास करे तो निष्कर्ष निकलता है कि कहीं न कहीं नीति निर्माता बुद्धिजीवी और राजनेता, क्रियान्वयनकर्ता प्रशासनिक अधिकारी और अंतिम उपभोक्ता लाभार्थी के द्वारा या सामूहिक तौर पर कहीं न कहीं बड़ी चूक हुई है अन्यथा इस समय इतने लोग रोड़ पर यूं नहीं भटक रहे होते। प्रवासी मजदूर तो एकमात्र नमूना है अगर हम दैनिक कमठा मजदूर, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, रेहड़ी वाले और स्थानीय स्तर पर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों की बात करें तो स्थितियां वहां भी दयनीय हैं।
भविष्य में ऐसी चुनौतीपूर्णआपदाओं का सामना करने के लिए सरकार को कल्याणकारी राज्य के तत्वों को केंद्र में रखते हुए सबसे कमजोर वर्ग पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है। सभी स्तरों पर व्यक्तिगत हित त्यागकर जनहित और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार द्वारा जनकल्याण के लिए जारी किया गया बजट है अंतिम व्यक्ति तक बिना किसी कटौती के पहुंचाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सभी स्तरों की खामियों को चिन्हित कर दुरुस्त किया जाना चाहिए। एक्सपर्ट संस्थाओं का सहलोग लेते हुए स्थानीय आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों की व्यवहारिक आयोजना बनाते हुए चरणबद्ध तरीके से अभावग्रस्त परिवारों को चिन्हित कर समुचित परामर्श के साथ उनकी रुचि और कौशल के अनुरूप अधिकतम सहायता प्रदान की जानी चाहिए ताकि उन परिवारों पर फिर से खर्च करने की जरूरत न पड़ें। कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन हेतु ऋण देकर स्थानीय स्तर पर कृषि उत्पाद प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहन देकर लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार दिया जा सकता है। इस प्रकार रणनीतिक रूप से आगे बढ़ने पर लोक कल्याकारी राज्य आत्मनिर्भर भारत और ग्राम स्वराज के लक्ष्य को हासिल कर सकता है।

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