संघ पर प्रतिबन्ध की मांग एक फैशन से ज्यादा कुछ नहीं

बाल मुकुन्द ओझा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कुछ भी बोलना एक फैशन बन गया है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सरीखे कुछ नेता गाहे बगाहे संघ पर प्रतिबन्ध की मांग करते रहते है। अब इनमें लालू यादव जैसे नेता भी शामिल हो गए है। आश्चर्य इस बात का है दागी दामन वाले नेता भी इस मुहीम में शामिल हो गए है। लालू भ्रष्टाचार में सजायाप्त है मगर संघ जैसे संगठन को आरोपित करते देर नहीं करते।

ताज़ा प्रकरण पीएफआई पर प्रतिबन्ध के बाद उठा है। पीएफआई पर बैन के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बैन की मांग कुछ नेताओं द्वारा की गई है। कांग्रेस के कुछ नेताओं के अलावा असदुद्दीन ओवैसी सहित जेडीयू और आरजेडी के नेताओं ने भी आरएसएस को ज्यादा जहरीला संगठन करार दिया है। कल तक भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार चलने वाले नेता भी अब संघ पर प्रतिबन्ध की मांग कर रहे है जो सियासी अवसरवादिता को दर्शाता है। ये नेता वापस फिर भाजपा के साथ हो जाये इसकी भी कोई गारंटी नहीं है।

रही संघ पर प्रतिबन्ध की बात तो ऐसा तीन दफा हो चुका है और हर बार प्रतिबन्ध लगाने वालों को मुंह की खानी पड़ी और अपना कदम वापस लेना पड़ा हैं। पहली बार 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगा था जिसे 11 जुलाई 1949 को हटा लिया गया था। दूसरी बार इमरजेंसी के दरमियान लगा था जिसे इमरजेंसी हटने के फौरन बाद हटा लिया गया था वहीं अयोध्या प्रकरण के 4 दिन बाद नरसिंह राव सरकार ने यूपी समेत 4 राज्यों की बीजेपी सरकारों को बर्खास्त कर दिया था और 10 दिसंबर 1992 को संघ पर भी प्रतिबंध लगाया था। लेकिन ट्राइब्यूल ने एक बार फिर संघ पर प्रतिबन्ध को को 4 जून 1993 को नकार कर बरी कर दिया था। पहली बार महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ प्रतिबंधित हुआ था लेकिन कुछ दिनों बाद ही तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने नेहरू को 27 फरवरी, 1948 को लिखकर संघ की हत्या में संलिप्तता से इनकार कर दिया था।
संघ अपने विलक्षण सेवाभावी और रचनातमक कार्यों के लिए देश और दुनिया में ख्यात है। देश में हर संकट और विपदा के दौरान संघ के कार्यकर्ताओं को सेवा करते देखा जा सकता है। संघ के सेवा कार्यों की एक लम्बी फेहरिस्त है। संघ के बेहतरीन कामों की खूब प्रशंसा भी हुई है। 1963 में चीन से लड़ाई के बाद संघ द्वारा किए गए कार्यों को लेकर गणतंत्र दिवस समारोह की परेड में शामिल किया गया था। पाकिस्तान से लड़ाई के दौरान दिल्ली की ट्रैफिक को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए भी संघ की तारीफें हो चुकी हैं। युद्ध में घायलों की देखरेख में संघ ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि संघ अगर फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट हूं। इससे पूर्व समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया भी संघ को क्लीन चिट दे चुके है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज बच्चे से बुजुर्ग की जुबान पर है। मीडिया में सदाबहार सुर्खि़यों में रहता है। आज गाहे बगाहे हर काम में संघ का नाम लेना एक फैशन हो गया है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित कुछ नेता हर काम में संघ का नाम जपते है। मोदी सरकार के हर काम के पीछे संघ का हाथ होने का आरोप लगाते है जबकि संघ का कहना है वह एक सांस्कृतिक संगठन है। उसकी विचारधारा भाजपा से मेल खाती है और कुछ स्वयंसेवक संघ भाजपा में सक्रीय है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की जुबान पर हर समय संघ का नाम रहता है। केजरीवाल भी संघ का नाम हर कार्य में घसीटते है। कुछ अन्य पार्टियां भी संघ पर आरोप लगाते नहीं थकते। देश में जहाँ कहीं भी कोई विवाद या दंगा होता है उसमें संघ का हाथ होने का आरोप भी लगाया जाता है मगर यह आजतक प्रमाणित नहीं हुआ है।
आजादी के बाद से ही कांग्रेस के निशाने पर रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। लाख चेष्टा के बावजूद कांग्रेस संघ को समाप्त करना तो दूर हाशिये पर लाने में सफल नहीं हुआ। संघ को खत्म करने के चक्कर में खुद कांग्रेस अपना वजूद समाप्त करने की ओर अग्रसर है। संघ को वैधता दिलाने में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी पीछे नहीं रहे। परिवार और कांग्रेस के भारी विरोध के बावजूद वे नागपुर में संघ मुख्यालय गए। यह पहला अवसर था की इतने बड़े कद के किसी कांग्रेसी नेता को संघ मुख्यालय में जाते देखा गया। देश में अनेक विपदाओं के दौरान संघ के कार्यकर्ताओं ने समाज सेवा की अनूठी मिसाल कायम की, यह किसी से छिपा नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)