किसलिए हो रहा है बिजली-कोयले की किल्लत का शोर

आर.के. सिन्हा

फिलहाल देश में कोयले और बिजली की किल्लत का माहौल बनाया जा रहा है। इस तरह के हालात निर्मित करने की कोशिशें इसलिए हो रही हैं ताकि देश का जनमानस केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा होने लगे। इस माहौल को हवा-पानी मिल रही है उन राज्यों में जहां पर कोयले के सर्वाधिक भंडार हैं। जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओडिशा। गौर कीजिए कि इन सब राज्यों में गैर-भाजपाई सरकारें हैं। अब जरा आगे चलिए। वोट के लालच में फ्री बिजली देने वाले दिल्ली, पंजाब, राजस्थान जैसे राज्य भी गैर-भाजपाई शासित हैं। क्या गर्मियों के मौसम में पहली बार बिजली की खपत बढ़ रही है और बिजली की किल्लत को महसूस किया जा रहा है? नहीं न। दिल्ली में बिजली की कटौती नाम –निहाद हो रही है। पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सियासत करने से पीछे नहीं हट रहे। वे कोयले की कमी का मुद्दा बना रहे हैं और सबको डरा रहे हैं। अब उन्होंने एक और खेल खेलना शुरू कर दिया है। केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली कैबिनेट ने फैसला लिया है कि 1 अक्टूबर, 2022 से दिल्ली में बिजली पर सब्सिडी केवल उन्हीं लोगों को मिलेगी, जो इसे लेना चाहेंगे यानी बिजली पर छूट अब वैकल्पिक होगी। इस योजना के तहत लोगों के पास यह ऑप्शन होगा कि अगर वे चाहे तो अपनी सब्सिडी को त्याग सकते हैं। कोई क्यों छोड़ेगा? उन्होंने इससे मिलती-जुलती बात तब भी कही थी जब डीटीसी की बसों में महिलाओं को मुफ्त सफर करने की घोषणा की गई थी। तब कहा गया था कि जो महिलाएं टिकट लेना चाहें वह ले सकती हैं। डीटीसी बसों में सफर करने वाली किसी महिला से पूछ लीजिए कि क्या वह टिकट लेती है? उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा।

महाराष्ट्र में भी बिजली संकट गहराता जा रहा है। भारत की प्रगति का रास्ता महाराष्ट्र से होकर ही गुजरता है। वहां इस प्रकार की स्थिति का होना अफसोसजनक है। महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली तथा पंजाब जैसे राज्यों का बिजली कंपनियों पर लाखों करोड़ बकाया पड़ा है, महाराष्ट्र सरकार तो सुप्रीम कोर्ट में केस तक हार चुकी है और उसे भुगतान करना ही करना है, उसके बाद भी ये राज्य बिजली खर्च कर रहे है और पेमेंट भी नहीं कर रहे हैं। सबको पता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली उत्पादक कंपनियों (जेनको) के 7,918 करोड़ रुपये के भारी बकाया के कारण कई राज्यों, विशेष रूप से महाराष्ट्र, राजस्थान और पश्चिम बंगाल को कोयले की आपूर्ति कम हुई है। जरा इन राज्यों के नेताओं की बेशर्मी देखिए कि ये कोयले की कमी का रोना तो रो रहे हैं, पर ये नहीं बता रहे कि जेनको का बकाया धन वापस क्यों नहीं कर रहे? जबकि इन्होनें जनेको से बिजली खरीद कर उपभोक्ताओं को कई बार दुगने दाम तक में बेच भी दिया है और ज्यादातर पैसा बसूल भी कर लिया है तो कैसे सुधरेगा बिजली क्षेत्र? कहां से आएगा जेनको के पास अपना काम करने लिए आवश्यक धन?

