भाजपा में रार और गहलोत सरकार में घमासान

बाल मुकुन्द ओझा

जैसे जैसे विधानसभा चुनावों की तिथि नज़दीक आती जा रही है वैसे वैसे राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस में घमासान थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। हालाँकि विधान सभा चुनावों में अभी डेढ साल शेष है मगर हायतौबा अभी से मच गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हाल ही उदयपुर में आयोजित चिंतन शिविर में नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुटता और अनुशासन का जो सन्देश दिया था लगता है वह एक सप्ताह में ही फुर्र हो गया है। कमोवेश यही स्थिति भाजपा की है। उसके नेता भी तीन तेरह हो रहे है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्ढा भी अपनी पार्टी की एकजुटता प्रदर्शित करने जयपुर आये थे।

इस समय कांग्रेस में रार ज्यादा हो रही है। राज्य सभा चुनावों के मधे नज़र मंत्रियों और विधायकों की नाराज़गी के बागी तेवर दिखने लगे है। एक मंत्री अशोक चांदना ने अफसरशाही पर आरोप जड़ते हुए सरेआम पदमुक्ति की प्रार्थना की है तो एक विधायक राजेंद्र विधूड़ी ने कहा है रीट परीक्षा की सीबीआई जाँच हो गई तो गहलोत सरकार के एक मंत्री को जेल जाना पड़ सकता है। वहीँ एक वरिष्ठ कांग्रेसी विधायक भरत सिंह ने मुख्य मंत्री को पत्र लिखकर उनके एक काबीना मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के साथ सबूत भेजे है। गहलोत के एक विश्वस्त मंत्री महेश जोशी के बेटे पर रेप केस में गिरफ़्तारी की तलवार लटकी हुई है। सचिन पायलेट की नाराजगी भी अभी ज्यों की त्यों कायम है। इसी के साथ कांग्रेस में एक दूसरे पर तंज कसने का सिलसिला शुरू हो गया है। कांग्रेस सरकार में मचा घमासान चर्चा का विषय बना हुआ है।

कोई लाख कहे मगर यह सच है की कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों में आपसी घमासान लाख चेष्टा के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। राजस्थान में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए भाजपा जी तोड़ कोशिश में लगी है वहीं लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रदेश में अमलीजामा पहनाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार फिर सत्ता हासिल करने के प्रयासों में जुटे हैं। मगर दोनों ही पार्टियों में आपसी गुटबंदी उनके प्रयासों को पलीता लगाने में पीछे नहीं है। भाजपा आलाकमान ने अपने प्रदेश स्तर के नेताओं को एकता के मंत्र दिए मगर इन मंत्रों का नेताओं पर कोई प्रभाव फ़िलहाल तो परिलक्षित नहीं हो रहा है। जेपी नड्ढा ने साफतौर पर कहा है अनुशासन तोड़ने वालों को बक्शा नहीं जायेगा। भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया, विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया और उप नेता राजेंद्र राठौड़ एक धड़े का नेतृत्व कर रहे है तो पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपनी अलग डफली बज़ा रही है।

वसुंधरा विरोधी खेमे को केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का भी समर्थन प्राप्त है। इन नेताओं का संगठन पर कब्जा है। वसुंधरा समर्थक विधायक और पूर्व मंत्री अपनी नेता को सीएम फेस बनाकर अगला चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे है तो दूसरा खेमा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के फेस पर चुनाव लड़ने की बात पर अड़ा हुआ है। भाजपा आलाकमान भी बिना सीएम फेस के एक होकर चुनाव लड़ने की वकालत कर रहा है। इसी बात को लेकर भाजपा बंटी हुई है। दोनों खेमे एक दूसरे पर वार करने से नहीं चूक रहे है। मोदी और अमित शाह किसी भी स्थिति में वसुंधरा के पक्ष में नहीं है। विपक्षी खेमे में आधा दर्ज़न सीएम के दावेदार है। भाजपा सांसद किरोड़ी मीणा अपने लड़ाकू अंदाज़ के लिए जाने जाते है। वे विभिन्न जन समस्याओं को लेकर निरंतर संघर्षशील है। वे भी सीएम के दावेदार है मगर कटारिया की तरह 70 की आयु पार है। पूनिया पहली बार के विधायक है। अब बचे सात बार के विधायक राजेंद्र राठौड़ जो प्रदेशभर में भ्रमण कर गहलोत सरकार के विरुद्ध आंदोलन की अलख जगाये हुए है।
कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों के आलाकमान के असंतुष्टों की गतिविधियां थामने पर असफल सिद्ध हुए है। भाजपा में वसुंधरा राजे पहले ही अलग थलग पड़ी है। भाजपा आलाकमान राजे को राज्य की सियासत से दूर रखना चाहता है मगर राजे खेमा अपनी नेता को प्रदेश में ही देखना चाहता है। यही स्थिति कांग्रेस में है। गहलोत खेमा पायलट को राज्य की राजनीति से बेदखल करना चाहता है जो पायलट और उनके समर्थकों को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं है। इस प्रकार देखा जाये तो दोनों ही सियासी पार्टियों में सिर फुटौअल जोरों से है और कोई भी हार मानने या तनिक भी झुकने को तैयार नहीं दिखता।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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