चीन समर्थक जयचंदों को खूली छूट क्यों?

आतंरिक जयचंदों के संहार का यह सही समय

विष्णुगुप्त

हर देश में देशद्रोहियों की उगती फसल पर कानून का डंडा चलता है, देशभक्ति के लिए खतरनाक माना जाता है, पर भारत ऐसा अकेला देश है जहां पर देशद्रोहियों और जयचंदों पर कानून खामोश ही रहता है, राजनीति उदासीनता का चादर ओढी रहती है, इतना ही नहीं बल्कि देशद्रोहियों और जयचंदों की फौज सरेआम-खुलेआम देश हित को लहूलुहान करने से बाज नहीं आते है। देशद्रोहियों की जहरीली फसल किस प्रकार से हमारे देश में उगती है, देशहित को नुकसान करती है, देशहित को अपमानित कराती है, देश को एक खूंखार व संहारक के तौर पर स्थापित करती है, देश की सुरक्षा को खतरे में डालती है,दुश्मन देश के हित को साधती है, दुश्मन देश की उंगलियों पर नाचती है, फिर भी ऐसी जमात शान से रहती है, देश का कानून उस पर हाथ तक नहीं डाल पाता है, राजनीति सिर्फ अपनी गोटियां सेकती रहती है और अततः आरोपों-प्रत्यारोपों में यह प्रसंग दब कर रह जाता है। 

