तिलिस्मी संसार के कालजयी रचनाकार दुर्गा प्रसाद खत्री

बाल मुकुन्द ओझा

साहित्य की तिलिस्मी और रहष्य, रोमांच, मारधाड़ से ओतप्रोत रोचक विधा से आज के पाठक ज्यादा परिचित नहीं है। बाबू देवककी नंदन और दुर्गा प्रसाद खत्री ने देश और दुनिया को तिलिस्मी लेखन की अनेक दुर्लभ सौगातें दी। उनकी कालजयी रचनाएँ साहित्य के इतिहास में अमर गाथा बन गई।
आज 12 जुलाई को तिलिस्मी दुनिया, जासूसी एवं सामाजिक उपन्यास क्षेत्र के हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक दुर्गा प्रसाद खत्री की जयंती है। वर्ष 1912 में उन्होंने विज्ञान और गणित में विशेष योग्यता के साथ स्कूल लीविंग परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने लेखन के क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाया। ये हिन्दी के प्रथम तिलिस्मी लेखक और ख्याति प्राप्त तिलिस्मी उपन्यासकार बाबू देवकीनन्दन खत्री के पुत्र थे, जिन्हें भारत ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में तिलिस्मी उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त थी। तिलिस्मी उपन्यास में दुर्गा प्रसाद खत्री ने अपने पिता की परंपरा का बड़ी सूझबूझ और गहनता के साथ अनुकरण किया है। अपने पिता की तरह तिलस्मी एवं ऐय्यारी के अलावा जासूसी, सामाजिक और अद्भुत, किंतु संभावित घटनाओं पर आधारित उपन्यासों की रचना की। जासूसी उपन्यासों में राष्ट्रीय भावना और क्रांतिकारी आंदोलन प्रतिबिम्बित हुआ है। सामाजिक उपन्यास प्रेम के अनैतिक रूप के दुष्परिणाम उद्घाटित करते हैं। दुर्गा प्रसाद खत्री ने 1500 कहानियाँ, 31 उपन्यास व हास्य प्रधान लेख लिखे। दुर्गा प्रसाद खत्री ने ‘उपन्यास लहरी’ और रणभेरी नामक पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया था। पिता और पुत्र की अनेक रचनाओं पर टेलीविजन धारावाहिकों का निर्माण हुआ। तिलिस्म ऐय्यार, और ऐयारी जैसे शब्दों को हिंदी भाषियों के बीच लोकप्रिय बनाया। हिंदी साहित्य का पहला परिचय फंतासी और थ्रिलर जैसी विधाओं से कराया तो उपन्यास लेखन के क्षेत्र में जैसे तहलका मच गया।
इनके पिता देवकीनन्दन खत्री ने अपने उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तति के एक पात्र को नायक बना कर भूतनाथ उपन्यास की रचना की, किन्तु असामायिक मृत्यु के कारण वह इस उपन्यास के केवल छह भागों को ही लिख पाये। आगे के शेष पन्द्रह भाग उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने लिख कर पूरे किये। भूतनाथ भी कथावस्तु की अन्तिम कड़ी नहीं है। इसके बाद बाबू दुर्गा प्रसाद खत्री लिखित रोहतास मठ (दो खंडों में) आता है।
भूतनाथ और रोहतासमठ उनके इस विधा के उपन्यास हैं और इनमें उन्होंने अपने पिता की परंपरा को जीवित रखने का ही प्रयत्न नहीं किया है उनकी शैली का इस सूक्ष्मता से अनुकरण किया है कि यदि नाम न बताया जाय तो सहसा यह कहना संभव नहीं कि ये उपन्यास देवकीनंदन खत्री ने नहीं वरन किसी अन्य व्यक्ति ने लिखे हैं। प्रतिशोध, लालपंजा, रक्तामंडल, सफेद शैतान जासूसी उपन्यास होते हुए भी राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हैं और भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को प्रतिबिंबित करते हैं। सफेद शैतान में समस्त एशिया को मुक्त कराने की मौलिक उद्भावना की गई है। दुर्गा प्रसाद खत्री का निधन 5 अक्टूबर, 1974 को हो गया।