तीसरे और चौथे मोर्चे के अंगूर खट्टे है

बाल मुकुन्द ओझा

भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ते आभामंडल को धूमिल करने के प्रयास शुरू हो गए है। वर्ष 2024 में होने वाले लोक सभा चुनावों और इस वर्ष राष्ट्रपति चुनाव के मद्ये नज़र देश में एक बार फिर विपक्ष की एकता के लिए जोरदार प्रयास किये जा रहे है। बीरबल की खिचड़ी की तरह विपक्ष की एकता के प्रयास परवान चढ़ेंगे या बीच मंझधार में रह जायेंगे कोई बताने वाला नहीं है। यह सिर्फ शिगूफा है या चूं चूं का मुरब्बा यह देखने वाली बात है। इस बार विपक्ष की यह एकता कथित साम्प्रदायिकता के खिलाफ है या भाजपा को सत्ताच्युत करने का प्रयास देखने वाली बात है। विपक्ष की यह एकता सिद्धांतों पर आधारित है या अवसरवादी और सुविधा की राजनीति इस पर भी गौर करने की बात है। वर्तमान में विपक्ष कांग्रेस नीत यूपीए के साथ गैर कांग्रेस और गैर भाजपा की सियासत करने वाले दलों में विभाजित है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव ने भाजपा विरोधियों को एक झंडे के नीचे लाने के लिए अपनी भागदौड़ एक बार फिर शुरू करदी है। कांग्रेस को इस कवायद में फ़िलहाल शामिल नहीं किया गया है। केसीआर इस वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव और 2024 में होने वाले आम चुनाव से पहले समान विचारधारा वाली राजनैतिक पार्टियों से मेल मुलाकात कर उनका मन टटोल रहे हैं। केसीआर चाहते हैं सभी राजनैतिक पार्टियां मिलकर भाजपा का मुकाबला करे। केसीआर सभी क्षेत्रीय दलों से मिलकर तीसरे मोर्चे के गठन की दिशा में पहल कर सकते हैं। केसीआर ने अपनी योजना को अमलीजामा पहनने के लिए हाल ही में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिले हैं। केसीआर अगले कुछ दिनों में अन्य पार्टियों के नेताओं से भी मुलाकात कर सकते हैं। केसीआर 26 मई को बेंगलुरु में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से मिलने के साथ बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी से मिलने के लिए पश्चिम बंगाल जा सकते हैं। केसीआर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव से मिलने का इरादा रखते हैं।

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से भी संपर्क करने की संभावना है। इससे पूर्व वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और राकांपा प्रमुख शरद पवार से मिलने मुंबई गए थे। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने हैदराबाद में केसीआर से मुलाकात की थी। कांग्रेस से मुलाकात का कोई प्रयास नहीं दिख रहा है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है वर्तमान में मोदी विरोधी एक मोर्चा बनने की संभावना कम है। इसका मुख्य कारण वे क्षेत्रीय पार्टियां है जिन्होंने अपने अपने राज्यों में कांग्रेस का वोटबैंक हथिया कर उसे सत्ताच्युत किया है। यूपी में अखिलेश यादव, तेलंगाना मेंं मुख्यमंत्री केसीआर, आंध्र में मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी और बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टियां कांग्रेस से मेल मिलाप की इच्छुक नहीं है। जबकि बिहार में तेजस्वी यादव, महाराष्ट्र में शरद पवार और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, तमिलनाडु में मुख्यमंत्री स्टालिन की पार्टियां कांग्रेस से हाथ मिलाकर चल रही है। वामपंथी भी कांग्रेस के साथ है। इनमें कांग्रेस का वोट बैंक हथियाने वाली पार्टियां नहीं चाहती कि कांग्रेस उनके राज्यों में पैर पसारे वहीँ अन्य पार्टियां जिनके राज्यों में कांग्रेस प्रभावहीन है वे कांग्रेस को अपने साथ रखने के पक्षधर है। यही एकमात्र पेच है जो संयुक्त विपक्ष को एक होने के मार्ग में अवरोध खड़ा कर रहा है। बीरबल की खिचड़ी की तरह विपक्ष की एकता के प्रयास परवान चढ़ेंगे या बीच मंझधार में रह जाएंगे कोईं बताने वाला नहीं है। रही राष्ट्रपति चुनाव की बात तो भाजपा अपने सहयोगियों के साथ नवीन पटनायक और जगन मोहन रेड्डी को साथ लेकर आसानी से अपना राष्ट्रपति निर्वाचित कराने में सक्षम है।
2024 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है। फ़िलहाल लाख चेष्टा के बाद भी मोदी विरोधी पार्टियां एक मंच पर आने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी मोदी सरकार और संघ का मुकाबला करने के लिए समान विचारधारा वाले दलों को साथ आने की वकालत कर रहे है। वही रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा है तीसरे, चौथे मोर्चे का कोई चांस ही नहीं हैं। अगर कोई पार्टी भाजपा को हराना चाहती है तो उसे दूसरे मोर्चे के रूप में उभरना होगा। यही स्थिति मोदी के विजय का मार्ग प्रशस्त करेगी।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

Post add

Leave A Reply

Your email address will not be published.