ऑनलाइन शिक्षा की चुनौतियां

बाल मुकुन्द ओझा

स्कूल बच्चों को पठन पाठन के साथ रहन सहन, अनुशासन, शारीरिक कौशल और भाईचारे का पाठ पढ़ाती है। बहुत से लोग समझते है स्कूल केवल विद्या का मंदिर है और वहां केवल पढ़ने के लिए भेजते है ताकि पढ़ लिखकर बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो सके। यह धारणा सर्वथा निर्मूल है। स्कूल वह संस्था है जहाँ बच्चा अपने जीवन के सर्वांगीण विकास और प्रगति का ककहरा सीखता है। यह कच्ची उम्र है जहाँ सीखने को बहुत कुछ है। प्रारंभिक अवस्था में बच्चों को एक स्वतंत्र और गतिशील वातावरण की आवश्यकता होती है ऐसे में वह घर की चाहरदीवारों में कैद हो कर मनोवैज्ञानिक दबावों से जूझ रहे हैं। ऊपर से ऑनलाइन शिक्षा नर्सरी और प्राथमिक स्कूल के बच्चों के लिए अमानवीय से कम नहीं है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इससे 32,07,13,810 छात्र प्रभावित हो रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या प्री-प्राइमरी और प्राइमरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों की है। छोटे बच्चों की स्कूली शिक्षा के कई मायने हैं। यह सिर्फ ज्ञान के विकास की बात नहीं, उनके संपूर्ण विकास की सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है। यह केवल ऑनलाइन ही पूरी नहीं हो सकती।
कोरोनावायरस महामारी से इस समय देश और दुनिया संकट में हैं। इसका सबसे ज्यादा असर हुआ है स्कूली बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर। ऑनलाइन बच्चों को लगातार ज्ञान और विज्ञान की घुट्टी पिलाई जा रही है। इसका नतीजा बाद में बहुत घातक होने वाला है। इस बात से इंकार नहीं जा सकता कि पढ़ाई के लिए बच्चों का शारीरिक और मानसिक संपर्क बेहद जरूरी है। चंचलता से लेकर रचनात्मकता और खेलकूद से लेकर कौशल तक कई चीजें हैं, जो कभी ऑनलाइन कक्षाओं से बच्चों में नहीं आ सकतीं। व्यावहारिक ज्ञान ऑनलाइन नहीं सीखा जा सकता।
हाल ही में कोलंबिया की ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी ने इस पर अध्ययन किया और पाया कि इससे सबसे ज्यादा प्रभावित किंडरगार्डन से लेकर आठवीं कक्षा तक के बच्चे होंगे। जब वे युवा अवस्था में पहुंचेंगे, तब उन्हें इसका खामियाजा चुकाना पड़ेगा। शोध में इस बात पर चिंता जाहिर की गयी है। शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि स्कूलों में बच्चों की अनुपस्थिति को हल्के में नहीं लेना चाहिए। खासकर बच्चों के माता-पिता इस गलतफहमी में हैं कि अपने जीवन के शुरुआती दौर में अगर उनका बच्चा स्कूल न भी जाए तो कोई दिक्कत नहीं है। अभिभावाकों के लिए दसवीं और बारहवीं कक्षा में स्कूल जाना मायने रखता है। जब वो बच्चा बड़ा हो जाता है, तब उसे अहसास होता है कि शुरुआती दिनों में स्कूल जाना उसके लिए कितना जरूरी था। मतलब साफ है उसने अपने पठन और पाठन का बहुत बड़ा भाग भुला दिया।
जर्नल ऑफ यूथ एंड एडोलेसेंस में छपे इस शोध में संयुक्त राज्य अमेरिका के 10 शहरों के 648 छात्रों शामिल किया गया। बचपन से युवा होने तक उनके व्यवहार, ज्ञान, शैक्षिक, आर्थिक सफलता और राजनीतिक जुड़ाव संबंधी बदलावों पर अध्ययन किया गया। जो छात्र शुरुआत में स्कूल से ज्यादा अनुपस्थित थे, युवा होने पर उनकी चुनाव में भागीदारी काफी कम थी। ज्यादातर युवाओं के पास रोजगार नहीं था। न तो उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी और न ही उन्हें कॉलेज जाने में कोई दिलचस्पी थी। इस अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जैसे-जैसे आप स्कूल से कटते जाएंगे, वैसे-वैसे समाज से आपका लगाव भी कम होता जाएगा। इस शोध से बेशक लोगों को यह जानकारी मिलेगी कि कच्ची उम्र में बच्चे का स्कूल जाना उसके उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करता है।
अभिभावकों को यह समझना होगा डिजिटल पढ़ाई अतिरिक्त ज्ञान के लिए है न की सर्वांगीण विकास के लिए। अभी कोरोना के कारण स्कूलों का सञ्चालन नहीं हो रहा है मगर जल्द ही इस स्थिति में बदलाव आएगा और हमें अपने बच्चों को हमेशा की तरह स्कूल भेजना है तभी बच्चा अपने जीवन को सार्थक बना पायेगा।

 

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