शेख हसीना भी रोहिंग्याओं को खतरे की घंटी मानी

विष्णुगुप्त

रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों पर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के विचार काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं और रोहिंग्या शरणार्थियों की मदद मे लगे दुनिया के नियामकों व संस्थानों की उलझनें तथा कठिनाइयां बढ़ने वाली हैं। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि शेख हसीना के रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर विचार क्या हैं? शेख हसीना रोहिंग्या मुसलमानों को भस्मासुर मानती है, इतना ही नहीं बल्कि रोहिंग्या मुसलमानों को डग्स अपराधी मानती हैं, रोहिंग्या मुसलमानों को महिलाओं की तस्करी में शामिल होने का आरोपी मानती हैं, रोहिंग्या मुसलमान उनके देश की आर्थिक अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं, रोहिंग्या मुसलमानों के संबंध भी आतंकवादी संगठनों से है, इन सभी कारणों से बांग्लादेश की संप्रभुत्ता और एकता-अखंडता खतरे में है।

शेख हसीना की विशेषता यह है कि वे मजहबी तौर पर न तो उफान पैदा करती है और न ही मजहबी मानसिकता का पोषण करती है। कभी बांग्लादेश आतंकवाद और कट्टर मानसिकता के शिकंजेे में कैद हो गया था। पर जैसे ही शेख हसीना के हाथ में बांग्लादेश की सत्ता आयी वैसे ही उन्होंने मजहबी कट्टर मानसिकता पर प्रहार किया और कट्टरता के बड़े-बड़े मीनारों को भी ध्वस्त कर दिया। शेख हसीना के विचारों का अर्थ यही है कि रोहिंग्या मुसलमानों के कट्टर और विखंडनकारी मानसिकताओं का खामियाजा बांग्लादेश भुगत सकता है, बांग्लादेश में भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान तथा सीरिया जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। दुनिया के नियामकों और संस्थाओं को रोहिंग्या मुसलमानों के संबंध में अपनी सोच फिर से दुरूस्त करनी ही होगी, रोहिंग्याओं की अपराधी और कट्टर मानसिकताओं को नजरअंदाज कर आर्थिक और कूटनीतिक सहायता जारी रखने पर विचार करना ही होगा। अगर दुनिया के नियामक और अन्य संस्थानों ने ऐसा नहीं किया तो फिर एक न एक दिन तालिबान की तरह रोहिंग्या मुसलमान भी उनके लिए भस्मासुर साबित होगे।बांग्लादेश में कोई एक-दो लाख नहीं बल्कि 12 लाख रोहिंग्या शरणार्थी हैं। इतनी बड़ी संख्या को शरणार्थी के तौर पर रखना और उन्हें नियंत्रित करना कोई आसान काम नहीं है। बांग्लादेश की प्रशंसा इस बात की होनी चाहिए कि उसने 12 लाख रोहिंग्याओं को न केवल अपने यहां शरण दिया बल्कि उनके लिए न्यूनतम सुविधाएं भी उपलब्ध करायी। सबसे पहले जानना यह जरूरी है कि इनती बड़ी संख्या वाला शरणार्थी समूह बांग्लादेश के लिए कोई ऐसेट नहीं बल्कि बोझ और कई समस्याओं की जड़ भी हैं। बांग्लादेश कोई बड़ा देश नहीं है, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था कोई चीन, भारत, जापान आदि की अर्थव्यवस्था जैसी मजबूत भी नहीं है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था बहुत ही कमजोर है। बांग्लादेश खुद अपने नागरिकों के लिए आर्थिक और विकास की सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाता है। बांग्लादेश का दुर्भाग्य यह है कि उसे अपने नागरिकों की सुविधाओं और विकास की राशि की कटौती कर वैसे चरमपंथी-कट्टरपंथी समूहों पर खर्च करना पड़ रहा है जो उनके देश के नागरिक नहीं है। आप अंदाज लगा सकते हैं कि रोहिंग्याओं को न्यूनतम सुविधा देने में भी बांग्लादेश को कितनी समस्या उत्पन्न होती होगी।
सबसे बड़ी बात इतनी बड़ी संख्या वाले शरणार्थी समूह को रोजगार उपलब्ध कराने की है। दुनिया के बड़े-बडे देश भी अपने नागरिकों को भी बेहतर रोजगार देने में असमर्थ है। दुनिया के बड़े-बड़े देशों में बेरोजगारी पसरी हुई है। इसी तरह बांग्लादेश में भी बेरोजगारी पसरी हुई है। युवाओं के सामने रोजगार की समस्या है। ऐसी स्थिति में शरणार्थी समूह को रोजगार कहां से मिलेगा? रोहिंग्याओं को रोजगार नहीं मिल रहे हैं। म्यांमार से ये सिर्फ अपनी शरीर लेकर आये थे, अपनी पूरी संपत्ति म्यांमार में ही छोड़ कर आये थे। जब इन्हें रोजगार नहीं मिलेगा तब ये अपनी भूख कैसे मिटा सकते हैं? जाहिरतौर पर रोहिंग्याओं के बीच भूख और बेकारी की समस्या बहुत ही जटिल है, भयंकर है तथा खतरनाक भी है। भूख आग होती है। भूखा व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। भूखा व्यक्ति चोरी भी कर सकता है, डकैती भी कर सकता है, हिंसा भी कर सकता है, भयंकर शराब का धंधा भी कर सकता है, महिला तस्करी का अमानवीय कार्य भी कर सकता है। इन सभी का उदाहरण शेख हसीना के बयानों में मिल भी रहा है। पर ऐसी स्थिति के लिए रोहिंग्या मुसलमान खुद जिम्मेदार हैं जो अपने घरों में जिहादियों और आतंकवादियों का पालन-पोषण कर म्यांमार की संप्रभुत्ता को लहूलुहान करने जैसी करतूत की थी।
