अन्न वितरण योजना प्रधानमंत्री का जनहितकारी कदम

श्यामसुंदर जैन, स्वतंत्र पत्रकार

देश भर में चल रहे कोरोनावायरस संकटकाल में प्रधानमंत्री ने गरीबों के कल्याण के लिए अन्न योजना का नवंबर तक विस्तार कर दिया है। यह वास्तव में एक महत्वपूर्ण जनहितकारी निर्णय साबित होगा। कोरोना की विश्वव्यापी महामारी और भयावह संक्रमण के दौर में उन साधनहीन गरीब परिवारों की एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुध ली है, जो निश्चित ही समयोचित एवं आवश्यक है।
हालांकि यह भी कटु सत्य है कि इस योजना के विस्तार से काफी मात्रा में राजस्व व्यय बढ़ेगा और कतिपय लोग इस योजना से अपने वारे न्यारे भी करने से नहीं चूकेंगे, मगर फिर भी यह योजना निश्चित रूप से उन लोगों के लिए एक प्रकार से जीवनदाई साबित होगी, जिनके पास ना तो अब जमा पूंजी है और ना ही लंबे लॉकडाउन के कारण उनके पास फिलहाल रोजी-रोटी के साधन बचे हैं।
हालांकि अनलॉक का दूसरा चरण चालू हो चुका है, मगर फिर भी गरीब लोगों की दिनचर्या और उनके जीवन यापन को पटरी पर लौटने के फिलहाल अच्छे आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं। इसलिए अन्न योजना का विस्तार उन लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत साबित होगा।
किसी भी जनकल्याणकारी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेवारी और अहम चिंता जनता के खाद्यान्न यानि अन्न जल की व्यवस्था करनी होती है। प्रधानमंत्री ने इस संकल्प को एक बार फिर दोहराया है कि देश का कोई भी व्यक्ति अथवा परिवार भूखा नहीं सोए। देश भर में लॉकडाउन के दौरान देश की सर्वोच्च प्राथमिकता यह रही कि हर घर में चूल्हा अवश्य जले ताकि समय पर सब को भोजन मिल सके। सही मायनों में केंद्र सरकार और राज्य सरकार तथा स्वयंसेवी संगठनों और सेवाभावी उद्यमियों ने इसके लिए उल्लेखनीय एवं सराहनीय दायित्व का निर्वहन भी किया है।
यह भी सत्य है कि प्रधानमंत्री हर विषय और हर बात को अपने विवेक से ही कहते हैं और उसी अनुरूप निर्णय करते हैं। चाहे मामला अन्न वितरण विस्तार योजना का हो अथवा पाकिस्तान के आतंकवाद का एवं वर्तमान में चीन के साथ चल रहे तनाव के संदर्भ में हो।
एक बात तो माननी पड़ेगी कि प्रधानमंत्री प्रत्येक मुद्दे को उठाते हुए गंभीरता के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत की ओर ध्यान अवश्य खींचते हैं। उसके लिए समुचित प्रयास भी करते नजर आ रहे हैं। फिर भी आलोचक अन्न विस्तार योजना की घोषणा को चीन से चल रहे तनाव को से जोड़ने से बाज नहीं आ रहे। वैसे वह और करें भी क्या ? सियासत में रहने के लिए छिद्रान्वेषण भी आवश्यक है। ऐसे पेशेवर आलोचक और राजनेताओं को ऐसी जनहितकारी योजना नागवार ना लगेगी तो वो और करेंगे भी क्या ? शायद वह लोग यह भूल रहे हैं कि भारत देश में अन्न योजना के करीब 80 करोड़ लाभार्थियों की पहचान का आधार उनकी आर्थिक दशा है। ऐसे लोग यह भी भूल जाते हैं कि हमारा देश पाकिस्तान की तरह धर्म और संप्रदायवादी नहीं है, इसलिए बिना किसी जाति धर्म या मजहब के सब को लाभान्वित किया जाता है। इसके अलावा निकट भविष्य में इसके लिए देश भर में एक राशन कार्ड की व्यवस्था भी की जा रही है।
प्रधानमंत्री की गरीब कल्याण अन्न योजना के विस्तार के सियासी मायने पर भी गौर किया जा रहा है। आलोचक और प्रतिपक्षी यह भी मानते हैं कि इस योजना को नवंबर तक बढ़ाने का कारण बिहार विधानसभा के होने वाले चुनाव भी हो सकते हैं। यह बात सही हो सकती है क्योंकि हमारे देश में अधिकांश क्या लगभग सभी राजनेता जन कल्याणकारी योजनाओं को निश्चित ही राजनीतिक लाभ से भी जोड़ते हैं। यह भी निश्चित बात है कि लॉकडाउन के चलते तालाबंदी व ठप हो चुके व्यवसाय से सबसे ज्यादा प्रभावित मजदूर वर्ग हुआ है। उनका रोजगार और रोजगार के साधन फिलहाल चले गए हैं। इस प्रकार के हालातों में यह जन कल्याणकारी अन्न वितरण योजना को बढ़ाया जाना निश्चित रूप से राहतदायक साबित होगी। हो सकता है प्रधानमंत्री के मन में राजनीतिक लक्ष्यवेद की भी मंशा रही होगी, पर इससे ज्यादा महत्व विश्वव्यापी कोरोना महामारी के संकट काल में गरीबों के लिए सहायता महत्वपूर्ण है और यह सहायता की और महता को कम नहीं आंका जा सकता।