कालजयी रचनाकार पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी

बाल मुकुन्द ओझा

धीरे धीरे हम हिंदी के रचनाकारों को भूलते जा रहे है। आज की पीढ़ी इन रचनाकारों और उनके साहित्य को नहीं जानती मगर अपनी अमर रचनाओं के कारण आज भी ये रचनाकार इतिहास के पन्नों में अपनी अमिट हाजिरी दर्ज कराये हुए है। ऐसे ही एक महान रचनाकार जयपुर के चंद्रधर शर्मा गुलेरी है जो अपनी कालजयी कहानी उसने कहा था के लिए देशभर में विख्यात है। हिंदी के प्रमुख साहित्यकार पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म 7 जुलाई, 1883 को पुरानी बस्ती जयपुर में हुआ था। आज हिंदी साहित्य को उसने कहा था जैसी कालजयी कहानी देने वाले पं. श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी की जयंती है। जीवंत संवादों से भरी उसने कहा था का मुख्य पात्र लहना सिंह हो या रेशम से कढ़े पल्लू वाली अमृतसर के बाजार में उसे मिली लड़की जो कालांतर में सूबेदारनी बन कर फिर कुछ कहती है। दोनों ने एक दूसरे को बिना कहे भी बहुत कुछ कहा, और कहे हुए के अलावा वह सब भी ठीक से सुना गया जो कहा नहीं गया था। हिंदी साहित्य की सबसे उम्रदराज कहानी उसने कहा था को 2020 में 106 साल पूरे हो रहे हैं।
चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ऐसे अकेले कथा लेखक थे जिन्होंने मात्र तीन कहानियां लिखकर कथा साहित्य को नई दिशा और आयाम प्रदान किये। गुलेरी जी की ‘उसने कहा था’ कहानी आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में। इस कहानी की अमरता का एक खास गुण है जिसमें सुगठित कथानक, देशकाल, चरित्रांकन, वातावरण, भाषा में नवीनता तथा उद्देश्यनिष्ठता के दर्शन होते हैं। गुलेरी ने अपनी रचनाएं वार्तालाप शैली में लिखी हैं।
गुलेरी जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। आप संस्कृत, पाली, प्राकृत, हिंदी, बांग्ला, अँग्रेजी, लैटिन और फ्रैंच आदि भाषाओं पर एकाधिकार रखते थे । गुलेरी जी जब केवल दस वर्ष के थे तो एक बार आपने संस्कृत में भाषण देकर भारत धर्म महामंडल के विद्वानों को आश्चर्य चकित कर दिया था ।
हिमाचल प्रदेश के वाशिंदे ज्योतिर्विद महामहोपाध्याय पंडित शिवराम के पुत्र चन्द्रधर का जन्म 7 जुलाई, 1883 को हुआ। घर में बालक को संस्कृत भाषा, वेद, पुराण आदि के अध्ययन, पूजा-पाठ, संध्या-वंदन तथा धार्मिक कर्मकाण्ड का वातावरण मिला और मेधावी चन्द्रधर ने इन सभी संस्कारों और विद्याओं आत्मसात् किया। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा भी प्राप्त की और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे।
बीस वर्ष की उम्र के पहले ही उन्हें जयपुर की वेधशाला के जीर्णोद्धार तथा उससे सम्बन्धित शोधकार्य के लिए गठित मण्डल में चुन लिया गया था और कैप्टन गैरेट के साथ मिलकर उन्होंने द जयपुर ऑब्जरवेटरी एण्ड इट्स बिल्डर्स शीर्षक अंग्रेजी ग्रन्थ की रचना की। वे अपनी रचनाओं में स्थल-स्थल पर वेद, उपनिषद, सूत्र, पुराण, रामायण, महाभारत के संदर्भों का संकेत दिया करते थे। उनकी रुचि धर्म, ज्योतिष इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन भाषाविज्ञान शिक्षाशास्त्र और साहित्य से लेकर संगीत, चित्रकला, लोककला, विज्ञान और राजनीति तथा समसामयिक सामाजिक स्थिति तथा रीति-नीति में थी। आम हिन्दी पाठक ही नहीं, विद्वानों का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें अमर कहानी ‘उसने कहा था’ के रचनाकार के रूप में ही पहचानता है। गुलेरी जी हिंदी के अतिविशिष्ट कथाकार हैं। वह कुछ समय तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग में प्राचार्य भी रहे।
निबंधकार के रूप में भी गुलेरीजी प्रसिद्ध रहे हैं। इन्होंने सौ से अधिक निबंध लिखे हैं। सन् 1903 ई. में जयपुर से जैन वैद्य के माध्यम से समालोचक पत्र प्रकाशित होना शुरु हुआ था जिसके वे संपादक रहे। इन्होंने पूरे मनोयोग से समालोचक में अपने निबंध और टिप्पणियाँ देकर जीवंत बनाए रखा। इनके निबंधों के अधिकतर विषय- इतिहास, दर्शन, धर्म, मनोविज्ञान और पुरातत्व संबंधी ही हैं । ‘शैशुनाक की मूर्तियाँ’ ‘देवकुल’ ‘पुरानी हिंदी’, ‘संगीत’, ‘कच्छुआ धर्म’, ‘आँख’, ‘मोरेसि मोहिं कुठाऊँ’ और ‘सोहम्’ जैसे निबंधों पर उनकी विद्वता की अमिट छाप मौजूद है ।
गुलेरी जी 1883 में पैदा होकर 1922 में ही 39 वर्ष की आयु में शरीर छोड़ गए थे लेकिन जयपुर राजघराने से लेकर वाराणसी और प्रयागराज के बौद्धिक और शैक्षणिक जगत के बीच अपनी प्रतिभा का लोहा मना गए।

 

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