जयचंदों और देशद्रोहियों की राष्टविरोधी करतूतें बहुत ज्यादा है, इनकी फेहरिस्त भी बहुत लंबी है, दुश्मन देश को लाभार्थी बनाने के भी अनेकानेक उदाहरण है। कुछ उदाहरण बहुत ही चिंताजनक है और राष्टकी संप्रभुत्ता को चोट पहुंचाने वाले हैं। उदाहरणों को जानकर आप भी आश्चर्य में पड़ जायेंगे और यह सोचने के लिए विवश होंगे कि ये पार्टियां, क्या ये राजनीतिज्ञ, क्या ये हस्तियां देशहित को बलि चढा कर खुश क्यों होती है, क्या इन्हें देशहित को बलि देने के लिए पाला-पोशा गया, लोकतत्र में बढ़ने का अवसर दिया गया है? खासकर हस्तियां की बात छोड़ भी दे, क्योंकि हस्तियां तो बिकती ही रहती हैं, पर जब राजनीतिक पार्टियां जो देश की सुरक्षा और देश के विकास की बुनियाद पर खड़ी होती है और ऐसी राजनीतिक पार्टियों को जनता इसलिए लोकतांत्रिक पद्धति में शक्ति प्रदान करती है ताकि वदेश की सुरक्षा सुनिश्चित हो और देश दुनिया में चमकते रहे तथा खासकर दुश्मन देशों को सबके सिखाते रहें। पर जनता की यह आशा राजनीतिक पार्टियां लगातार और सरेआम तोड़ती रहती हैं।
उदाहरण शरद यादव के घर का है। नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई भारत दौरे पर आये थे। बाबूलाल भट्टाराई नेपाल की माओवादी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और वे खुद माओवादी रहे हैं, पुष्पकमल दहल प्रचड के बाद दूसरे नंबर के नेता रहे हैं। बाबूराम भट्टाराई के भारत दौरे पर शरद यादव ने अपने दिल्ली स्थित आवास पर एक स्वागत समारोह का आयोजन किया था। उस स्वागत समारोह में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के कई मंत्री, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल बोरा, जर्नादन द्विवेदी, मोहन प्रकाश, तत्कालीन विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी सहित कम्युनिस्ट नेता प्रकाश करांत और अमरजीत कौर भी उपस्थित थे। शरद यादव और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने बाबूराम भट्टाराइ्र के स्वागत में देशहित का पूरा ख्याल रखा और नेपाल के साथ प्राचीन संबंध पर गर्व भी किया। पर जैसे ही प्रकाश करांत को बोलने का अवसर दिया गया वैसे ही प्रकाश करांत ने भारत हित के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। प्रकाश करांत का कहना था कि भारत नेपाल के हित का दमन कर रहा है, भारत का व्यवहार उपनिवेशवादी है, भारत नेपाल को अस्थिर करना चाहता है। प्रकाश करांत के इस वकत्व्य को सुन कर कांग्रेस और भाजपा के नेता ही नहीं बल्कि उपस्थित पत्रकार और अन्य राजनीतिज्ञ भी दंग थे। जब बोलने समय बाबूराम भट्टाराई का आया तो उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कि जिससे भारत की छवि एक उपनिवेशवादी की बनती है, उन्होंने कहा कि भारत मेरा बड़ा भाई है, हम साथ-साथ रहकर आगे बढेंगे। दूसरा उदाहरण अभी के नेपाल के प्रधानमंत्री ओपी शर्मा ओली के साथ का है। उस समय ओपी शर्मा ओली नेताल कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता थे। वे भारत नेपाल मैत्री पर आयोजित एक विचार संगोष्ठी में दिल्ली आये थे। प्रकाश करांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता अमरजीत कौर भी भारत के खिलाफ बोलने और नेपाल को पीड़ित होने का आरोप जड़ दिया। ओपी ओली की मुस्कान उस समय देखने वाली थी। ओपी ओली की समझ यही रही होगी कि जो काम वे नहीं कर सकते थे वह काम तो भारत के नेता ही कर रहे हैं। जब चीन ने 1962 हमले में किये थे तब भी कम्युनिस्ट नेताओं ने चीन को आक्रमणकारी मानने से इनकार कर दिया था। आज तक कम्युनस्टि पार्टियां यह नही मानती हैं कि चीन ने 1962 पर हमला किया था बल्कि भारत को ही हमलावर मानती हैं।
अभी-अभी चीन और नेपाल ने जो पैंतरेबाजी दिखायी है, भारत की सीमा का अतिक्रमण किया है, घोखे से हमारे सैनिकों का नरसंहार किया, हमारी सीमा भूमि पर कब्जा किया है, इस पर भी कम्युनिस्टों ही नहीं बल्कि अनेकानेक देशद्रोहियों की चीन की भाषा में बोलने के उदाहरण सामने आये हैं। एक टीवी चैनल के बहस में बड़े कम्युनिस्ट नेता सुनीत चौपडा ने सीधे तौर पर भारत को ही खलनायक बना दिया और कह दिया कि भारत ही चीन पर ज्यादती कर रहा है, पीड़ित चीन है, भारत पिछलग्गू बन कर अमेरिका का काम कर रहा है। अधिकतर कम्युनिस्ट नेता यह कहते हैं कि भारत अमेरिका के पक्ष में जाकर चीन के खिलाफ साजिश कर रहा है। इनकी भाषा के अनुसार हमें अमेरिका के साथ रिस्ते नहीं रखने चाहिए। क्या हम चीन का गुलाम है? क्या हमारी अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं है? क्या हम अपने हितों का बलिदान देकर चीन का गुलाम बन जायें? 1962 में भी चीन ने इसी तरह की मानसिकता से आक्रमण किया था कि भारत अमेरिका के साथ दोस्ती क्यों बढा रहा है। हमारा जिससे हित सधता है उससे हमारी दोस्ती होगी। हम चीन के डर से कब तक अपनी स्वतंत्र और निडर सुरक्षा की व्यवस्था के साथ समर्पण करते रहेंगे। अगर ये बातें कम्युनिस्ट जमात और अन्य देशद्रोही जमात से पूछेगे तब भी ये चीन की भाषा ही बोलेंगे।
