एससीआरः योगी सरकार के लिए उम्मीदों का शहर तो विपक्ष के लिए छलावा

     अजय कुमार,लखनऊ  

    लखनऊ।उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तमाम क्षेत्रों में नये-नये प्रयोग कर रही है। मुख्यमंत्री ने प्रदेश के विकास के लिए लम्बा रोड मैप तैयार कर रखा है। योगी सरकार वन ट्रिलियन डॉलर के व्यापार की बात करती है तो प्रदेश में हरित क्रांति और किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्राकृतिक खेती  पर भी जोर दे रही है। सोलर उर्जा,एक्सप्रेस-वे, नये-नये एयरपोर्ट, से लेकर महिला सशक्तिकरण के लिए ‘मिशन शक्ति’ अभियान भी योगी सरकार द्वारा चलाया जा रहा है तो गरीबों के खाने की व्यवस्था  से लेकर उनके रहने के लिए आवास तक सब क्षेत्रों में विकास हो रहा है।लखनऊ में मेट्रो विस्तार के दूसरे चरण में चारबाग से लेकर वसंतकुंज तक के लिए मेट्रो के नए मार्ग पर को शुरू करने पर भी काम चल रहा है।
इस सबके बीच योगी ने अब नेशनल कैपिटल रीजन(एनसीआर)की तर्ज पर स्टेट रीजन क्षेत्र(एससीआर) को विकसित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।इसे योगी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। यह ऐसा प्लान है जिसका विरोध कोई चाह कर भी नहीं कर सकता है।योगी के एससीआर वाले फैसले से आम से लेकर खास तक सब खुश नजर आ रहे हैं। यूपी की राजधानी लखनऊ के आसपास के क्षेत्रों को अब दिल्ली-एनसीआर की तर्ज पर राज्य राजधानी क्षेत्र (एससीआर) के तौर पर विकसित करने की तैयारी है। इसमें लखनऊ के साथ कानपुर, उन्नाव-शुक्लागंज और बाराबंकी को शामिल किया जाएगा। जाहिर है ऐसा हुआ तो इन जिलों में विकास की रफ्तार काफी तेज हो जाएगी और कई नई और बड़ी योजनाओं का विस्तार होगा,इससे भी खास बात यह है कि एससीआर विकसित होने से लखनऊ पर जनसंख्या का दबाव काफी हद तक कम हो जाने की उम्मीद है, लेकिन इसके साथ ही संभावना इस बात की दिखाई दे रही है कि एससीआर की घोषणा होते ही इस क्षेत्र की जमीन के भाव आसमान छूने लगेंगे
 बहरहाल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एससीआर को लेकर हरी झंडी देने के साथ ही अधिकारियों को इस बाबत दिशा निर्देश  दिए हैं कि वह लखनऊ के आस-पास के इलाकों को शामिल करते हुए जल्द से जल्द एक प्रपोजल तैयार करें,लेकिन एससीआर की मंजिल अभी काफी दूरी है।एनसीआर और एससीआर में जो सबसे बड़ा अंतर है वह यह है कि एनसीआर में आने वाले राज्यों के जिलों का विकास वहां की राज्य सरकारें कराती हैं जबकि एससीआर को विकसित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से योगी सरकार पर होगी। एससीआर प्लान में लखनऊ, बाराबंकी, कानपुर और उन्नाव को भी शामिल किया जाना है। माना जा रहा है कि योगी सरकार की इस योजना से इन इलाकों में विकास की रफ्तार तेज हो जाएगी और सराकरी योजना का भी विस्तार होगा. इसी प्लान के तहत कानपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए जमीन खोजने के निर्देश दे दिए हैं। अब संभावना जताई जा रही है कि चकेरी इलाके में इसके लिए जमीन चिन्हित की जा सकती है।योगी की महत्वाकांक्षी योजना एससीआर को अमली जामा पहनाने में उन जिलों के विकास प्राधिकरणों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाएगी जो जिले एससीआर में शामिल किए जायेंगे। इसी वजह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने  एससीआर की घोषणा के बाद सबसे पहले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सभी विकास प्राधिकरणों के साथ समीक्षा बैठक की। इसी दौरान लखनऊ के आस-पास योजनागत विकास के लिए दिल्ली-एनसीआर की तर्ज पर लखनऊ और बाराबंकी को जोड़कर स्टेट कैपिटल रीजन एससीआर बनाने पर भी चर्चा हुई। खैर, एससीआर का सेंट्रल पॉइंट लखनऊ-बाराबंकी बॉर्डर होने की बात सामने निकल कर आ रही है। जानकारी के अनुसार, इसमें मोहनलालगंज से बक्शी का तालाब तक के क्षेत्र शामिल किए जाने की योजना है। मास्टर प्लान के तहत 2031 तक एसीआर के क्षेत्र शामिल किए जाएंगे।प्रपोजल में जमीन से लेकर हर क्षेत्र को लेकर जानकारी शामिल की जाएगी। बात एससीआर से इत्तर जमीन की बढ़ती कीमतों की जाए तो शहर के विकास क्षेत्र में बाराबंकी, बख्शी का तालाब और मोहनलालगंज सीमा के बीच में तेजी से प्लॉटिंग हो रही है। ऐसे में यहा नियोजित विकास करने के लिए कोई संस्था नहीं है। दूसरी तरफ आउटर एरिया में पार्क, मल्टीप्लेक्स, मार्केट, हॉस्पिटल जैसी मूलभूत सुविधाएं न होने से राजधानी में शहरीकरण का दबाव बढ़ता ही जा रहा है। एससीआर बनने के बाद लैंड यूज निर्धारित होने के साथ शासन यहां नक्शा पास करने की जिम्मेदारी भी किसी एक संस्था को सौंप सकेगी। इससे इस क्षेत्र में नियोजित विकास की राह खुल जाएगी।एससीआर में बीकेटी, मोहनलालगंज और बाराबंकी के बीच के इलाके जुड़ेंगे।
