बारां जिले की कण कण में समाहित है पुरातत्व स्थल

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल,कोटा

राजस्थान में यूं तो अनेक पुरातत्व महत्व के स्थल है परन्तु दक्षिणी – पूर्वी पूर्वी राजस्थान में कोटा संभाग का बारां जिला राजस्थान – मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित पुरातत्व स्थलों की दृष्टि से काफी समृद्ध हैं। यहां कृष्ण विलास, अटरू, छीपाबड़ौद, अतां, रामगढ, सीताबाड़ी, शाहबाद, शेरगढ आदि स्थलों पर पुरामहत्व की दृष्टि से तीसरी शताब्दी से लेकर 12 वीं शताब्दी के अवशेष किले, मदिंरो, मस्जिद, छतरियों के रूप मे बडे़ पैमाने पर मिलते हैं। जिले को पुरातत्व का भंडार कहा जाये तो अतिश्योक्ति नही होगी। प्राकृतिक दृष्टि से वन एवं नदि यों की संपदा जिले का श्रृगांर करती हैं। वनों एवं पहाड़ो के मध्य खूबसूरत प्राकृतिक देह एवं खो बने हैं। परवन,पार्वती एवं कालीसिंध प्रमुख नदियां हैं। शेरगढ का दुर्ग जल दुर्ग का बेहतरीन उदाहरण है। माना जाता है कि बारां की स्थापना 14वीं-15वीं शताब्दी में सोलंकी राजपूतों द्वारा की गई । कोटा जिले से पृथक कर 10 अप्रैल 1991 को बांरा नाम से नया जिला बनाया गया। बारां शहर में प्राचीन 17 वीं सदी का जोड़ला जैन मंदिर सहित नगर के पूर्व में स्थित दिगम्बर जैन क्षेत्र नसिया जी स्थित है।श्री कल्याणराय जी का मंदिर, सांवला जी का कलात्मकमंदिर,प्यारेलाल जी का मंदिर,भूतेश्वर ,रघुनाथजी,सत्यनारायण जी मंदिर भी प्रमुख हैं। बांरा कोटा से 72 कि.मी. दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 27 पर स्थित बांरा जिला मुख्यालय है। पश्चिम-मध्य रेल्वे मण्डल की कोटा-बीना रेलवे लाईन पर स्थित बांरा प्रमुख रेलवे स्टेशन है। बारां मेंंआवास और भोजन की अच्छी व्यवस्थाएं हैं।

शाहबाद का किला
बांरा जिला मुख्यालय से करीब 72 कि.मी. दूर स्थित शाहबाद का किला आज खण्डर होकर अपने वैभवशाली अतीत की कहानी सुनाता है। यह दुर्ग राज्य के ही नहीं भारत के सुदृढ दुर्गों में माना जाता है। प्राकृतिक स्थिति रणथम्भौर के दुर्ग के समान है। बताया जाता है कि चौहान राजा मुघुटमणी राज ने 1521 ई. में इसका निर्माण षुरू करवाया था। ऊँचे पर्वत पर बने दुर्ग के दो तरफ “कुण्ड खो” नामक पानी का चश्मा है जो प्राकृतिक खाई का कार्य करता है। तीसरी ओर एक तालाब है। चौथी ओर पहाड़ी मार्ग दुर्ग तक जाता है। खण्डहर होकर भी दुर्ग का परकोटा काफी सुरक्षित स्थित में है। यहां करीब 10 भग्न मंदिर, बारूदखाना, बावड़ी आदि बने हैं। बताते हैं कि किलेकी बुर्जो पर 18 तोंपे रहती थी। ज्ञात होता है जब यहां किला बनाया गया करीब 60 हजार की व्यवस्थित बसावट हो गई थी।शाहबाद का नाम शेरशाह या ओरंगजेब का दिया माना जाता है। मुगल साक्ष्य से पता चलता है कि यहां का राजा मुगलों का मनसबदार था। चौहान शासक इन्द्रमन के समय राजसी भवन “ बादल महल” का निर्माण कराया गया। इसके अवषेश आज भी देखें जा सकते हैं। यह महल भवन निर्माण एवं पाषाण कारीगरी का सुंदर नमूना
