इस्तीफों की झड़ी लगाकर पार्टी का क़र्ज़ उतार रहे हैं नेता

बाल मुकुन्द ओझा

दशकों तक पूरे देश पर राज करने वाली, आज़ादी के गर्भ से निकली कांग्रेस पार्टी आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इस पार्टी के नेता इस्तीफों की झड़ी लगाकर बकौल सोनिया गाँधी पार्टी का क़र्ज़ उतारते जा रहे है। कांग्रेस के चिंतन शिविर और भारत जोड़ों के नारे के बाद ताबड़तोड़ इस्तीफों ने एक बार फिर पार्टी के भविष्य को लेकर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। पार्टी के युवराज को देश की चिंता खाये जा रही है मगर खंड खंड होती जा रही पार्टी इन्हें नज़र नहीं आ रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज कानूनी सलाहकार कपिल सिब्बल ने कांग्रेस के चिंतन की धज्जियां उड़ाते हुए एक बार फिर अपनी पार्टी को आइना दिखा दिया है । हाल ही कांग्रेस के चिंतन शिविर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कहा था पार्टी ने हमें बहुत कुछ दिया है, अब कर्ज उतारने का समय है और सिब्बल ने एक अदद राज्य सभा सीट के लिए पार्टी छोड़कर अपना क़र्ज़ उतार दिया।

इससे पूर्व पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुनील जाखड़ और गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल सरीखे नेताओं ने पार्टी छोड़ते हुए अपने ही नेताओं के बर्ताव और व्यवहार की कड़ी आलोचना की थी। कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी ने हाल ही अपनी लंदन यात्रा के दौरान देश के पीएम नरेंद्र मोदी पर लोकतंत्र को कमजोर करने सहित कई तरह के आरोप जड़े। काश राहुल दूसरों पर आरोप लगाने से पूर्व अपनी पार्टी ने नेताओ के बयानों को देख लेते तो उन्हें समझ में आ जाता की लोकतंत्र को कमजोर कौन कर रहा है। अथवा यह समझा जाये की वे जान बूझकर आंखे मूंदे हुए है। लगातार खंड खंड होती जा रही पार्टी को चिंतन की नहीं चिंता की जरुरत है। जब भी कोई सियासी पार्टी अपने देश और दल के हित से बढ़कर किसी एक परिवार के हित का ध्यान रखेगी, तब उसका हाल भी कांग्रेस के समान ही होगा। लगता है कि सत्ताच्युत गांधी परिवार का हित अपनी पार्टी और देश से बड़ा हो चुका है।
कांग्रेस की इस दुर्दशा के लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही जिम्मेदार है। एक समय में कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व पूरे देश में था, लेकिन आज कुछ राज्यों में सिमट कर रह गई है।अगर जिंदा रहना है तो कांग्रेस को इतिहास से सीखना होगा। कांग्रेस आजादी के आंदोलन की पार्टी है। आजादी के दौरान भी कांग्रेस कई गुटों में विभाजित थी। मगर महात्मा गाँधी सब के सर्वमान्य नेता थे। पार्टी कभी गरम और नरम दल में विभाजित थी। बाद में समाजवादियों ने अपना अलग मंच बनाकर पार्टी को अलविदा कह दिया था। आजादी के बाद कांग्रेस समाजवादी मंच और नेहरू मंच के नाम से नेताओं के अलग अलग मंच सक्रीय थे। युवा तुर्कों का अपना अलग गुट था जिसमें चंद्र शेखर, मोहन धारिया और कृष्णकांत सरीखे नेता थे। ये सभी नेता कांग्रेस में बदलाव के हिमायती थे। पिछले कुछ समय से जी – 23 के नाम से कुछ प्रमुख नेताओं ने सोनिया गाँधी परिवार को चेताया और संगठन चुनावों की मांग की। गुलामनबी आजाद, कपिल सिब्बल, मनीष तिवाड़ी, आनंद शर्मा, भूपेंद्र सिंह हूडा सरीखे नेता इस ग्रुप के खेवनहार थे । ये लोग कांग्रेस की वर्तमान कार्यप्रणाली से खुश नहीं है और बदलाव के हामी है। इस गुट ने लेटर बम के जरिये अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर प्रहार किया था और संगठन के नीचे से ऊपर तक चुनाव के प्रबल पक्षधर है। कांग्रेस छोड़ने वाले कपिल सिब्बल ने तब कहा था – सच बोलने का मौका है और आज सच ही बोलेंगे। सच्चाई ये है कि कांग्रेस पार्टी कमजोर होती दिखाई दे रही है और इसलिए हम यहां इकट्ठा हुए हैं।
गौरतलब है 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कुछ एक राज्यों को छोड़ दें, तो पूरे देश में कांग्रेस अपना जनाधार खोती चली गई। कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व में बदलाव को लेकर सुगबुगाहट तेज हुई तो राहुल गांधी ने कुछ समय के लिए पार्टी की कमान अपने हाथ में ली, मगर 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ दिया। सोनिया गांधी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बन गईं। इसके बाद कई और राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। इसी बीच चुनावों में कांग्रेस के लगातार खराब प्रदर्शन से पार्टी के भीतर संगठनात्मक बदलाव की मांग तेज होने लगी। चिंतन शिविर के नतीजों से बेखबर कांग्रेस आज एक बार फिर सियासत के दो राहे पर खड़ी है। पार्टी ने अपने संगठन को मजबूत नहीं बनाया तो आजादी के गर्भ से निकली पार्टी के खंड खंड होने का खतरा मंडराने लगा है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

Leave A Reply

Your email address will not be published.