चूल्हे की रोटी और माँ का दुलार

मंगल व्यास भारती

माँ चूल्हा, धुँआ, रोटी और हाथों का छाला है। माँ जीवन का आधार है, हँसते-खेलते बच्चे का मुस्कुराता दुलार है। माँ रोटी है सब्जी है चौकन है। तो चूल्हा है बेलन है पकवान है। वो मिट्टी का चूल्हा वो गोबर से लिपा आँगन वो उपलों की आंच पे माँ के हाथ की गरम गरम रोटी बरसों बरस उनका रसभरा स्वाद लिया है। मुझे आज भी याद है, जब माँ चूल्हे से रोटी सेंकने के लिए तवा उतारती, दमकते, सुर्ख कोयलों की ताब उसके चेहरे पर पडती।
कभी लगता हैं कि कुछ संस्मरणों को अपने जीवन में सदा संजोया रखना चाहिए। पर ऐसा कैसे हो सकता है। ये सिर्फ अपनी यादों के झरोखों में या फिर अपनी लेखनी के शब्दों के भावों में ही रखने योग्य हैं। में कुछ अच्छे संस्मरणों का जो जब जब याद आते है उन पलों को रोशन कर सामने कुछ दिखाई देने लगता हैं। बात कुछ इस आधुनिक युग से निकल कर अपने भारत के पुराने तरीके जो प्रेम दया भाव अमृत भरे मिठास की बातें जो कुछ क्षण अपने समय का बीता पल जो साधन आज के माफिक थे जिससे हर काम अपने ढ़ंग से बहुत सुंदर प्रभावशाली हुआ करते थे। जो कि अंतज्ञान अपेक्षणीय होता है।
मैंने बीस तीस साल पुरानी बात जब बचपन की वो यादें अपने आप में समेट दृश्य बन उभर आता हैं। जब माँ मिट्टी के चूल्हें को अपनी रसोई में ईट पत्थर मिट्टी के गारे से बनाकर उसे लाल हिरमिर्च से अलग अलग चित्रों से सजाती और लकड़ियां डाल अग्निदेव का आह्वान कर प्रज्वलित करती फिर दिल की हर धड़कन से प्रार्थना कर गेहूं और बाजरे के आटे को बहुत देर तक गोद कर तैयार करती और फिर उसमें तेल घी नमक डालकर कर मूण देने से आटा अच्छा बन जाता था। गोल गोल चकले पर रोटी बट कर अपने ममत्व भाव को डाल साक्षात अन्नपूर्णा देवी का स्वरूप बन भोजन बनाने को तैयार होती थी। फिर चूल्हें पर लोहे का भारी सा तवा गरम कर उस पर गोल गोल रोटी बनाती जिसमें पहली रोटी अग्निदेव को अर्पित कर फिर गौ माता के लिए गऊ ग्रास निकाल कर उस थोड़ी सब्जी डाल कर गौ माता को देना फिर भगवान को अर्पित कर किसी साधु संत को रोटी देना बहुत पुण्य का काम समझ कर ये सब क्रम करके हमारे दादा दादी माँ को भोजन करवाने के बाद पिता जी और फिर स्कूल से आते हुए हमें भीनी भीनी सुगंध आती तो हम दौड़े दौड़े चले आते और माँ को कहते रोटी ड़ालो। और माँ अपना दुलार भरा ममत्व उडेल देती जिससे मन शक्ति की हर आध्यात्मिक भाव परोस कर अपने ज्ञान का अनुभव गुरुत्व भक्ति गुण थाली में परोस सदा बड़ा आनंद और जीवन में हमें भी उनके संस्कार मिले उन्हीं के पद चिन्ह पर चल आज इस आधुनिक युग में सब बदल गया। और स्वाद सब भूल चूके ये विडंबना है कि स्वास्थ्य भी आज ठीक नहीं रहता है. क्योंकि वो चूल्हें की रोटी वो माँ का दुलार सब कुछ दुनियां में बदल चुका है। वो भीनी भीनी सुगंध याद आती हैं. जिससे मेरी उत्सुकता और बढ़ जाती हैं लेकिन समय के मन में उभरने वाली जिज्ञासा कोआज हर उस इंसान को रहना पड़ता हैं। उन पलों को आनंद भरा समझ आज कल्पनिक रुप लिखा चूल्हें की रोटी माँ का दुलार याद आता हैं।

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