सशक्त सहकारिता आंदोलन आज की आवश्यकता 

संदर्भ- नयी सहकारिता नीति

     डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
केन्द्र सरकार द्वारा यही कोई 20 साल के अंतराल के बाद देश में नई सहकारिता नीति बनाने की घोषणा के साथ ही पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में 47 सदस्यीय समिति का गठन कर नीतिगत दस्तावेज तैयार करने की मंशा स्पष्ट कर दी है। दरअसल देश में बदलते आर्थिक सिनेरियों में सहकारी आंदोलन के विकास, विस्तार और प्रासंगिकता को नए सिरे से तय करने की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। देखा जाए तो देश के सहकारिता आंदोलन में पिछले सालों में लगभग ठहराव सा आ गया है। लगता है जैसे सहकारिता की लीक ही पीटी जा रही हो। करीब सवा सौ साल से भी अधिक पुराने सहकारिता आंदोलन में समय के अनुसार बदलाव और सक्रियता की आवश्यकता हो गई है। केवल और केवल गांवों में खाद-बीज और ऋण उपलब्ध कराने तक सहकारिता आंदोलन को सीमित नहीं किया जा सकता। होना तो यह चाहिए कि देश का सहकारिता आंदोलन जिसकी गहरी नींव ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में अधिक सहायक है तो दूसरी और शहरी क्षेत्र में सहकारी उपभोक्ता आंदोलन को नए सिरे से स्थापित करने की आवश्यकता हो गई है। केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह पिछले कुछ समय से सहकारिता आंदोलन को गतिशील बनाने में जुटे हैं और नई सहकारिता नीति बनाने पर उनका खासतौर से जोर रहा है। देश में आज की तारीख में एक मोटे अनुमान के अनुसार 8 लाख 50 हजार से अधिक सहकारी समितियों से 29 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। ग्रामीण स्तर पर ही करीब तीन लाख प्राथमिक कृषि ऋ़णदात्री सहकारी समितियां कार्य कर रही है। हांलाकि अमित शाह ने प्राथमिक कृषि ऋणदात्री सहकारी समितियों के और अधिक गठन की आवश्यकता व्यक्त करते हुए देशभर में दो लाख नई पैक्स के गठन सहित पांच लाख पेक्स की आवश्यकता जताई है। सहकारिता के प्रति गंभीरता को इससे समझा जा सकता है कि इसी माह जहां सहकारिता नीति के मसौदे के लिए समिति गठित हो गई है वहीं सहकारिता मंत्रियों, सचिवों व रजिस्ट्रारों के दो दिवसीय सम्मेलन में मंथन भी किया गया है। देखा जाए तो आजादी के 75 साल होने पर भी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का प्रमुख आधार व केन्द्र बिन्दु सहकारिता होने के बावजूद दिन प्रतिदिन कमजोर ही होती जा रही है ओर सहकारिता की प्रासंगिकता के प्रश्न उठाए जाने लगे हैं। ऐसे में नई सहकारिता नीति की घोषणा से आशा का संचार हुआ है।
सहकारी अर्थ व्यवस्था का मॉडल पूंजीवादी और साम्यवादी अर्थव्यवस्था में समन्वय बनाने के उद्धेश्य से अपनाया जाता है। इसमें लाभ किसी एक व्यक्ति को नहीं जाकर सदस्यों को जाता है। सदस्यों द्वारा सदस्यों के हित में सदस्यों के लिए सहकारी संस्था का संचालन होता है। इसके मूल में आर्थिक लोकतंत्र स्थापना है, पर देश के सामने लंबे समय सेे सशक्त सहकारी नेतृत्व के नहीं उभरने के कारण यह आंदोलन सहकारी कम सरकारी आंदोलन अधिक बन कर रह गया है। एक समय था जब केन्द्र व राज्य सरकारों खासतौर से महाराष्ट्र, गुजरात सहित दक्षिण के कुछ राज्यों में सहकारी नेतृत्व की तूंती बजा करती थी। शरद पंवार उसी लॉबी से आते रहे हैं। महाराष्ट्र के पाटिल, चह्वाण आदि के सहकारी लॉबी के चलते केन्द्र व राज्य में दबदबे को आज भी याद किया जाता है। पर आज यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि चीनी, हाउसिंग या हैण्डलूम, मत्स्य या अन्य क्षेत्रों में आज कहीं ऐसे दिग्गज नाम नहीं दिखाई दे रहे हैं जिनका सहकारिता और राजनीति दोनों में ही दबदबा या पहचान