पड़ोसियों की मदद के चक्कर में भारत खुद दिवालिया होगा !

विष्णुगुप्त

पड़ोसी देश और राजनीतिक अराजकता तथा भीषण आर्थिक संकट को झेल रहे श्रीलंका को भारत की मदद की कसौटी पर दो पहलुओं पर विचार करना जरूर जरूरी है। एक पहलू प्रशंसा का है तो दूसरा पहलू विरोध का है। प्रशंसा वाला पहला पहलू भारत की आर्थिक और मानवीय सहायता का है। भारत ने श्रीलंका को आर्थिक मदद के तौर पर कोई एक-दो करोड़ नहीं बल्कि पूरे दो सौ करोड़ रूपये दिये हैं। अब बात मानवीय सहायता की करें। मानवीय सहायता के रूप में भारत ने श्रीलंका को 9000 हजार टन मैंटिरक चावल, 50 हजार टन मैटिरक टन दूघ पाउडर, 25 मैटिरक टन से अधिक दवाइयां और इलाज की सामग्रियां दी हैं। श्रीलंका के राष्टपति रानिल विक्रमसिंघे ने भारत की इस मदद के लिए धन्यवाद दिया है और कहा है कि भारत ने बड़े भाई की तरह मदद की है। आश्चर्यजनक तौर पर चीन भी भारत की प्रशंसा की है। चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने अपने एक बयान में कहा है कि आर्थिक संकट, अराजकता और राजनीतिक टकराव से जुझ रहे श्रीलंका को भारत ने तत्काल मदद कर अच्छा काम किया है और हम इसका समर्थन करते हैं। झाओ लिजियन ने आगे यह भी कहा कि हम भारत के साथ मिलकर श्रीलंका की आर्थिक स्थिति और राजनीतिक संकट को लेकर काम करने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा दुनिया के अन्य देशों ने भी भारत की मदद को लेकर प्रशंसा की है। खासकर अमेरिका और यूरोप के कूटनीतिज्ञों ने भी कहा कि भारत के प्रयाशों से श्रीलंका का आर्थिक संकट दूर हो सकता है और राजनीतिक अस्थिरता भी दूर हो सकती है। एक और प्रश्न यह भी है कि क्या भारत अपने हिंसक, अराजक, असफल देश के दर्जा प्राप्त पड़ोसियों की आर्थिक मदद करने के चक्कर में खुद भी दिवालिया हो सकता है? भारत में भी महंगाई और आर्थिक असामनता बहुत ही चिंताजनक स्थिति में खड़ी है।

दूसरा पहलू भारत की मदद को लेकर विरोध का है। श्रीलंका के कम्युनिस्ट विचार के राजनीतिज्ञों ने भारत सरकार और भारत की कपंनियों पर श्रीलंका को मदद देने के नाम पर श्रीलंका के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने का आरोप लगाया है। श्रीलंका में कम्युनिस्ट विचार धारा के लोग कोई खास राय नहीं बना पाते हैं और न ही कम्युनिस्ट विचार धारा का वैसा वजूद है जैसा वजूद वैचारिक नीति को जनांकाक्षी बनाने का होना चाहिए। कहने का अर्थ है कि कम्युनिस्ट विचार धारा के लोग जन शक्ति हीन और हाशिये पर नियमित रहने वाले हैं। फिर भी कम्युनिस्ट विचार धारा के लोग अफवाह उड़ाने और हिंसा फैलाने में बहुत आगे रहते हैं। जनभावनाऐ भड़का कर अस्थिरता उत्पन्न करना उनकी हिंसक मानसिकता का ही परिचय देती है। कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग जन लोकतंत्र के विरोधी और मुस्लिम परस्त भी होते हैं। इसलिए श्रीलंका ही नहीं बल्कि नेपाल और भूटान अन्य देशो के कम्युनिस्ट विचार धाराएं भारत के जन्मजात दुश्मन होती हैं। श्रीलंका के कम्युनिस्ट विचारधाराएं भारत का विरोध तो करती हैं पर चीन का कभी विरोध नहीं करती हैं और इस तथ्य को भी छिपा लेती हैं कि श्रीलंका की वर्तमान दुर्गति के लिए चीन की करतूत रही है।

इस प्रश्न की खोज जरूर होनी चाहिए कि श्रीलंका कैसे दिवालियापन का शिकार हुआ, आर्थिक विध्वंस के पीछे किन-किन नकरात्मक पहलुओं की भूमिका है? इस प्रश्न पर दुनिया की सबसे बड़ी गुप्तरच एजेसी सीआईए के विचार काफी महत्वपूर्ण हैं। सीआईए प्रमुख बिल बंर्स ने कहा कि श्रीलंका ने चीन के उपर बेवकूफाना दांव लगाये, इसी कारण श्रीलंका की अर्थव्यवस्था विध्वंस हुई। चीनी निवेश ने श्रीलंका को डूबोया है। चीनी निवेशकों का प्रस्ताव प्रारंभ में बहुत ही अच्छा लगता है पर बाद उसके दुष्परिणाम बहुत ही भयानक होता है और राष्टीय अस्मिता को चोट पहुंचाने वाला होते है। चीन से श्रीलंका ने भारी कर्ज लिया था। 2017 में श्रीलंका ने अपने एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के निर्माण में लिये कर्ज चुका नहीं पाया। उस बंदरगाह को चीनी कंपनी ने 99 साल के लीज पर खरीद लिया। राजपक्षे एयरपोर्ट बनाने के लिए 20 करोड़ डालर की भारी राशि चीन से लिया गया था। राजपक्षे एयरपोर्ट की इतनी कमाई नहीं होती कि वह अपने बिजली बिल का भुगतान कर सके। आज श्रीलंका के उपर सात अरब डॉलर का अंतर्राष्टीय कर्ज है, जिसका व्याज तक चुकाने में श्रीलंका असमर्थ है।