है। विशाल द्वार एवं अलंकृत है। दरवाजे के साथ एक ऊँचे चबूतरे पर दोनों ओर बड़ी-बड़ी पाषाण प्रतिमाऐं स्थापित थी। यह एक पंख युक्त हाथी की उड़ती हुंई प्रतिमांए जो अपनी सूंड एवं चारों पैरों में पांच छोटे-छोटे हाथी लेकर उड़ रहे हैं। यह दोनों प्रतिमाऐं आज भी कोटा कलेक्ट्रेट परिसर में जिला कलेक्टर कार्यालय भवन में नीचे लगी हुई है। स्थानीय लोग इस विचित्र प्रतिमाओं को “ अलल पंख” कहते हैं।
जामा मस्जिद
शाहबाद बागर के मध्य स्थित जामा मस्जिद की निर्माण कला देखते ही बनती है। यह राजस्थान की बड़ी मस्जिदों में गिनी जाती है। मस्जिद की 150 फीट ऊँची मीनारें देखते ही बनती हैं। मीनारों के ऊपर आकर्शक छतरियां बनाई गई हैं।शाहबाद में औसती एवं तपसी बावडि़यां, राव उम्मेदसिंह द्वारा निर्मित थानेदार ठाकुर नाथुसिंह की छत्तरी तथा कल्याणराय मंदिर दर्शनीय हैं।
कपिल धारा
नाहरगढ़ ग्राम किशनगंज से कुछ ही दूरी पर स्थित कपिल धारा एक धार्मिक महल का प्राकृतिक स्थल है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला भरता है। भगवान कपिल के तपोबल से गंगा की धारा उत्पन्न होने के कारण इसे कपिल धारा कहा जाता है। यहां पर्वत पर स्थित गौमुख से कपिल धारा गिरती है। शिवकुण्ड में भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित है। इस कुण्ड में पर्वत के झरने का पानी आता है। शिव कुण्ड तक लगभग पचास फीट ऊपर चढना पड़ता है। कुण्ड के समीप ही शिव मंदिर है।
शेरगढ़ का जल दुर्ग
बांरा से करीब 65 किमी दूर अटरू तहसील में परवन नदी पर शेरगढ़ दुर्ग राजस्थान में जल दुर्ग का महत्तपूर्ण उदाहरण हैं। दुर्ग के द्वार, मेहल तोपखानें आदि के अवषेशों के साथ लक्ष्मी मंदिर एवं जैन प्रतिमाऐं देखने को मिलती हैं। शेरगढ़ में बोरखेड़ी दरवाजे की बांयी ओर सीढि़यों नीचे एक ताक में कोशवर्धन नाम से नागवंशी राजा देवदत्त का विक्रम संवत 870 का संस्कृत भाषा का एक लीख उत्कीर्ण है, जिसमें बौद्ध विहार बनाये जाने का जिक्र है। यहां पाये जाने वाले लेखों से पता चलता है कि पूर्व मे किसी ने यहां सोमनाथ महादेव मंदिर बनवाया था। जिसे बाद में मंदिर की सामग्री का उपयोग कर लक्ष्मीनारायण मंदिर बना दिया गया। यहां तीन जैन मंदिर प्रतिमाओं पर 11वीं सदी के लेख उत्कीर्ण है। शेरगढ़ में शेरशाह सूरी द्वारा बनवाई गई दीवार के पत्थर पर भी 11वीं सदी के लेख हैं। यहां पाये गये 1867 वि.सं. के एक लेख से ज्ञात होता है कि पहले षेरगढ़ का नाम बरसाना था। दुर्ग की प्राचीर एवं बुर्जें अभी भी सुरक्षित स्थिति में है। दुर्ग के पुरातत्व विभाग के संरक्षण में संरक्षित स्मारक बनाया गया है। साथ ही शेरगढ़ अभ्यारण दर्शनीय है। यहां मुख्यतः लोमड़ी, चीतल, सांभर, जरख, रीछ एवं बघरा आदि वन्य जीव पाये जाते हैं।
भण्डदेवरा
