शुंगकालीन कला के उच्चतम प्रतिमान सांची के कलात्मक स्तूप

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल लेखक एवं पत्रकार

बुद्ध पूजा, इंद्र का बुद्ध के पास आगमन,मायादेवी का स्वपन, बुद्ध का कपिलवस्तु गमन, राजाओं द्वारा बुद्ध की अस्थियों के लिए युद्ध, महाकपि जातक बुद्ध का संदेश ग्रहण करते हुए,मालाओं का सुन्दर संयोजन, बीच में-सात बुद्ध, अन्तिम-स्वर्ग में इन्द्र, मन्दाकिनी नदी, जंगल नाग राज, दांये हाथ को कमर पर टिकाए और बांये हाथ में कमल का फूल लिए यौवना, कमल के तालाब में हाथी, प्रेमी युगल,युद्ध के दृश्य,नृत्य, गज-लक्ष्मी, सन्यासी,पशु-पक्षी,कमल कलश एवं पारिवारिक दृश्यों के शिल्पांकन के विविध अलंकरणों से सजे सांची के स्तूप विशेष कर तोरण द्वार हर किसी के आकर्षण का केंद्र हैं। स्तूप शिल्प- कला की पराकाष्ठा कही जा सकती है। तत्कालीन समाज -संस्कृति का दर्पण, शिल्प के इस महान कला संसार को देखने दुनिया भर के सैलानी और बौद्ध मतावलम्बी हर साल बड़ी संख्या में सांची आते हैं। इसके ऐतिहासिक एवं कलात्मक महत्व के आधार पर इन स्तूपों को यूनेस्को ने  विश्व विरासत का दर्जा देकर अपनी विरासत सूची में शामिल कर संसार को इनका महत्व बताया।
शुंगकालीन मूर्तिकला के प्रमुख उद्दाहरण साँची के आशोक युगीन विशाल स्तूप के चारों ओर की प्रदक्षिणा की दोहरी वेदिका और चारों दिशाओं के अंलकृत तोरणद्वार हैं। तीन स्तूप लगभग ढाई सौ फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित हैं जिनमें से बीच वाले सबसे बड़े अंडाकार स्तूप और उसके तोरणद्वारों की कला ही संसार प्रसिद्ध है। भारत की यह धरोहर साँची के स्तूप भोपाल राज्य में स्थित हैं।

प्रारम्भ में मुख्य बड़ा स्तूप केवल ईंटों का बना हुआ था और उसके पश्चात् लगभग उपेक्षित हालत में ही पड़ा रहा, परन्तु शुंग राजाओं (188 ई. पू. -30 ई.) ने इसके चारों ओर पत्थर की दोहरी वेदिका बनवाई और सातवाहन सशकों ने इसके चारों दिशाओं में तोरणद्वार बनवाये। ये चारों तोरणद्वार बनावट में एक समान दिखाई देते हैं परन्तु उन पर उंकेरी गई शिल्प कृतियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं। इस स्तूप की परिधि 36 मीटर है और ऊँचाई लगभग 16 मीटर है। चारों दिशाओं में स्थित तोरणद्वार 34 फुट ऊँचे हैं। खम्भों के ऊपर तिहरी बड़ेरियाँ हैं जो बीच में से तनिक कमानीदार हैं तथा इनका थोड़ा हिस्सा बाहर की ओर मुड़ा हुआ है। इन बड़ेरियों को सिंह, हाथी, बौने आदि अपने ऊपर लादे हुए दिखाये गये हैं।
साँची के शिल्प की शैली
स्तूप के तोरणों पर भगवान बुद्ध के जीवन सम्बन्धी दृश्यों तथा उनके पूर्व जन्मों के दृश्यों का शिल्पांकन किया गया है जो अर्धचित्रों अथवा उभरी हुई प्रतिमाओं के रूप में हैं। अर्धचित्रों में अत्यन्त बारीकी व सफाई है। शिल्पकारों ने एक ही अर्धचित्र में सभी घटनाओं का समावेश का प्रयास किया है। लेख मिलता है कि कारीगरी विदिशा नगरी के हाथीदाँत पर नक्काशी करने वाले कारीगरों के द्वारा बनाई गई है।
साँची के तोरणों विशेषता है कि भगवान बुद्ध के जन्म-जन्मान्तरों की घटनाओं को तो दर्शाया किया गया है, परन्तु बुद्ध की मूर्ति का अंकन कहीं भी नहीं किया गया है। चरण-चिह्न कमलपुष्प, छत्र व बोधिवृक्ष आदि प्रतीक चिन्हों के माध्यम से बुद्ध को दर्शाने का प्रयास किया गया हैं। साँची की मूर्तिकला में आकृतियों की अधिकता है तथा स्थान की कमी झलकती है।
साँची में अधिकांशत: जातक कथाओं का अंकन मिलता है। इसके अतिरिक्त पारिवारिक दृश्य, युद्ध के दृश्य, प्रेमी युगल, सन्यासी, पशु-पक्षी, पूजा के दृश्य व अलंकरण आदि भी बहुतायत से बनाये गये हैं। साथ ही वानर, किन्नर, यक्ष-यक्षिणी, वृक्षिका, सिंह, हाथी, नृत्य के दृश्य, जलपान के दृश्य भी बनाये गये हैं। दोहरी वेष्टिनी पर जो बड़ी भारी व ऊँची है, स्थान-स्थान पर अलंकरण, गज-लक्ष्मी, कमल कलश व खिले व अधखिले कमल आदि बने हुए हैं। जगह-जगह पर बेलें बनाई गई हैं। तोरणों पर भी अनेक उभरी हुई प्रतिमाएँ हैं।
पूर्व दिशा वाले तोरण की ऊपर वाली बड़ेरी में ’सात बुद्धों की तपश्चर्या’ का अंकन है जिसमें स्तूपों को प्रतीक के रूप में दिखाया गया है व सबसे नीचे वाली बड़ेरी में सम्राट अशोक व उसकी सम्राज्ञी और पुत्र भगवान बुद्ध की पूजा करने आये हैं। उनके साथ वादक लोगों का एक दल भी है। दृश्य के बीच में एक विशाल बोधिवृक्ष का अंकन किया गया है। इस अर्धाचित्र की गणना भी साँची के सर्वोत्कृष्ट चित्रों में की जाती है।
पूर्व दिशा के तोरण की अन्दर की ओर की ऊपरी वाली दो बड़ेरियों में से ऊपर वाली बड़ेरी में सात बुद्धों की तपश्चर्या का दृश्य अंकित किया गया है। इसके नीचे वाली बड़ेरी में बुद्ध द्वारा बुद्धत्व प्राप्ति का दृश्य है जिसमें सम्पूर्ण पशु जगत् भी वहाँ उपस्थित दिखाया गया है। पूर्व दिशा के तोरण के बाहरी की बीच वाली बड़ेरी में भगवान बुद्ध के ”महाभिनिष्क्रमण” का दृश्य अंकित है, जिसमें साँची की कला अपनी पूर्णता तक पहुँच गई है। इसमें कपिलवस्तु नगर के मकान दुमंजिलें व तिमंजिलें दिखाये गये हैं। उनके झरोखों में से स्त्री-पुरूष बाहर झांक रहे हैं।
पश्चिमी तोरण द्वार पर हाथियों द्वारा वृक्ष-पूजा के दृश्य ”अस्थियों के लिए युद्ध” व ”महाकपि जातक” आदि हैं। भगवान बुद्ध की अस्थियों के लिए युद्ध के दृश्य में राजा लोग अपने हाथी और घोड़े सजाकर युद्ध करने जा रहे हैं। एक और नगर का दृश्य का अंकन है।