कांग्रेस और राजीव गांयाी फाउडेशन का प्रसंग भी देश की जनता की चिंताओं को बढ़ाया है और यह विचार को मजबूत किया है कि असली दुश्मन और भेदिया तो घर में बैठे हुए हैं। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच समझौते की बात सामने आ चुकी है। समझौतों की शर्ते क्या हैं? समझौतें की शर्ते जगजाहिर होनी चाहिए। कांग्रेस को समझोते की शर्ते को उजागर करनी चाहिए। सबसे बड़ी चिंता की बात राजीव गांधी फाउंडेशन को लेकर है। यह संस्थान अब तो अपनी छवि खो चुकी है, इस संस्थान की देशभक्ति पर आंच आ चुकी है। यह फाउडेशन अपनी वार्षिक रिपोर्ट में चीन से धन लेना खुद स्वीकार किया है। धन की राशि भी बहुत बडी है। कोई एक बार नहीं बल्कि कई बार चीन से धन मिले हैं। राजीव गांधी फाउडेशन को 90 लाख डॉलर का चीनी फंड मिला था। दुश्मन देश अपने हित साधने और अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए पैसा पानी की तरह ही बहाते हैं। जनता को दिग्भ्रिमित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे फैलाते हैं। हथकंडे फैलाने के मोहरे भी इनके वित्तपोषक फांउडेशन और संगठन होते हैं। चीन देश के अंदर में राजीव गांधी फाउडेशन जैसे सैकड़ों संस्थान पोषित कर रखे हैं। ये चीनी पोषक संस्थान इस चीनी करतूत की दौर में भारत हित को ही लहूलुहान और अपमानित करने में लगे हुए हैं।
आज के कुछ साल पहले गुलाम फई का प्रसंग भी देशद्रोहियों को नंगा किया था, बेनकाब किया था। गुलाम फई आईएसआई का एजेंट था पर वह अमेरिकी नागरिक था। अमेरिकी नागरिक होने के कारण वह भारत विरोधी जिहाद का काम आसानी से कर रहा था। वह हर साल अमेरिका में कश्मीर पर सेमिनार आयोजित करता था। सेमिनार आयोजन का मुख्य उदे्देश्य पाकिस्तान के हित को प्रमुखता के साथ उठाना और पाकिस्तान के आतंकवाद पर पर्दा डालना तथा कश्मीर के अंदर भारत को खलनायक के तौर पर प्रस्तुत करना था। सेमिनार में वह हर साल भारत के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और लेखकों को आमंत्रित करता था और इन पर पैसा पानी की तरह बहाता था। भारतीय बुद्धिजीवी, पत्रकार और लेखक भी मौज करते थे, उनके लिए मनोरंजन की सभी संसाधन उपस्थित किये जाते थे। इसके बदले में ये भारतीय बुद्धिजीवी गुलाम फई की उंगलियों पर नाचते थे, उनके गुलाम बन जाते थे। सेमिनार में ये भारतीय बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार पाकिस्तान की भाषा बोलते थे, पाकिस्तान के हित साधने वाले, कश्मीर को आजाद करने वाले तथा भारत को मानवाधिकार का घोर हननकारी बताने वाले जैसे प्रस्ताव पारित करने में मदद करते थे। अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए को जब भनक लगी तब उसने जांच की। जांच आगे जैसे बढी वैसे ही अमेरिकी कानूनो के हनन की बात सामने आयी। गुलाम फई और इनके पेसों पर पलने वाले भारतीय बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार बेनकाब हो गये। गुलाम फई को अमेरिकी कानून तोड़ने के खिलाफ जेल की सजा हुई। भारत में भी गुलाम फई और पाकिस्तान के हित साधने वाले भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों व पत्रकारों पर कार्रवाई करने की मांग उठी थी। पर मनमोहन सिंह सरकार ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था।
कोई भी देश बाहरी आक्रमण या फिर बाहरी दुश्मनों से कम और आतंरिक दुश्मनों, देशद्रोहियों व जयचंदों से ज्यादा पीड़ित होता है, कमजोर होता है, भारत भी जयचंदों के कारण बार-बार तबाह हुआ है। इसलिए भारत को असली खतरा देश के जयचंदों से ही है। इसलिए देश के जयचंदो पर कठोर कार्रवाई की जरूरत है। केन्द्रीय सरकार को विदेशी धन ग्रहण करने के कानून कड़े कर देना चाहिए। खासकर दुश्मन देश से धन लेने पर दंड का विधान होना चाहिए। जिस मद् में धन लिया गया उस मदृ में खर्च हुआ कि नहीं, इस पर भी निगरानी होनी चाहिए। आतंरिक दुश्मनों, देशद्रोहियों-जयचंदों पर संहार करने का यह सही समय है।

 

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.