बारां जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर किशनगंज तहसील में रामगढ़ की पहाडिय़ों की तलहटी में 10 वीं शताब्दी में मलयवर्मन द्वारा निर्मित भण्डदेवरा मंदिर स्थित है। 13वीं शताब्दी में मेढ़वंशीय शासकों द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। किन्नर, देवी-देवता, अप्सराएं, गधर्व, युगल मूर्तियां यहां खूबसूरती से कलात्मक रूप में देखने को मिलती हैं। खजुराहो सदृश्य होने से इस मंदिर को राजस्थान का ’मिनी खजुराहो कहा जाता है। रामगढ़ की पहाड़ी पर किशनई माता का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां तक पहुंचने के लिए झाला जालिम सिंह ने 715 सीढिय़ों का निर्माण कराया था।
विलास (कन्यादेह)
किशनगंज पंचायत समिति की पंचायत विलासगढ़ को प्राचीन समय में “कृष्ण विलास” कहा जाता था। यह स्थल भंवरगढ़ से पहली रामपुरिया गांव से करीब चार किलो मीटर दूरीपर है। यह रास्ता पैदल पार करना होता है। कन्यादेह से विलासगृह तक आसपास करीब तीन किलोमीटर क्षेत्र मे ध्वस्त पुरातत्व महत्तव के प्राचीन मंदिरों की श्रृंखला देखी जाती है। विलास नदी के बांई ओर स्थित है, बिलासगढ। डॉ. मथुरालाल शर्मा के मुताबिक यहां भव्य मदिर 10वीं, 11वीं शताब्दी में नष्ट हुये होगें। उनके कथन एवं अन्य प्रमाणों के आधार पर माना जाता है कि 7वीं-8वीं शताब्दी में विलास नगर वैभवशाली नगर रहा होगा। कन्यादेह के नाम से आज स्थल प्रसिद्ध है। यह एक प्राकृतिक एवं रमणिक स्थल है। यहां के मंदिर हिन्दू और जैन धर्म से सम्बंधित है। मुख्य स्मारक छीपों की चांदनी, चारखंभा मंदिर, जैन मंदिर तथा प्रतिमायें हैं। चार कलात्मक खंबों की भव्यता अत्यंत लुभावनी है। यहां एक छोटा सा स्थल संग्रहालय भी बना दिया गया है। इसमें यहां से प्राप्त मूर्तियों एवं कलात्मक प्रस्तर खण्ड रखे गये हैं। कुछ प्रतिमाओं को कोटा एवं झालावाड़ के संग्रहालयों में तथा असपास के मंदिरों में सुरक्षित कर दिया गया है। यहां के स्मारक केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित कर दिये गये हैं। ज़िले के अटरू एवं काकुनी में भी पुरातत्व महत्व के मंदिर भग्न स्थिति में मिलतें हैं।

सीताबाड़ी
बारां जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर केलवाड़ा के समीप सीताबाड़ी नामक धार्मिक एवं रमणीक स्थल क्षेत्रीय लोगों की आस्था का विशेष केन्द्र है। यहां सीता माता, सूर्य, लक्ष्मण एवं बाल्मिकी के देवालय बने हैं। यहां बने सूर्य मंदिर एवं सूर्य कुण्ड तथा लक्ष्मण मंदिर एवं लक्ष्मण कुण्ड के प्रति श्रृद्धालुओं की विशेष आस्था है, जो इन कुण्डों में स्नान कर दर्शन करते हैं। मान्यता है कि महर्षि बाल्मिकी का यहां आश्रम रहा होगा। यहां सीता ने अपना निवर्सन काल व्यतीत किया। मई-जून में प्रतिवर्ष यहां मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में स्थानीय जनजाति सहरिया विशेष रूप से बड़ी संख्या में भाग लेते हैं, जिस कारण इसे सहरियों का कुम्भ भी कहा जाता है। मेले में सहरिया जनजाति की संस्कृति भी देखने को मिलती है। यहां बने जलकुण्डों में श्रृद्धालु स्नान कर मृतकों की आत्मा की शांति के लिए पिण्डदान करने की रस्म भी निभाते हैं। मेले में मनोरंजन के विविध साधन होते हैं और साथ ही पशु मेला भी आयोजित किया जाता है।
