अध्यात्म में स्त्री.पुरुष दोनों को आध्यात्मिक उन्नति का समान अवसर !

महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषद में उत्कृष्ट प्रस्तुतिकरण पुरस्कार से सम्मानित

@ chaltefirte.com                                नई दिल्ली । अध्यात्म में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होता । अध्यात्मशास्त्र के विषय में मार्गदर्शन करने का अवसर महिलाओं से अधिक पुरुषों को अधिक मिलने की भले ही दिखाई देता हो; परंतु आध्यात्मिक उन्नति करने का अवसर सभी को समान ही होता है, ऐसा प्रतिपादन महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के श्री. शॉन क्लार्क ने किया । श्रीलंका में आयोजित ‘दी एड्थ वर्ल्ड कॉन्फरन्स ऑन वीमन्स स्टडीज’ इस वैज्ञानिक परिषद में वे ऐसा बोल रहे थे । इस परिषद का आयोजन ‘दी इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ नॉलेज मैनेजमेंट’ ने किया था । श्री. क्लार्क ने विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा लिखित ‘आध्यात्मिक उन्नति से संबंधित लिंग जन्य भेदभाव को चुनौती’ यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया । श्री. क्लार्क इस शोधनिबंध के सहलेखक हैं । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय का यह 93 वां प्रस्तुतिकरण था । इस परिषद में इस शोधनिबंध को ‘उत्कृष्ट सादरीकरण पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया ।

श्री. क्लार्क ने इस विषय से संबंधित महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा किए गए शोधकार्य का प्रस्तुतिकरण किया । ऊर्जा और प्रभामंडल मापन यंत्र ‘युनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ (यू.ए.एस्.) की सहायता से 24 साधकों के (पुरुष और महिलाएं) प्रभामंडलों का अध्ययन किया गया । इसमें 4 समूह बनाए गए थे ।60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के उपर के और इस स्तर के नीचे के ! आध्यात्मिक साधना में ’60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर’ एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है; क्योंकि यह स्तर प्राप्त करने के उपरांत व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है । प्रत्येक समूह को पुनः ‘आध्यात्मिक कष्टवाले’ और ‘आध्यात्मिक कष्टरहित’, इन दो समूहों में वर्गीकृत किया गया था । इस परीक्षण में यह दिखाई दिया कि 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के उपर के साधकों की नकारात्मक ऊर्जा के प्रभामंडलों में पुरुष और स्त्रियों में कोई विशेष अंतर नहीं था; परंतु 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के नीचे के साधकों के समूह में स्त्रियों में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल पुरुषों की अपेक्षा बहुत अल्प होने की बात दिखाई दी । 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के उपर के साधकों में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल पुरुषों में थोडी अधिक होने की बात दिखाई दी, तो 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के नीचे के साधकों के समूह में स्त्रियों में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल बहुत अधिक दिखाई दी । 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के उपर के साधकों में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल नीचे के स्तर के साधकों की तुलना में बहुत अधिक था, साथ ही आध्यात्मिक कष्ट से ग्रस्त साधकों में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल अल्प था । इससे आध्यात्मिक कष्ट होना आध्यात्मिक उन्नति में बाधा होने की बात ध्यान में आती है । उसके कारण कष्ट से ग्रस्त साधकों को उनकी आध्यात्मिक उन्नति होने के लिए अधिक प्रयास करना आवश्यक होता है ।

अन्य एक परीक्षण में चार साधकों ने प्रत्येक 30 मिनट तक ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ नाम जप किया । आध्यात्मिक कष्ट रहित और 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के उपर के साधकों में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल केवल 30 मिनट तक किए गए एकाग्रतापूर्ण नामजप से नष्ट होने की और उससे उनका सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल दोगुना होने की बात दिखाई दी । 60 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के नीचे के साधकों में भी उनकी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल आधा न्यून (कम) होने की, तो सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल भी बहुत बढने की बात दिखाई दी । इससे पुरुष और महिलाएं नित्य आध्यात्मिक साधना कर आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं, यह स्पष्ट हुआ । व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर जितना अधिक, उतना साधना का परिणाम अधिक होता है ।

श्री. क्लार्क ने आगे कहा कि हम यदि नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करनेवाले कृत्यों में संलिप्त हुए, तो उससे हमारे द्वारा की गई आध्यात्मिक साधना का परिणाम नष्ट होता है । अन्य एक परीक्षण के लिए प्रत्येक पुरुष और स्त्री साधक द्वारा मद्यपान किए जाने के केवल 5 मिनटों में ही उनमें विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल नष्ट होने की, तो केवल आधे घंटे में ही उनमें विद्यमान नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल बडे स्तर पर बढा हुआ दिखाई दिया । उसके उपरांत श्री. क्लार्क ने स्त्रियों की आध्यात्मिक उन्नति पर परिणाम करने वाली केशभूषा, वेशभूषा, वस्त्रों के रंग, आभूषण इ. घटकों के संदर्भ में किए गए शोधकार्य की जानकारी दी । केशभूषा के अंतर्गत जूडा सर्वाधिक सात्त्विक स्पंदन प्रक्षेपित करता है, तो केश खुले छोडने से उससे उल्टा परिणाम होने का दिखाई दिया है । वस्त्रों में उचित पद्धति से साडी पहनना सर्वाधिक सात्त्विक है । आभूषण भी स्त्रियों की सकारात्मकता में वृद्धि अथवा पतन कर सकते हैं । यह बात आभूषण में उपयोग किए जानेवाले धातु, उसकी कलाकारी (डिजाइन) और उनमें जडित रत्नों पर निर्भर होती है ।

पुरुष और स्त्रियों की गुणविशेषताओ का विचार किया जाए, तो पुरुषों की तुलना में सामान्यरूप से स्त्रियों में समाहित भावनाशीलता उनकी आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बडी बाधा है, ऐसा दिखाई दिया; परंतु स्त्रियों में बुद्धि की बाधा न्यून और श्रद्धा अधिक होती है, यह उनका प्रबल पक्ष है । आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रद्धा अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है ।

श्री. क्लार्क ने कहा कि पुरुष और स्त्री ये दोनों एक-दूसरे से सीख सकते हैं, साथ ही साधना के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर आध्यात्मिक उन्नति निर्भर होती है और अन्यों का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने की क्षमता व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर पर और ज्ञान की प्राप्ति पर निर्भर होती है ।