हो। यह सहकारी लोकतंत्र की कमजोरी का ही कारण है। दरअसल अब कोई सत्ता का दूसरा केन्द्र तैयार ही नहीं होने देना चाहते, यही कारण है कि सहकारी संस्थाओं की लोकतांत्रिक व्यवस्था यानी की समय पर चुनाव की बात बेमानी होती जा रही है। अब तो निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर प्रशासकीय व्यवस्था का दौर चल निकला है। अब तो अधिकांश स्थानों पर सहकारी संस्थाओं का संचालन प्रशासकों के सहारे होने लगा हैं। यह सुविधाजनक भी है। एक समय यह प्रयास अवश्य चले थे कि पंचायतीराज संस्थाओं की ही तरह ही सहकारी संस्थाओं के चुनाव भी तय समय पर हो पर यह प्रयास सिरे नहीं चढ़ पाएं। हांलाकि राजस्थान में तत्कालीन सहकारिता राज्य मंत्री व वर्तमान में राजस्थान के चिकित्सा मंत्री परसादी लाल मीणा की अध्यक्षता में राजस्थान में नया सहकारिता कानून बनाने के लिए गठित समिति ने सहकारी संस्थाओं के समय पर व निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पृथक से राज्य चुनाव प्राधिकरण बनाने और चुनाव प्राधिकारी की सिफारिश की और राजस्थान में यह व्यवस्था भी हुई और कुछ हद तक सफल रहने के बावजूद हालात न्यायालयीय आदेशों से चुनाव कराने की बाध्यता के ही देखने को मिलते रहे हैं।
हमारे देश में सहकारी मॉडल को ग्रामीण आर्थिक विकास के उद्धेश्य से अपनाया गया। सरकारी प्रयासों से सहकारिता का विस्तार भी हुआ पर सरकारी भरोसे संस्थाओं को चलाना सही विकल्प नहीं माना जा सकता। आर्थिक उदारीकरण के दौर में सहकारिता की प्रासंगिकता को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं, उसके चलते सहकारी संस्थाओं के सामने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए पतिस्पर्धा में काम करने की प्रवृति बलवती हुई। आज देश में इफको जैसी सहकारी संस्था भी है जिसने न केवल सरकारी हिस्सेदारी को लौटाया बल्कि विविधिकरण करते हुए खाद के उत्पादन व विपणन के साथ ही बीमा, ग्रामीण टेलीफोनी जैसे क्षेत्रों में पहचान बना ली है। इसी दिशा में देश की अन्य सहकारी संस्थाओं को भी आगे बढ़ना होगा।
पिछले दिनों देश में कृषि कानूनों को लेकर लंबा आंदोलन चला और उसके बाद तीनों कानून वापिस लेने पड़े। किसान आंदोलनों का केन्द्रीय बिन्दु किसानों को उनकी उपज का पूरा पैसा दिलाना रहा है। यानी कि किसानों की समर्थन मूल्य पर कृषि उपज की खरीद व्यवस्था का लाभ अनिवार्यतः किसानों को मिलें यह मांग प्रमुखता से रही है। कमोबेस यह बात स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट से निकल कर आती है। ऐसे में इस समस्या का हल पैक्स को मजबूत करके आसानी से किया जा सकता है। एक समय था जब सहकारी संस्थाओं द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीद के साथ ही व्यावसायिक दरों पर भी खरीद की जाती थी। आज यह व्यवस्था लगभग नगण्य स्तर पर आ गई है। पैक्स को मजबूत कर पैक्स स्तर पर ही खरीद फरोख्त व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर दी जाए तो कुछ हद तक समस्या का हल हो सकता है। एकबात और याद रखनी होगी कि यदि सहकारी व्यवस्था को बनाए रखना है तो इसे आत्मनिर्भर, वित्तीय सक्षमता और सदस्योन्मुखी बनाने की पहल देर सबेर करनी ही होगी। माना जाना चाहिए कि नई सहकारिता नीति में सहकारी संस्थाओं के लोकतांत्रिक स्वरुप कायम करने, सहकारी नेतृत्व विकसित करने, सहकारी संस्थाओं को आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बनाने और देश में सशक्त सहकारी आंदोलन विकसित करने के प्रावधान होंगे। हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि बदलते आर्थिक सिनेरियों में आज सहकारिता अधिक प्रासंगिक हो गई है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)