बैद्यनाथ कावड़ यात्रा पर कोरोना का ग्रहण भक्त बोले त्राहिमाम शिवम

अभिजीत आनंद (लेखक/कवि)

पौराणिक कथा के अनुसार दशानन रावण जिसका दस सिर था भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर तप कर रहा था परन्तु भगवन शिव खुश नहीं हो रहे थे तो वह एक-एक करके अपनी सिर काटकर शिवलिंग पर चढाने लगे 9 सिर चढाने के बाद जब रावण 10 वां सिर चढाने वाला था और अपने प्राणों की आहुति देने वाला था की शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया और उसे वर मांगने को कहा तब रावण ने भगवान शिव को ही लंका साथ ले जाने का वरदान मांग लिया।

रावण के पास सोने की लंका के अलावा बहुत सारी शक्ति तो थी साथ ही कई देवता को भी लंका में रखे हुए थे इस वजह से रावण ने इच्छा जताई कि भगवान शिव आप हमारे साथ स्वयं लंका पर रहे एवं हमारे साथ चलेमहादेव ने इसकी मनोकामना को पूरा करते हुए उसे वार दे दिया साथी साथ ही एक सर्त रखी कि अगर उन्हें शिवलिंग के रास्ते में कहीं भी रखा तो मैं फिर वही विराजमान हो जाऊंगा और नहीं उठूंगा।

इधर भगवान शिव की बात सुनते ही सभी देवी-देवता चिंतित हो गए समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास गए तभी भगवान विष्णु ने उनका दुःख दूर करने की बात कही।

उधर जब रावण उस शिवलिंग को लेकर जा रहा था तभी उसे रास्ते में उसे लघुशंका लगी और रावण वह शिवलिंग एक एक बैजू नामक ग्वाला को पकड़ने के लिए दे दिया और वह लघुशंका करने चला गया पर उसकी लघुशंका खत्म ही नहीं हो रही थी और वह कई घंटो तक लघुशंका करता रहा आज भी वहा एक तालाब है जिसे रावण की लघुशंका से उत्पन्न तालाब कहा जाता है।

वास्तव में बैजू नामक ग्वाला भगवन बिष्णु थे एवं ग्वाला के रुप में थे। रावण से लिया हुआ शिवलिंग वह वही स्थापित कर दिया तथा वह चला गया इसलिए इस स्थान को बैजू नामक ग्वाला नाम पर बैजनाथ भी कहा जाता है।जब रावण वापस आया तो देखा वह शिवलिंग वही स्थापित हो गयी है। वह शिवलिंग को बहुत उठाने की कोशिश की परन्तु उठा नहीं पाया अंत में उसे अंगूठे से दबा कर वही पर छोड़ कर चला गया।
आज वह शिवलिंग झारखण्ड के देवघर में स्थित हैं जों रावणेश्वर बैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध है एवं इस स्थान को बाबा धाम के नाम से जाना जाता है।

*कावड़ यात्रा की शुरुआत*

पौराणिक कथाओं के अनुसार यात्रा को भगवान श्री राम ने शुरू किया:
ऐसा भी माना जाता है कि भगवान राम पहले कांवड़िया थे. कहते हैं श्री राम ने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार

कुमार ने की थी कांवड़ की शुरुआत:
कुछ लोगों को मानना है कि पहली बार श्रवण कुमार ने त्रेता युग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी. अपने दृष्टिहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराते समय जब वह हिमाचल के ऊना में थे तब उनसे उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा के बारे में बताया. उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठाया और हरिद्वार लाकर गंगा स्नान कराए. वहां से वह अपने साथ गंगाजल भी लाए. माना जाता है तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई.

पुराणों के अनुसार

माना जाता है रावण था पहला कांवड़िया:पुराणों के अनुसार इस यात्रा शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी. मंथन से निकले विष को पीने की वजह से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया था और तब से वह नीलकंठ कहलाए. इसी के साथ विष का बुरा असर भी शिव पर पड़ा. विष के प्रभाव को दूर करने के लिए शिवभक्त रावण ने तप किया. इसके बाद दशानन कांवड़ में जल भरकर लाया और शिवजी का जलाभिषेक किया. इसके बाद शिव जी विष के प्रभाव से मुक्त हुए. कहते हैं तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई.

*देवघर के प्रमुख दर्शनीय स्थल*

त्रिकुट :- देवघर से 16 किलोमीटर दूर दुमका रोड पर एक खूबसूरत पर्वत त्रिकूट स्थित है। इस पहाड़ पर बहुत सारी गुफाएं और झरनें हैं। बैद्यनाथ से बासुकीनाथ मंदिर की ओर जाने वाले श्रद्धालु मंदिरों से सजे इस पर्वत पर रुकना पसंद करते हैं।

नौलखा मंदिर – देवघर के बाहरी हिस्से में स्थित यह मंदिर अपने वास्तुशिल्प की खूबसूरती के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण बालानंद ब्रह्मचारी के एक अनुयायी ने किया था जो शहर से 8 किलोमीटर दूर तपोवन में तपस्या करते थे। तपोवन भी मंदिरों और गुफाओं से सजा एक आकर्षक स्थल है।

नंदन पहाड़ :- इस पर्वत की महत्ता यहां बने मंदिरों के झुंड के कारण है जो विभिन्न भगवानों को समर्पित हैं। पहाड़ की चोटी पर कुंड भी है|

सत्संग आश्रम :- ठाकुर अनुकूलचंद्र के अनुयायियों के लिए यह स्थान धार्मिक आस्था का प्रतीक है। सर्व धर्म मंदिर के अलावा यहां पर एक संग्रहालय और चिड़ियाघर भी है।

