सर्वे कितना खर्रा कितना खोटा

     बाल मुकुंद ओझा

आजकल सर्वे की बहुत ज्यादा चर्चा हो रही है। जिसे चाहे वह सर्वे करवा रहा है। आखिर यह सर्वे है क्या, इसकी जानकारी जनसाधारण को होनी बहुत जरुरी है। सीधे शब्दों में बात करें तो किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी या किसी भी विषय पर लोगों की मन की बात जानने के लिए लोगों के बीच में सर्वे किया जाता है, जिससे कि वहां के समाज के लोगों की क्या स्थिति है ,और वहां पर क्या चल रहा है उन सभी का हमें पता चल जाता है। कुल मिलकर लोगों के मन की बात सर्वे के दौरान जानने की चेष्टा की जाती है। सर्वे शत प्रतिशत सही हो इसका दवा नहीं किया जा सकता ,फिर भी सर्वे के महत्त्व से नाकारा नहीं जा सकता। सर्वेक्षण एक शोध पद्धति है जिसका उपयोग रुचि के विभिन्न विषयों में जानकारी और अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए उत्तरदाताओं के पूर्वनिर्धारित समूह से डेटा एकत्र करने के लिए किया जाता है। उनके कई उद्देश्य हो सकते हैं, और शोधकर्ता इसे चुनी गई कार्यप्रणाली और अध्ययन के लक्ष्य के आधार पर कई तरीकों से संचालित कर सकते हैं। हमारे लिए सही सर्वेक्षण उपकरण का उपयोग करके लक्षित आबादी के लिए सामाजिक अनुसंधान के लाभों को समझना आवश्यक है।
एक समय था केवल सरकारें ही सर्वे करवाती थी। लोग सर्वे का मतलब जमीन की नाप जोख से निकालते थे। मगर अब सर्वे बहुत विस्तृत हो गया है। अब हर मामले में सर्वे करवा कर लोगों के मन की थाह ली जाती थी और फिर योजनाएं बनाकर उसका क्रियान्वयन करवाया जाता था। इनमें चुनावी सर्वे लोगों को बहुत पसंद आता है। यह सर्वे लोकप्रिय भी हुआ है। भारत में जब भी चुनाव होता है उसके पहले और बाद में ज्यादातर सर्वे एजेंसियों, मीडिया चैनलों और अखबारों द्वारा इलेक्शन सर्वे तैयार किया जाता है। यह इसलिए कराया जाता है ताकि मालूम हो सके कि चुनाव के बाद जनता और मतदान का रुख क्या रहा और सरकार किसकी बन सकती है। ये ओपिनियन और एक्जिट पोल कितने सही हैं, उसके बारे में कोई सर्वे एजेंसी नहीं बताती। सर्वे एजेंसियां मानती हैं कि उनके रुझान करीब-करीब सही होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। हालांकि कभी-कभी ये सही भी होते हैं।
चुनावी सर्वे कराए जाने की शुरुआत दुनिया में सर्वप्रथम अमेरिका में हुई थी। अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने इस विधा को अपनाया, जिन्हें ओपिनियन पोल सर्वे का जनक माना जाता है। भारत में वर्ष 1960 में ही चुनाव पूर्व सर्वे का खाका खींच दिया गया था। तब ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) द्वारा इसे तैयार किया गया था। भारत में एग्जिट पोल की शुरूआत का श्रेय इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को दिया जाता है, जिन्हें चुनाव के दौरान इस विधा द्वारा जनता के मिजाज को परखने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। चुनाव के दौरान इस प्रकार के सर्वे के माध्यम से जनता के रूख को जानने का काम सबसे पहले एरिक डी कोस्टा ने ही किया था। शुरूआत में देश में सबसे पहले इन्हें पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित किया गया जबकि बड़े पर्दे पर चुनावी सर्वेक्षणों ने 1996 में उस समय दस्तक दी, जब दूरदर्शन ने सीएसडीएस को देशभर में एग्जिट पोल कराने के लिए अनुमति प्रदान की। 1998 में चुनाव पूर्व सर्वे अधिकांश टीवी चौनलों पर प्रसारित किए गए और तब ये बहुत लोकप्रिय हुए थे लेकिन कुछ राजनीतिक दलों द्वारा इन पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग पर 1999 में चुनाव आयोग द्वारा ओपिनियन पोल तथा एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तत्पश्चात् एक अखबार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया।
हमारे देश में दो चीजों का विकास करीब-करीब एक साथ ही हुआ है। पहला इन चुनावी सर्वेक्षणों और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या कहें समाचार चैनलों का। समाचार चैनलों की भारी भीड़ ने चुनावी सर्वेक्षणों को पिछले दो दशक से हर चुनाव के समय का अपरिहार्य बना दिया है। आज बिना इन सर्वेक्षणों के भारत में चुनावों की कल्पना भी नहीं की जाती। बल्कि कुछ समाचार चैनल तो साल में कई बार ऐसे सर्वेक्षण करवाते हैं और इसके जरिये सरकारों की लोकप्रियता और समाज को प्रभावित करने वाले मुद्दों की पड़ताल करते रहते हैं। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर भारत में इन सर्वेक्षणों का अर्थशास्त्र क्या है? आखिर इन सर्वेक्षणों को करवाने से किसका भला होता है।
टीवी चैनल टीआरपी के चक्कर में अपनी लोकप्रियता दांव पर लगा देते है। यदि सर्वे सही जाता है तो बल्ले बल्ले अन्यथा साख पर विपरीत असर देखने को मिलता है। चुनाव के पहले और मतदान के बाद कई एजेंसियां सर्वेक्षण कराती हैं और संभावित जीत- हार के अनुमान पेश करती हैं. कई बार इन सर्वेक्षणों के नतीजे चुनावी नतीजों के करीब बैठते हैं तो कई बार औंधे मुंह गिर जाते हैं। मतदाताओं का मूड भांपने का दावा करने वाले ऐसे सर्वेक्षणों में कई बार लोगों और राजनीतिक दलों की दिलचस्पी दिखाई देती है। कोई दावा नहीं कर सकता कि हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण तरह विश्वसनीय होते हैं ।