वास्तव में तमिल टाइगरों के खिलाफ मिली जीत ने श्रीलंका के शासकों को पागल कर दिया था। तमिल टाइगरों के खिलाफ जीत में चीन ने बड़ी भूमिका निभायी थी। चीनी सैनिक और चीनी हथियार की भी बड़ी भूमिका थी। इसकी कीमत भी चीन ने खूब वसूली। श्रीलंका के शासक एक तरह से चीन के गुलाम हो गये थे। चीन की कपंनिया सड़क, बिजली, पानी और बंदरगाह आदि के निर्माण के नाम पर पूरे श्रीलंका में फैल गयी थी। उस दौर में श्रीलंका के शासकों ने भारत विरोध का झंडा भी खूब लहराया था। भारत को आंख दिखाने की भरपूर कोशिश हुई थी।
चीन की कृदृष्टि सिर्फ श्रीलंका को नहीं डूबोयी है बल्कि चीन पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों को भी अपने कुदृष्टि का शिकार बना रहा है। नेपाल में आये नये नेतृत्व ने थोडी समझदारी दिखायी और अंध भारत विरोध की नीति पर नहीं चला। लेकिन पाकिस्तान में चीन की भूमिका और हस्तक्षेप कौन नहीं चाहता है। पाकिस्तान की आर्थिक गर्दन चीन अपने हाथ में जकड़ कर रखा है। पाकिस्तान में चीन आर्थिक गलियारा बना रहा है। इस आर्थिक गलियारे पर चीन खरबो रूपये का कर्ज भी पाकिस्तान के सिर पर डाल कर रखा है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति ऐसी बन चुकी है कि चीनी कर्ज का व्याज तक नहीं चुका पा रहा है। चीनी कर्ज के व्याज चुकाने के लिए पाकिस्तान को चीन से नया-नया कर्ज लेना पड़ रहा है। चीनी कर्ज में डूबे पाकिस्तान कभी दिवालिया हो सकता है। इसके अलावा कई अफ्रीकी देश भी चीन के कर्ज के कारण लगभग दिवालिया हो चुके हैं।
भारत की सबसे बड़ी समस्या हिंसक, गैर जिम्मेदार और असफल देशों से घिरे होने की है। चीन एक हिंसक और उपनिवेशिक मानसिकता वाला देश है। चीन अपने गरीब पड़ोसियों को गुलाम बना कर रखने की मानसिकता से सक्रिय रहता है। पाकिस्तान एक हिंसक देश होने के साथ ही साथ एक असफल देश भी है। नेपाल भी चीन का मोहरा बना रहता है। बांग्लादेश और मालदीव भी चीन के प्रभाव में है। नेपाल में जब-जब संकट आया है तब-तब भारत ने अपनी तिजोरी खोली है। मालदीव भी भारत की आर्थिक सहायता पर निर्भर रहता है। श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और बांग्लादेश तो संकट के समय तो भारत की याद करते हैं और भारत की आर्थिक सहायता पर अपना संकट दूर करते हैं पर संकट दूर होने के साथ ही साथ भारत को आंख दिखाना भी शुरू कर देते हैं।
श्रीलंका ने भारतीय शांति सैनिकों के साथ किस तरह की गद्दारी की थी और उसका दुष्परिणाम भारत की शांति सैनिकों को किस प्रकार से झेलना पड़ा था, यह भी स्पष्ट है। अफगानिस्तान में भारत ने अतुलनीय आर्थिक सहायता की थी। अफगानिस्तान के विकास के लिए भारत ने पैसा पानी की तरह बहाया था। अफगानिस्तान का हस्र क्या हुआ? श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव जैसे पड़ोसियों की आर्थिक मदद में हमें अपनी तिजोरी क्यों खाली करनी चाहिए? ये सभी देश स्वयं अपने पैरों पर खड़े रहें और अपना संकट खूद दूर करें। दूसरे की मदद के चक्कर खूद दिवालिया होने के रास्ते पर क्यों चलना चाहिए। हमें तो अपने नागरिकों की चिंता करनी चाहिए। अगर हम अपने नागरिको के विकास व उन्नति के लिए निर्धारित धन राशि दूसरे देशों पर खर्च करते हैं तो फिर यह सरासर अन्याय है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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