वर्तमान परिस्थिति
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने साफ कर दिया है कि कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए सरकार ने इस बार देवघर के विश्वप्रसिद्ध श्रावणी मेले का आयोजन नहीं कराने का फैसला लिया है। उन्होंने यह भी घोषणा की है कि देवघर और बासुकीनाथ के वैसे प्रभावित लोगों को सरकार विशेष पैकेज देगी, जो रोजी-रोजगार के लिए इस मेले पर आश्रित रहते हैं।

पंडा धर्मरक्षिणी सभा के प्रतिनिधियों से मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि कोरोना को लेकर सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। वर्तमान परिस्थितियों में मंदिर खोलना जन स्वास्थ्य के लिहाज से उचित नहीं है। इसके लिए वे बाबा भोलेनाथ से क्षमा मांगते हैं। पंडा धर्मरक्षिणी सभा के प्रतिनिधि बुधवार को सीएम से इस मुद्दे पर चर्चा करने हेमंत सोरेन के बुलावे पर रांची आए थे।

पंडा धर्मरक्षिणी सभा के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री से कहा कि इस बार श्रावणी मेला का आयोजन नहीं होने से देवघर और बासुकीनाथ में हजारों लोगों के समक्ष रोजगार का संकट उत्पन्न हो जाएगा। हजारों ऐसे लोग पूरे वर्ष अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए इस मेले पर निर्भर रहते हैं। इसपर मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर एवं उसके आसपास वैसे लोगों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज जारी करने का आश्वासन देते हुए कहा कि सरकार को उनकी चिंता है।

कानूनी दावपेच
झारखंड हाई कोर्ट में शुक्रवार को श्रावणी मेला 2020 के मामले में सुनवाई हुई। श्रावणी मेला व कांवर यात्रा के मामले में हाई कोर्ट का फैसला आ गया है। आदेश के मुताबिक श्रावणी मेला का आयोजन नहीं होगा। कांवर यात्रा नहीं होगी। हाई कोर्ट ने सावन में देवघर मंदिर की पूजा को ऑनलाइन दर्शन कराने का सरकार को आदेश दिया। यहां निशिकांत दुबे ने श्रावणी मेला और कांवर यात्रा को नियम-शर्तों के साथ चालू करने की अपील की है।

झारखंड सरकार के सचिव अमिताभ कौशल ने अदालत में कहा कि सरकार ने ऐसी किसी भी संस्था या धर्मिक स्थलों को नहीं खोला है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ रहा हो। इस मसले पर कोर्ट को जानकारी देने के लिए झारखंड सरकार के आपदा सचिव अमिताभ कौशल को अदालत में बुलाया गया था। अदालत इस बात से नाराज है कि जब मामला कोर्ट में लंबित है, तो श्रावणी मेले को लेकर सीएम हेमंत सोरेन को मीडिया में बयान नहीं देना चाहिए।

बाबा दर्शन का उपाय
अब हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक सावन के पहले दिन से ही बाबाधाम की पूजा का ऑनलाइन दर्शन शुरू हो गया है |
*कोरोना संकट ने बदला भक्ति का ट्रेंड,*
इस धार्मिक नगरी में हर साल सावन के महीने में लाखों श्रद्धालू बाबा वैद्यनाथ धाम का दर्शन और जलाभिषेक करने के लिए आते हैं। इस बार सावन महीने की शुरुआत ही सोमवार से हुई है। सावन के सोमवार को बड़ा महत्व है। ऐसे में इस खास दिन बाबा वैद्यनाथ धाम पूजा के लिए बिहार के साथ-साथ झारखंड के तमाम इलाकों से श्रद्धालु पहुंचे थे, जिन्हें प्रशासन ने बॉर्डर पर ही रोक दिया। जिससे श्रद्धालु बैरिगेट पर ही जलार्पण कर निराश होकर लौट गए |

*श्रवणी मेला नहीं आयोजित होने के विषय में प्रचार प्रसार की आवश्यकता*

सैकड़ों किलोमीटर की कठिन दूरी तय कर सर्धालू बाबा धाम पहुंचते हैं बाबा पर जलार्पण की आशा लगाए परंतु उन्हें देवघर पहुंचकर पता लगता है कि मंदिर में कावरियों के पूजा पर रोक है |। इससे वह नाराज़ और दुःखी हो जाते है , प्रशाशन के रोके जाने के बाद आवेश में आकर बीते दिन कावरियों ने करीबन रात २.३० बजे पुलिस पर पथराव किया | बाद में समझाने के बाद वो लौट गए, यदि उन्हें सुल्तानगंज या देवघर पहुंचने से पूर्व जलार्पण संभव नहीं होने की सूचना मिलती तो यह घटना निश्चय ही नहीं होती |

निष्कर्ष 
बाबा बैद्यनाथ त्रिलोकीनाथ है, उनके मर्जी के खिलाफ पत्ता भी नहीं हिलता , इस चराचर जगत में शिव के कृपा के बिना कोई भी कार्य असंभव है | सभी सनातन धर्म को मानने वाले लोगो के भोलेनाथ पर दृद निष्ठा एवं विश्वाश रखना चाहिए इस वर्ष सावन मेला न लगना एवं कावड़ यात्रा इस बार संभव नहीं होने के पिछे इस्वर की कोई लीला है एवं सभी को उनके इस आदेश का पालन करना चाहिए |

“वैसे भी जो मन का होता है वह अच्छा परंतु जो मन का न हो वह और अच्छा, क्योंकि वह ईश्वर के मन का होता है “

(लेखक माहविधा द्वारा सम्मानित सह राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं)

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