जूनोटिक रोगोें के भेंट चढ़ जाती है प्रतिवर्ष 33 लाख जिंदगियां

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया चेतावनी इस मायने में गंभीर हो जाती है कि दुनिया के देशों को जूनोटिक रोग तेजी से अपनी गिरफ्त में लेते जा रहे हैं। मंकीपॉक्स इसका ताजातरीन उदाहरण है तो पशुओं में तेजी से फैल रहे लंपी स्किन डीजिज के प्रति नागरिकों को सावधानी बरतने और सतर्क रहने के लिए कहा जा रहा है। भारत सहित दुनिया के देशों में मंकीपॉक्स के हजारों रोगी सामने आ चुके हैं। मंकीपॉक्स की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि दुनिया के 71 देशों में मंकीपॉक्स ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। माने या ना माने पर कोरोना का कारण भी जूनोटिक ही माना जाता रहा है।

कोरोना के कहर से दुनिया के देश आज भी जूझ रहे हैं। नित नए वेरियंट में आकर कोरोना अपना असर दिखा रहा है। कोरोना के कारण आर्थिक क्षेत्र में जो धक्का लगा है उसकी पूर्ति दशकों में होती नहीं लगती। दरअसल जूनोटिक रोग ऐसे रोगाणुओं के कारण होते हैं जो जानवरों और मनुष्यों में फैलता है। वैज्ञानिकों की माने तो दुनियाभर में 150 से अधिक जूनोटिक रोग है जिसमें से मंकीपॉक्स, इबोला, स्वाइन फ्लू, वर्ड फ्लू, सार्स, मर्स, लासा फीवर, लाइम डीजिज, प्लेग आदि एक लंबी लिस्ट हो जाती है जूनोटिक रोगों की। मोटे रुप से जाने तो यह एक तरह का संक्रामक रोग है और पशुओं से इंसान में फैलता है तो जूनोटिक और इंसान से पशु संक्रमित होते हैं तो इसे रिवर्स जूमोटिक माना जाता है। इसकी गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि करीब 33 लाख लोगों की सालाना जान ले लेते है जूनोटिक रोग।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ही माने तो इस एक दशक में दुनिया के देशों में जूनोटिक रोगों से प्रभावित लोगों की संख्या मेें 63 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है। इस तेजी से विस्तार निश्चित रुप से चिंता का विषय हो जाता है। ज्यादातर यह माना जाता है कि जूनोटिक रोगों की गिरफ्त में अधिकांश मामलों में अफ्रीकी देश आते हैं और फिर दुनिया के देशों को अपने गिरफ्त में लेने लगते हैं। मंकीपॉक्स में इस साल सबसे पहले अप्रेल में अफ्रीका में सामने आया और जुलाई आते आते दुनिया के 71 देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। बल्कि यह कहें कि दुनिया के देशों को बीमारी की गंभीरता बता दी। मजे की बात यह है कि जूनोटिक रोग शुरुआती दौर में छोटे बच्चों और उम्रदराज लोगों को अपनी चपेट में लेते हैं और फिर कमजोर इम्यूनिटी वाले आसानी से इन रोगों की चपेट में आ जाते हैं। गर्भवती महिलाओं के भी जूनोटिक रोगों से संक्रमित होने की अधिक संभावना रहती है।
विशेषज्ञों की माने तो जूनोटिक रोग बैक्टिरिया, वायरस, फफूंद व परजीवी आदि से फैलता है। जूनोटिक रोग सक्रामक होने के कारण एक से दूसरे को ग्रसित करने की संभावनाएं अधिक रहती है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित दुनिया के देश संक्रामक रोगों के प्रति अधिक गंभीर हो जाती है। दरअसल पारिस्थितिकी तंत्र और बढ़ती आबादी के साथ ही रहन सहन और खानपान में बदलाव भी जूनोटिक रोगों का एक कारण है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, मांसाहार का बढ़ता चलन, कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नित नए प्रयोग, प्रवासी पक्षियों की आवाजाही, परिवहन क्षेत्र में क्रान्तिकारी सुधार और आवागमन की सहजता से अत्यधिक देशी विदेशी यात्राएं, पशुओें से अत्यधिक संपर्क और कुछ इसी तरह के अन्य कारणों से जूनोटिक रोगों का विस्तार होता जा रहा है। साल दो साल में कोई ना कोई नई जूनोटिक बीमारी सामने आ जाती है। खास यह कि जूनोटिक बीमारियों के कारण अर्थ व्यवस्था पर भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है तो दूसरी और मेडिकल विशेषज्ञ भी पूरी तरह से इन बीमारियों से बचाव में जुट जाते हैं। अभी कोरोना का वैक्सीनेशन खासतौर से बूस्टर डोज चल ही रहा है तो दूसरी और वैज्ञानिक मंकीपॉक्स की वैक्सीन तैयार करने में जुट गए हैं।
यह तो सर्वविदित तथ्य सामने आ ही गया है कि जूनोटिक रोग प्रायः छोटे बच्चें खासतौर से पांच साल तक की उम्र के बच्चों और 60-85 साल के बुजुर्गों को आसानी से अपनी चपेट में ले लेते हैं। फिर कमजोर इम्यूनिटी वाले, दूसरी बीमारियों से ग्रसित रोगी और गर्भवती महिलाएं इनकी चपेट में आसानी से आ जाती है। रहन सहन और खान-पान भी इनके विस्तार में सहायक हो जाता है। एक साल में ही करीब 33 लाख इंसानों की जूनोटिक रोगों के कारण जान जाना इनकी भयावहता को दर्शाता है। ऐसे में सावधानी और सतर्कता यही दो उपाय ले देकर रह जाते हैं। जिस तरह से कोरोना प्रोटोकाल जारी किया गया और लोगों को दो गज की दूरी, मास्क जरुरी या सेनेटाइजर के उपयोग और हाथ नहीें मिलाने का सबक कोरोना ने सिखाया है वेैसा ही कोई प्रोटोकाल पहले ही जारी किया जाना चाहिए ताकि लोग सजग हो सके। क्योंकि अवेयरनेस इन बीमारियों से संघर्ष की पहल शर्त होनी चाहिए और अवेयरनेस से ही सार्थक समाधान खोजा जा सकेगा। इसलिए सावधानी और सजगता के प्रति लोगों को अवेयर करने का अभियान चलाना जरुरी हो जाता है। दरअसल जब बीमारी फैलने लगती है तब अरबों रुपए खर्च हो जाते हैं पर उससे पहले ही यदि सघन अवेयरनेस अभियान चलाया जाता रहे तो इससे शायद अधिक बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। भले ही आज कोरोना प्रोटोकाल पालना को लेक लोग गंभीर नहीं रहे हो पर कोरोना ने दुनियावासियों को जो सबक सिखाया है उसका असर आने वाले कई दशकों तक देखा जाएगा इसलिए अवेयरनेस कार्यक्रम की योजनावद्ध क्रियान्विति अधिक कारगर हो सकेगी।

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