योगी सरकार ने स्टेट रीजनल क्षेत्र(एससीआर) विकसित करने की घोषणा की तो इसको लेकर प्रतिक्रिया भी आना शुरू हो गई। पक्ष-विपक्ष के नेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियाएं भी आना शुरू हो गई हैं।समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम का कहना था एससीआर भी अन्य योजनाओं की तरह कागजी साबित होगी। यह सरकार काम कम और ढिंढोरा पीटने पर ज्यादा विश्वास करती है।सरकार के पास बताने के लिए कोई उपलब्धि नहीं है,इसलिए वह जनता को कोई न कोई झुनझुना थमा देती है,लेकिन अब जनता इनके छलावे में आने वाली नहीं है। कांठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोध श्रीवास्तव को भी एससीआर को लेकर कोई रूचि नहीं है। उनका कहना है एससीआर कब बनेगा,इससे जनता को कितना फायदा होगा यह तो कोई नहीं जानता है,हॉ एससीआर के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट जरूर होगी। जमीनों के दाम बढ़ जाएंगे,भू-माफिया एससीआर की खबर आम होते ही जमीन के तोलमोल में लग गए हैं।प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी,मंहगाई से जनता का ध्यान हटाने के लिए योगी सरकार समय-समय पर ऐसे प्रयोग करती रहती है। वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र सक्सेना कहते हैं अभी इस बात कोई टिप्पणी करना जल्दबाजी होगा। अभी एससीआर की पूरी रूपरेखा सामने नहीं आई है। सरकार इसके लिए कैसे पैसे जुटाएगी ? सात जिलों को मिलाकर बनने वाले एससीआर के माध्यम से लखनऊ का जनसंख्या दबाव कितना काम किया जा सकेगा,यह भी एक यक्ष प्रश्न है। स्वतंत्र पत्रकार सुरेन्द्र दुबे कहते हैं यह हिन्दुस्तान के किसी राज्य में यह पहला प्रयोग है। एनसीआर और एससीआर में बुनियादी फर्क यही है कि एनसीआर के विकास की जिम्मेदारी कई राज्यों की सरकारें भी उठाती हैं जबकि एससीआर विकसित करने के लिए योगी सरकार को अपने बल पर अर्थव्यवस्था करनी होगी,अभी कई जन कल्याण की योजनाओं के लिए ही पैसा पूरा नहीं पड़ रहा है,ऐसे में एससीआर के लिए संसाधन कहां से जुटाए जायेंगे,यह बात भी देर-सवेर योगी सरकार को स्पष्ट करनी होगी। विपक्ष की प्रतिक्रियाओं पर बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि विपक्ष निराशावादी दौर से गुजर रहा है। उसे योगी सरकार के हर फैसले में खोट नजर आती है,ऐसा इस लिए है क्योंकि विपक्ष जनता से कट गया है। जनता क्या चाहती है,यह बात विपक्ष न पहले समझ पाया था ना अब समझ पा रहा है। अच्छा होता बीजेपी विरोधी दलों के नेता विकास की योजनाओं पर राजनीति नहीं करते क्योंकि इससे प्रदेश और जनता दोनों का ही नुकसान होता है। भारतीय जनता पार्टी के एक और प्रवक्ता हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं स्टेट कैपिटल रीजन विकसित होने से  लखनऊ का  औद्योगिक विकास और तेज  वहीं लखनऊ पर आबादी का दबाव कम हो होगा।एससीआर से औद्योगिक विकास के लिए नजदीक के जिलों में भी मिल जाएगी। वहीं विकास की गति पर पैनी नजर रखने वाले कुछ लोग कहते हैं कि आमतौर पर बड़े शहर से दूसरे जिलों की सीमाएं  60-70 किलोमीटर बाद शुरू होती है,जबकि लखनऊ में यह सीमाएं 18 किमी बाद ही बाराबंकी-उन्नाव के रूप में शुरू हो जाती है। यहां माइग्रेशन अधिक होने व आवासीय जरूरतें बढ़ने से विकास तेजी से हुआ है।इससे सीमावर्ती इलाकों में अनियोजित विकास हुआ तो उद्योगों के लिए जमीन नहीं मिल पाई। यह समस्या एससीआर बनने से काफी हद तक दूर हो जाएंगी ओर सभी क्षेत्राीं का सुनियोजित विकास होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)