कोयले की कमी की नौटंकी की जानकारी कई माह पहले से थी, आप यकीन नही करेंगे पर ये भी टूलकिट का ही एक पूर्व नियोजित हिस्सा है, सरकार विरोधी माहौल बनाने के लिए।जब सारे पैंतरे आजमाकर हार गए हैं तो कुछ नई योजनाओं पर काम शुरू हुआ है, जिनमें दंगे भड़काना और मूलभूत आवश्यकताओं की कमी कर के ठीकरा सरकार पर फोड़ना। दंगे भड़कने से कोर वोटर भाजपा से दूर होगा, जैसा वोटर का स्वभाव है और मूलभूत आवश्यकताओं की कमी पर नया वोटर जो जुड़ा है वह भी निराश होकर दूर होगा।

अब पंजाब की बात करेंगे। मुख्यमंत्री भगवंत मान की हर घर में प्रति माह 300 मुफ्त यूनिट की घोषणा से राज्य सरकार के वार्षिक बिजली सब्सिडी बिल में लगभग 2,000 करोड़ रुपये का इजाफा होगा। उनकी घोषणा के साथ, बिल बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये होने की उम्मीद है।  कर्ज में डूबी पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) को अपने थर्मल प्लांटों को चलाने के लिए आयातित कोयले की खरीद के लिए और भारी खर्च करना होगा, क्योंकि केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने पंजाब और अन्य राज्यों को कोयला आयात करने की सलाह दी है। इतना सब कुछ होने पर भी पंजाब सरकार मुफ्त की बिजली देने से बाज नहीं आ रही। हां, उसका तो एक सूत्रिय कार्यक्रम है मोदी सरकार को घेरना। पंजाब या महाराष्ट्र सरकारें समझ लें कि अब दुनिया बदल गई है। देश जागरूक हो गया है। उसे पता है कि कौन सी सरकार कितनी जिम्मेदारी से अपने राज्य को चला रही है।

 अब आते हैं कोयले पर I तो यह बात सभी को मालूम है कि गर्मियों में बिजली की खपत काफी बढ़ जाती है, ऐसे में बिजली की कमी होना या कटौती होना कोई बड़ी बात या नई बात नहीं है I  आज से कुछेक साल पहले तक हमने राजधानी में रोज कई-कई घंटे बिजली की कटौती देखी है। दिल्ली में बिजली संकट केन्द्र में अटल बिहरी सरकार और दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकारों के समय खत्म होने लगी थी। इस बीच, बिजली और कोयले के संकट के कोलाहल के बीच  कोयले से लदी मालगाड़ी के 13 डिब्बों के पटरी से उतरने की खबर भी वास्तव में बहुत गंभीर है। यह घटना बीती 30 अप्रैल की है। रेलवे के सबसे बिजी मार्गों में से एक दिल्ली-हावड़ा रेल मार्ग पर इटावा जिले में ये हादसा हुआ।  रेलवे को इस हादसे की गहराई से छानबीन करनी होगी कि डेडिकेटेड फ्राइट रूट पर कोयले से लदी मालगाड़ी के डिब्बे पटरी से कैसे उतर गए। इस तरह की घटना पहले तो कभी नहीं हुई। इस हादसे के कारण वैगन में रखा कोयला पटरियों में बिखर गया और कई पटरियां टूट गईं। याद नहीं आता कि इससे पहले कभी डेडिकेटेड फ्राइट रूट पर इस तरह का हादसा हुआ हो। गौर करें कि रेलवे ने बिजली की बढ़ती खपत और कोयले की कमी को देखते हुए अगले एक महीने तक 670 पैसेंजर ट्रेनों को रद्द कर दिया है। साथ ही कोयला से लदी मालगाड़ियों की औसत संख्या भी बढ़ा दी गई है। तब यह रेल हादसा एक बड़ी साजिश की तरफ भी संकेत करता है।

केंद्र सरकार सारे सार्थक प्रयास कर रही है I लेकिन, बोलने वाले तो बोलने से बाज नहीं आयेंगे I

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)

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