सौरसन संरक्षित क्षेत्र
काले हिरणों एवं चिंकारों को झुण्ड में विचरण करते एवं कुलाचें भरते भागते हुये देखना है तो चले आईये सौरसन संरिक्षत क्षेत्र । यह स्थल कोटा-बांरा मार्ग पर पलायथा से अमलसरा के रास्ते पर स्थित है। यह क्षेत्र गोडावण के लिए भी जाना जाता है। यहां भेडिया, लोमड़ी, सियार, जंगल सुअर, जंगली खरगोष एवं लंगूर भी पाये जाते हैं। समीप बहने वाली परवन नदी में मगरमच्छ तथा मैदानी भाग में सर्प, गोह आदि रेंगने वाले जीव भी देखें जा सकते हैं। यहां करीब 100 से अधिक प्रकार के स्थानीय और अप्रवासी पक्षी पाये जाते है। सारस, जांघिल, तीतर, बतख, बटेर तथा इंडियन कोर्सर स्थानीय पक्षियों सहित है, रियर्स, यूरोपीयन सारस, तिल्लतौर आदि प्रवासी पक्षी देखे जाते हैं। उप न संरक्षक (वन्य जीव ) से अनुमति प्राप्त कर उसे देखा जा सकता है। सोरन में ब्रह्माणी माता का मंदिर के मंदिर का महत्व इस बात से है कि संभवतः पूरे देश में माता का यह पहला ऐसा मंदिर है, जहां देवी की पीठ पूजी जाती है, जिसका श्रृंगार किया जाता है। चारों ओर ऊंचे परकोटे से घिरा यह शैलाश्रय गुफा मंदिर है। यहां प्रतिदिन देवी की पीठ की पूजा-अर्चना की जाती है। विगत 450 वर्षों के अधिक समय से अखण्ड ज्योत प्रज्जवलित है।
अंता
अंता के समीप बड़वा गांव से तीसरी शताब्दी के यूप (यज्ञ स्तंभ) पाये गये हैं, जो अब कोटा राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यह पुरातत्व की अमूल्य निधि है। अंता में गोवर्धन जी एवं अनन्त भगवान के मंदिर हैं। अंता से 4 किलोमीटर दूरी पर काली सिंध नदी के किनारे पर स्थित नागदा का शिव मंदिर है। यहां पर शीवरात्रि पर मेला भरता है। अंता का महत्व सबसे इससे भी है कि यहां बनने वाली कण्ठिंया पूरे भारत वर्ष में जाती है।
काकूनी मन्दिर
बारां और झालावाड़ जिलों की सीमा पर बारां, से काकूनी 85 किमी दूर है। परवन नदी के लिए स्थित पुरातत्व महत्व के प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर में जैन और वैष्णव देवताओं और भगवान शिव को समर्पित मंदिर हैं, और उनमें से कुछ 8 वीं शताब्दी के हैं। कोटा और झालावाड़ के संग्रहालयों में काकूनी मंदिरों से कई मूर्तियों को संरक्षित किया गया है। इसी प्रकार अटरू में गड़गच का मन्दिर सहित कई पुरातत्व महत्व के स्थल हैं।
नाहरगढ़ किला
नाहारगढ़ का किला काफी प्रभावशाली स्थल है।लाल पत्थर से निर्मित किला एक शानदार संरचना है, यह मुगल वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना भी है। यहां की खूबसूरती पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
संग्रहालय
बारां में सभी पुरातत्व स्थलों से करीब 48 मूर्तियों को बारां का राजकीय संग्रहालय में संरक्षित कर प्रदर्शित किया गया है। मूर्तियों, स्थलों के छाया चित्र, पेंटिंग्स और लोक संस्कृति की झांकियों सहित विविध सामग्री के साथ संग्रहालय दर्शनीय है।

(लेखक राज्य सरकार से राज्य स्तरीय अधिस्विकृत पत्रकार हैं)

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