मोदी की आलोचना खूब कीजिये जनाब मगर देश को बक्श दीजिये

बालमुकुन्द ओझा

कांग्रेसी नेता राहुल गाँधी एक बार फिर अपने देश के पीएम नरेंद्र मोदी के बहाने देश के लोकतंत्र पर हमला बोलते तनिक भी नहीं हिचकिचाएं। इस बार उन्होंने भारत की तुलना पाकिस्तान जैसे आतंकवादी देश से करते देर नहीं की। मोदी के बहाने उन्होंने देश को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। मगर वे यह भूल गए देश की जनता ने नेहरू, इंदिरा और राजीव की भांति मोदी को भी प्रचंड बहुमत के साथ देश का ताज पहनाया है। वे यह भी कहते है भारत एक राष्ट्र नहीं है। जब से कांग्रेस देश की सत्ता से बाहर हुई है तब से उनकी हालत बिन पानी मछली सी हो रही है।

धीरे धीरे कांग्रेस लगातार अपना वजूद खोती जा रही है मगर सुधरने का नाम नहीं ले रही है। उसके नेता पार्टी छोड़ते जा रहे है मगर नीरो बांसुरी की धुन में खोया हुआ है। गौरतलब है राहुल ने देश की सवैंधानिक संस्थाओं यथा चुनाव आयोग, न्यायालय और प्रेस पर भी समय समय पर हमला बोला। मोदी और भाजपा की आलोचना खूब कीजिये जनाब, मगर देश को बक्श दीजिये। यह बात देश के बारे में अंट – शंट बोलने वालों की समझ में क्यों नहीं आ रही भगवान जाने। ऐसा लगता है जैसे स्वस्थ और रचनात्मक बहस का स्थान घृणात्मक और नफरत से ओतप्रोत वाद विवाद ने ले लिया है।
कांग्रेस राहुल गाँधी ने हाल ही लंदन में एक चर्चा के दौरान कहा इंडिया इज नॉट एट ए गुड प्लेस, इकॉनमी बेजान है और प्रोडक्शन बढ़ाकर रोजगार देने की जरूत है। जब इकॉनमी पर बोल रहे थे तभी उन्होंने पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे मुल्कों से हमारी तुलना की। राहुल देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर अपनी बात कहे और इन मुद्दों पर मोदी और सरकार की जमकर आलोचना करें यह समझ में आने वाली है मगर भारत की तुलना पाक और श्री लंका से करें तो देशवासियों का चिंतित होना लाज़िमी है। राहुल ने अनेक बार चीन की चर्चा करते हुए देश की अस्मिता पर भी हमला बोला। कांग्रेस में यह क्या हो रहा है, अपनी पार्टी को संगठित करने के बजाय देश को तोड़ने वाली बातें कर क्या हासिल करेंगे यह समझ से बाहर है।
देखा जा रहा है, हमारे नेताओं के भाषणों, वक्तव्यों और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सुचिता के स्थान पर नफरत, झूठ, अपशब्द, तथ्यों में तोड़-मरोड़ और असंसदीय भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता देखा जा सकता हैं। हमारे नेता अब आए दिन सामाजिक संस्कारों और मूल्यों को शर्मसार करते रहते हैं। विशेषकर मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नफरत की सियासत में तेजी आ गयी। स्वस्थ आलोचना से लोकतंत्र सशक्त, परंतु नफरत भरे बोल से कमजोर होता है, यह सर्व विदित है। आलोचना का जवाब दिया जा सकता है, मगर नफरत के आरोपों का नहीं। हमारे नेता मंच और भीड़ देखते ही सियासत की तकदीर लिखने लगते है। भाषणों में नफरत के तीर चलने लग जाते है। बंद जुबाने खुल जाती है। सियासी शत्रुता के गुबार फूटने लगते है। नीतियों और मुद्दों की बाते गौण हो जाती है।
यह सही है की कांग्रेस के सत्ताच्युत होने और नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने के बाद देश में नफरत के बादल मंडराने शुरू हो गए थे। विशेषकर मोदी के खिलाफ जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया वे घोर असंसदीय तो थे ही साथ ही उनसे मोदी के खिलाफ घृणा का भी साफतौर पर पत्ता चलता है।
आज हालत यह हो गयी है की देश में कोई भी वारदात घटित हो जाती है तो तुरत फुरत में ऐसे ऐसे बयानवीर और उनके जहरीले बयानों का देश को सामना करना पड़ता है जिसे पढ़ और सुनकर सिर न केवल शर्म से झुक जाता है अपितु लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होने का खतरा मंडराने लगता है। कई बार तो इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से सीधे प्रधान मंत्री का नाम जोड़ कर निंदा के बयानों की झड़ी लग जाती है। प्रधान मंत्री पर हमले को उनकी पार्टी के लोग बर्दास्त नहीं कर पाते और पलटवार के रूप में जिस भाषा का प्रयोग होता है उसे भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। यहाँ हम बयानवीरों के नाम और उनके वक्तव्यों का उल्लेख नहीं करना चाहते मगर यह अवश्य कहना चाहते है नफरत की यह सियासत हम सब के लिए उचित नहीं है इससे देश कमजोर होता है। देश में व्याप्त नफरत के इस माहौल को खत्म कर लोकतंत्र की ज्वाला को पुर्नस्थापित करने की महती जरूरत है और यह तभी संभव है जब हम खुद अनुशासित होंगे और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं करेंगे।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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