जिहादी मानसिकता ही वह कारण था जिसमें रोहिंग्याओं को म्यांमार छोड़ना पड़ा था। गैर मुस्लिम देश को मुस्लिम कभी भी अपना देश मानने के लिए तैयार नहीं होते हैं। वे जिस देश में रहते हैं उस देश में मुसलमानों की मांग शरियत लागू करने की होती है, शरियत का अर्थ है इस्लाम आधारित राज व्यवस्था। म्यांमार में भी रेाहिंग्या मुसलमान अपने लिए अलग देश मांग रहे थे। अलग देश मांगने के लिए हिंसा के रास्ते पर थे। इनकी जिन क्षेत्रों में आबादी थी उन क्षेत्रों में इनकी आतंकवादी-जिहादी हिंसा अमानवीय थी, खतरनाक थी और विखंडनकारी थी। बहुसंख्यक बौद्ध आबादी को ही इनकी जिहादी मानसिकता विध्वंस करना चाहती थी। बौद्धों और हिन्दुओं पर रोहिंग्याओं की हिंसा बहुत खतरनाक होती थी।रोहिंग्याओं के संबंध तालिबानी, अलकायदा और आईएसआई से थे। इनकी खतरनाक मंशा और जिहाद रोहिंग्या देश बनाने की थी। जबकि रोहिंग्या म्यांमार के मूल आबादी भी नहीं है। इन्हें अंग्रेज म्यांमार लेकर गये। रोहिंग्या मुसलमानों ने अंग्रेजों के कहने पर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की सेना के खिलाफ युद्ध लड़ा था। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों का कत्लेआम करने का आरोप रोंहिंग्या मुसलमानों पर लगा था।
क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है। विराथु नाम का एक युवा बौद्ध भिक्षु ने रोहिंग्याओं के खिलाफ अभियानी पथ बनाया था। देखते-देखते विराथु का अभियानी पथ पूरे म्यांमार को आंदोलित कर दिया था। इसका परिणाम यह निकला कि म्यांमार की पूरी बौद्ध आबादी रोहिंग्याओं के खिलाफ खड़ी हो गयी। सेना और पुलिस भी रोहिंग्याओं की हिंसक हमलों से नाराज व परेशान थी। जब प्रतिक्रिया भयानक हुई तब रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार छोड़ कर भागना पड़ा था। भारत में भी लाखों रोहिंग्याओं ने अवैध रूप घुसपैठ करने का काम किया है। बांग्लादेश की तरह भारत में अवैध रूप से रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान कानून-व्यवस्था की स्थिति खतरनाक बनाने का काम किया है, हत्या, लूट, दंगा और तस्करी जैसे अपराधों में भी इनकी संलिप्तता खतरनाक है।
रोहिंग्याओं के लिए अंतराष्टीय मदद भी कम हुई है। कनाडा की राजदूत लिली निकोलस ने इस पर चिंता जताई है कि रोहिंग्याओं की मदद में कमी आयी है। उसने दुनिया के देशों से रोहिग्याओं के कल्याण के लिए ज्यादा से ज्यादा धन जुटाने का आग्रह किया है। इस प्रश्न पर भी बांग्लादेश सहमत नहीं है। बांग्लादेश की इच्छा है कि रोहिंग्याओं की घर वापसी होनी चाहिए। म्यांमार में सैनिक शासन लागू होने के बाद रोहिंग्याओं की घर वापसी एक तरह मुश्किल ही हो गयी है।
रोहिंग्याओं के अपराध ही सबसे बड़ी समस्या नहीं है। अधिक बच्चे पैदा करना भी खतरनाक समस्या है। बांग्लादेश की शरणार्थी शिविरोें में जन्म दर बहुत ही खतरनाक है। जन्म दर बढ़ने से रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या भी खतरनाक ढंग से बढ़ रही है। मुसलमानों केे बीच अधिक बच्चे पैदा करने और आबादी की हिंसक कसौटी पर गैर इस्लामिक सभी धर्मों का विध्वंस करने का जिहाद चलता ही रहता है। इसलिए रोहिंग्या मुसलमानों को कुकुरमुत्ते की तरह बच्चे पैदा करने से रोकना मुश्किल है।
रोहिंग्याओं पर शेख हसीना का विचार भारत के लिए भी एक अप्रत्यक्ष संदेश है। भारत में भी लाखों रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठिये की तरह रह रहे हैं। भारत को भी रोहिंग्या मुसलमानों को नियंत्रित करने के लिए बहुत बडी कार्रवाई करने की जरूरत है। रोहिंग्या के समर्थक राजनीतिक पार्टियों और अन्य समर्थकों के लिए भी शेख हसीना का विचार एक आईना है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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