महाविपदा है बेटी के लिए बाल विवाह

बाल मुकुन्द ओझा

देश के अनेक राज्यों में आखातीज पर ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में चोरी छिपे बाल विवाह होते हैं। इस वर्ष अक्षय-तृतीया का पर्व 3 मई को है और इसके उपरान्त पीपल पूर्णिमा 16 मई का पर्व भी आने वाला है। इन दिनों तथा अबूझ सावों पर विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाहों के आयोजन की संभावनाएं रहती हैं। जिन्हें सख्ती से रोकने की जिम्मेदारी सरकार के साथ समाज की भी है।
छोटी उम्र में बालिका की शादी के फौरी और दूरगामी परिणाम निकलते हैं। लड़की का स्कूल और खेलने कूदने के दिन छूट जाते है। कई मामलों में उसे अपने पति से प्रताड़ना सहनी पड़ती है। कम उम्र में गर्भ धारण लड़की की शारीरिक समस्याओं की वजह बन सकता है। साथ ही इससे आगामी पीढ़ियों के लिए भी गरीबी का जोखिम बढ़ता है। इसे समूल रूप से खतम कर हम आदर्श समाज की स्थापना कर सकते है। छोटी आयु में विवाह का मुख्य कारण अशिक्षा और गरीबी है। अभिभावक गरीबी के कारण अपनी बेटी का जल्दी विवाह कर एक सामाजिक दायित्व से निवृत्त होना चाहते हैं। नासमझी और अशिक्षित होने के कारण उन्हें यह ज्ञान नहीं है कि वे अपनी बेटी को एक अंधे कुंए की ओर धकेल रहे हैं जिसमें से वह ताउम्र नहीं निकल पायेगी। छोटी आयु में विवाह के कारण लड़की को गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ता है। खेलने-कूदने के दिनों में वह सेक्स की शुरूआती एवं प्रारम्भिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझती रहती है। इसके अलावा बालिका वधु को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है। शारीरिक रूप से अपरिपक्वता के साथ-साथ उसे शिक्षा से भी वंचित होना पड़ता है।
बाल विवाह का अर्थ है छोटी आयु में शादी। अर्थात् 21 वर्ष से कम आयु के लड़के और 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह होना। भारत में बाल विवाह की प्रथा का अनादिकाल से प्रचलन है। लाख कोशिशों के बाद भी हम इस कुप्रथा को समाप्त नहीं कर पाये हैं। सभ्य समाज के मुंह पर यह एक तमाचा है। यह मानव जीवन की सबसे बड़ी और दुःखदाई त्रासदी है। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम- 2006 के अनुसार बाल विवाह अपराध है। भारत में लंबे समय से बाल विवाह पर अंकुश लगाने के प्रयास होते रहे हैं। बाल विवाह पर रोक संबंधी कानून सर्वप्रथम सन् 1929 में पारित किया गया था। बाद में सन् 1949, 1978 और 2006 में इसमें संशोधन किए गए। इस समय विवाह की न्यूनतम आयु बालिकाओं के लिए 18 वर्ष और बालकों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है। बाल विवाह पर अंकुश लगाने के प्रयास के तहत केंद्र सरकार ने अब लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। इस प्रस्ताव के मंजूर होने के बाद सरकार बाल विवाह निषेध कानून, स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन करेगी। नीति आयोग में जया जेटली की अध्यक्षता में साल 2020 में बने टास्क फोर्स ने इसकी सिफारिश की थी। इस टास्क फोर्स का गठन “मातृत्व की आयु से संबंधित मामलों, मातृ मृत्यु दर को कम करने, पोषण स्तर में सुधार और संबंधित मुद्दों“ की जांच कर उचित सुझाव देने के लिए किया गया था।
बाल विवाह आज भी ज्वलन्त समस्या के रूप में हमारे सामने है। यह अनादिकाल से चली आ रही है। सामाजिक मान्यता मिलने के कारण इसे बढ़ावा मिला। इसी कारण इस कुप्रथा ने विकराल रूप धारण कर लिया। अशिक्षा एवं अंधविश्वासी समाज ने इस कुप्रथा को अपना लिया। बाल विवाह को बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन भी माना गया है। जब तक बच्चे बालिग या समझदार न हो जायें और अपने भले-बुरे की पहचान के योग्य नहीं हो जायें तब तक बाल विवाह किसी भी स्थिति में नहीं किये जाने चाहिये। यह भी वैज्ञानिक परिणामों से स्पष्ट है कि बाल विवाह से अच्छे स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा का अधिकार, खेलने-कूदने के अवसर हासिल नहीं होते। कच्ची उम्र में शादी होने से स्वास्थ्य एवं जननांगों पर खराब असर पड़ता है जिसे बच्चों को ताउम्र झेलना पड़ता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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