दक्षिण दिशा की ओर के तोरण पर शत्रु राजा की चतुरंगिणी सेना के युद्धों का दृश्य हैं। नगर के मकान दुमंजिले और तिमंजिले हैं। उनके बाहर खाई खुदी हुई है जिसमें कमल खिले हैं। दक्षिण दिशा की ओर वाले तोरण के अन्य अर्धचित्र में सरोवर में कमल खिले हुए अंकित किये गये हैं। कमलों के सरोवर प्रसन्न मुद्रा में हाथी हैं अंकित किये गये हैं। हाथी के अंतिरिक्त अश्व और बारहसिंघे भी अंकित किये गये हैं। उन पर राजा लोगों को सवार दिखाया गया है। फूलों से लदे हुए सुन्दर वृक्ष व उनके पास मयूर के जोड़ों को अंकित किया है। एक दृश्य में ”श्री देवी” का अंकन किया गया है। इसमें बीच में खिले हुए कमल के फूल पर भी श्री देवी खड़ी है। उनके पैरों में कड़े हैं। कमर में मेखला है। शरीर का ऊपरी भाग निर्वस्त्र है। उनके गले में माला है और सिर पर पगड़ी है। उनके दोनों ओर दो कमलों पर हाथी खड़े हैं।
उत्तरी तोरण पर उनका रूप ”गज लक्ष्मी” के रूप में दिखाई देता है। इसे बुद्ध की जननी माया देवी भी माना जाता है। साँची के शिल्प में ’यक्षों’ को पुरूषों जैस ही स्वरूप दिया गया है। ये राजाओं के समान ही वस्त्र व आभूषण पहने हुए हैं। ’यक्षणियों’ को भी अत्यन्त सुन्दरता के साथ आँका गया है और उन्हें आम की डालों को पकड़े इस प्रकार से खड़ा किया गया है जिस प्रकार से माया देवी बुद्ध जन्म के समय शाल वृक्ष की डाल पकड़ कर खड़ी हुई थी। इन्हें ’वृक्षिका’ कहा जाता है। साँची के इस शिल्प में यद्यपि बुद्ध की जन्म-जन्मान्तरों की जातक कथाओं का अंकन किया गया है, परन्तु उसमें धार्मिकता की कहीं भी झलक दिखाई नहीं देती। सर्वत्र लोक-कला की छाप ही दृष्टिगोचर होती है। सम्भवतः साँची के शिल्प में अंकित स्त्री पुरूषों के मुख पर चिंतन और आध्यात्मिकता की छाया नहीं दिखाई देती है वरन् एक सीधा-सादापन झलकता है। इस प्रकार साँची की कला अधिक स्पष्ट है जो उस समय के समाज का दर्पण कही जा सकती है। इस प्राचीन शिल्प के झरोखे से हम तत्कालीन समाज की झांकी देख सकते हैं। इससे लोगों के रहन-सहन, पहनावा आदि के ज्ञान के साथ-साथ राजाओं की शोभा-यात्रा, युद्ध, राज-प्रासाद, किसानों की झोपड़ियाँ आदि सभी के दृश्य हमें साँची के इन अर्धचित्रों में दिखाई दे जाते हैं। यहाँ बनाये गये ”पंखदार पशु-पक्षी” आदि विदेशी प्रभाव लिए हुए हैं। आकृतियों में बालों की अनावट व सलवटें विदेशी ढंग से बनाई गई हैं।

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