जलवायु परिवर्तन से जीव जंतुओं पर खतरे की घंटी

बाल मुकुन्द ओझा

जलवायु परिवर्तन ने एक बार फिर दुनिया के समक्ष भारी खतरे का आगाज कर दिया है। इससे मानव और जीव जंतु दोनों प्रजातियां प्रभावित हुई है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया में 10 लाख से अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन मानवीय गतिविधियों की तुलना में कही अधिक प्रजातियों को जोखिम में डाल रहा है। इसकी वजह से पौधों और जीव समूह की करीब 25 प्रतिशत प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही है। यदि इन कारकों से निपटने के लिए प्रयास नहीं हुए तो कुछ ही दशकों में 10 लाख से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र पयार्वरण कार्यक्रम ने कहा है कि हर साल लगभग 80 लाख टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंका जाता है जो 800 से ज्यादा प्रजातियों के लिए खतरा पैदा करता है। विश्व में तीन अरब से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिए समुद्र और तटीय जैव विविधता पर निर्भर हैं। समुद्र प्रोटीन का भी स्त्रोत है और इससे तीन अरब से अधिक लोगों को प्रोटीन मिलता है। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत महासागर प्रदूषण, घटती मछलियों की संख्या और तटीय पयार्वास के क्षय के साथ इंसानी गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित है।
जलवायु परिवर्तन ताजे पानी, कृषि योग्य भूमि और तटीय व समुद्री संसाधन जैसे भारत के प्राकृतिक संसाधनों के वितरण और गुणवत्ता को परिवर्तित कर सकता है। कृषि, जल और वानिकी जैसे अपने प्राकृतिक संसाधन आधार और जलवायु संवेदनशील क्षेत्रों से निकट रूप से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश भारत को जलवायु में अनुमानित परिवर्तनों के कारण गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
वैश्विक तापमान उम्मीद से अधिक तेज गति से बढ़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन में समय रहते कटौती के लिए कदम नहीं उठाए जाते तो इसका विनाशकारी प्रभाव हो सकता है। ग्लोबल वार्मिंग (जलवायु परिवर्तन) यानी सरल शब्दों में कहें तो हमारी धरती के तापमान में लगातार बढ़ोतरी होना। ग्लोबल वार्मिंग जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन में वृद्धि के कारण पृथ्वी के वायुमंडल के तापमान में वृद्धि को दर्शाता है। जलवायु परिवर्तन के बारे में बदलते जलवायु रुझान को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन होता है।
आज जलवायु परिवर्तन हमारे समाज के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। ग्लोबल वार्मिंग हजारों वर्षों में हमारा सबसे बड़ा खतरा है। जबकि पृथ्वी ने व्यापक जलवायु परिवर्तन से बचा लिया है और बड़े पैमाने पर विलुप्त होने के बाद पुनर्जीवित हो गया है। यह हमारी परिचित, प्राकृतिक दुनिया और हमारी विशिष्ट समृद्ध मानव संस्कृति का विनाश नहीं है। यह भयावह लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण यह है कि अगर हमने अगले दशक के भीतर कार्रवाई नहीं की है, तो हम प्राकृतिक दुनिया और हमारे समाजों के पतन के लिए अपरिवर्तनीय क्षति का सामना कर सकते हैं। यह हमारे हाथों में है कि हम अपने पर्यावरण और प्राकृतिक दुनिया की रक्षा करें। पृथ्वी के वायुमंडल में प्राथमिक ग्रीनहाउस गैसें जल वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओजोन हैं। कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाने से हमारे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होता है। इन ग्रीनहाउस गैसों में से अधिकांश पृथ्वी के वायुमंडल को अधिक गर्मी में फंसाने का कारण बन सकती हैं। इससे पृथ्वी गर्म होती है।
जलवायु में परिवर्तन महत्वपूर्ण रोगवाहक प्रजातियों (मसलन, मलेरिया के मच्छर) के वितरण को बदल सकता है, जिसके कारण इन रोगों का विस्तार नए क्षेत्रों में हो सकता है। यदि तापमान में 3.80 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि और इसकी वजह से आर्द्रता में 7 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो भारत में नौ राज्यों में वे सभी 12 महीनों के लिए मारक बने रहेंगे। जम्मू-कश्मीर और राजस्थान में उनके प्रकोप वाले समय में 3-5 महीनों तक वृद्धि हो सकती है। हालांकि ओडिशा और कुछ दक्षिणी राज्यों में तापमान में और वृद्धि होने से इसमें 2-3 महीने तक कम होने की संभावना है। भारी जनसंख्या वाले क्षेत्र जैसे तटीय क्षेत्र शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में बुआई वाले क्षेत्रों में जलवायु संबंधी जटिलताओं और वृहत जल प्रपातों से प्रभावित होते हैं, जिनमें से लगभग दो-तिहाई हिस्से पर सूखे का खतरा है।

 

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