राष्ट्रपति चुनाव : एनडीए की बल्ले बल्ले

विपक्ष की केमिस्ट्री ख़राब

बाल मुकुन्द ओझा

देश के नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जहां भाजपा नीत एनडीए बेहतर स्थिति में है वहां विपक्ष एकजुटता के अभाव में महज खानापूर्ति की कवायद में जुटा है। विपक्ष के पास उम्मीदवारों का टोटा है। वह जिस पर हाथ रखता है वही हार के डर से मना कर देता है। विपक्ष को एकजुट करने का मिशन ममता फेल हो चुका है। अब यह जिम्मेदारी मराठा दिग्गज शरद पवार ने संभाली है। ममता की 15 जून की बैठक निष्फल होने के बाद शरद पवार ने 21 जून को विपक्षी पार्टियों की बैठक फिर बुलाई है। देश के सबसे सर्वोच्च पद यानी राष्ट्रपति के लिए 18 जुलाई को चुनाव होना है। नामांकन प्रक्रिया 15 जून से शुरू हो चुकी है और 29 जून नामांकन पत्र जमा करने की आखिरी तारीख है। नामांकन पत्रों की जांच 30 जून को की जाएगी। एनसीपी सुप्रीमों शरद पवार और नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया फारूक अब्दुल्ला के बाद अब गोपाल कृष्ण गाँधी ने भी उम्मीदवार बनने से इंकार कर दिया है। ममता बनर्जी ने मुलायम सिंह यादव के नाम का भी सुझाव दिया है। बहरहाल विपक्ष के पास राष्ट्रपति के लिए कोई दमदार व्यक्ति नज़र नहीं आ रहा जो एनडीए का मुकाबला कर सके।
दूसरी तरफ एनडीए ने अभी अपने किसी उम्मीदवार का खुलासा नहीं किया है। एनडीए की तरफ से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कई विपक्षी नेताओं से संपर्क कर उनका मन टटोलने की औपचारिकता भर पूरी की है। यह सर्व विदित है की भाजपा में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जो करेंगे वही फ़ाइनल होगा। एनडीए खेमे में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, थावरचंद गहलोत, आरिफ मोहम्मद खान से लेकर अनुसुइया उइके, जुआल ओराम, सुमित्रा महाजन, तमिलसाई सुंदरराजन द्रौपदी मुर्मू सहित कई नाम चर्चा में है मगर मोदी के मन में क्या चल रहा है अभी तक कोई भी जान नहीं पाया है। मीडिया रिपोर्टस् के मुताबिक भाजपा और संघ ने नए राष्ट्रपति के लिए गहन मंथन शुरू कर दिया है। माना जा रहा है इस कवायद में अंतिम फैसला मोदी का होगा। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मन की थाह लगाना मुश्किल है। पिछली बार की तरह वे चौंका भी सकते है। संघ बहुत सोच समझ कर इस बार अपने पासे फेंक सकता है। मोदी और संघ की साझा रणनीति काम करेगी, यह सर्वविदित है। नवीन पटनायक को भी इस बारे में बता दिया गया है। उनकी सहमति के बाद अब मोदी अपनी पार्टी के उम्मीदवार की जीत के प्रति बेहद आश्वस्त है। एनडीए के पास जीत के लिए आवश्यकता बहुमत से 20 हजार से कम वोट है जिसका जुगाड़ ओडिशा के सीएम पटनायक और आंध्र के सीएम जगन मोहन रेड्डी की पार्टियों के मतों से किया जा चुका है। भाजपा और उसके सहयोगियों के पास 48 प्रतिशत वोट (10.86 लाख वोटों में 5.26 लाख) हैं और उन्हें बीजद (जिसके पास 31,000 से अधिक वोट हैं), वाईएसआरसीपी (43,000 से अधिक वोट होने का अनुमान है) जैसी पार्टियों की आवश्यकता होगी। इन दलों ने स्पष्ट रूप से पहले से ही भाजपा समर्थित उम्मीदवार के लिए अपना वोट देने का वादा किया है। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि हमारे उम्मीदवार के चुनाव हारने का कोई सवाल ही नहीं है। भाजपा ने 2017 में अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के लिए 7,02,044 वोट हासिल किए। लेकिन वर्तमान में एनडीए के पास कुल 5.26 लाख हैं। इन दोनों नेताओं की हरी झंडी के बाद मोदी को फ्री हैंड मिल गया है और वे जल्द ही अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे।
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रणाली के एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होता है। राष्ट्रपति को भारत की संसद के दोनों सदनों लोकसभा एवं राज्य सभा के साथ राज्य विधायिकाओं के निर्वाचित सदस्य पांच वर्ष के लिए निर्वाचित करते हैं। वोट आवंटित करने के लिए एक विधिमान्य फार्मूला तय किया गया है। ताकि हर राज्य की जन संख्या और उस राज्य से विधान सभा के सदस्यों द्वारा मत डालने की संख्या के मध्य एक अनुपात रहे और राज्य विधान सभाओं के सदस्यों और सांसदों के बीच एक समानुपात की स्थिति बनी रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत नहीं मिले तो एक स्थापित पद्धति है जिससे हारने वाले उम्मदवारों को प्रतियोगिता से हटाकर उसके मत अन्य उम्मीदवारों हस्तान्तरित किये जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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